सीसीए पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब,
चार हफ्ते में देना होगा जवाब
ज्ञातव्य है कि बीते दिसम्बर में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित किया है। इसके बाद से ही देश भर में इस कानून के पक्ष और विपक्ष में धरने प्रदर्शन और रैलियों की गहमागहमी से माहौल सरगर्म है। एक महीने से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी विरोधी खामोशी अपनाने के लिए तैयार नहीं है तो समर्थन की रैलियां भी थमने का नाम नहीं ले रही हैं। और सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने भी बीते दिन लखनऊ की रैली में गर्जना करते हुए सरकार के कदम पीछे हटाए जाने की अटकलों पर लगाम लगा दी है। कहीं हिंसक तो कहीं शांतिपूर्ण तरीके से जारी विरोध प्रदर्शन और कानून के पक्ष में गूंजते नारों के बीच सुप्रीम कोर्ट में कुल 144 याचिकाएं सुनवाई के लिए दायर की गई थी। इनमें से 141 याचिकाएं कानून के खिलाफ दायर की गई। जिनमें मुख्य तर्क यही था कि कानून देश के सविधान की मूल भावना (समानता) के खिलाफ होकर पक्षपात करता है। वहीं तीन याचिकाएं कानून के पक्ष में भी दायर हुईं। विरोध में दायर करने वालों में कांग्रेस नेता जयराम रमेश, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन ओवैसी समेत कई अन्य लोगों और अन्य संगठनों के नाम शामिल हैं।
इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन सदस्यीय पीठ ने नौ जनवरी को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। और सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख तय की थी।
गौरतलब बात यह भी है कि इन याचिकाओं में से लगभग साठ याचिकाएं CAA के खिलाफ हैं तो अस्सी के करीब याचिकाएं NPR के विरुद्ध हैं।
और इसमें से अदालत असम की याचिकाओं पर अलग से सुनवाई करेगा। इसका कारण जानकार यह बता रहे हैं कि असम में चूंकि NRC लागू है और शेष देश में नहीं। इस वजह से वहाँ की सुनवाई अलग से की जा सकती है। वहाँ के लोगों का कहना है कि 1985 में केंद्र सरकार से जो समझौता हुआ था उसमें 1971 के पहले भारत आये लोगों को नागरिकता दिए जाने का करार हुआ था और वर्तमान कानून में इस डेड लाइन को 2014 किया गया है।
कानून के जानकारों के अनुसार किसी भी प्रकार का निर्देश कोर्ट से जारी नहीं हो पाने से किसी को भी उत्साहित या निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अभी प्रकरण शुरू हुआ है। प्रकरण को अंजाम तक पहुंचने में अदालत की प्रक्रिया का पालन होने तक का इंतजार रहेगा। वैसे देश भर की निगाहें आज सुप्रीम कोर्ट की तरफ ही लगी रहीं। यही वजह रही होगी कि आज अदालत में भारी भीड़ मौजूद रही।
चार हफ्ते में देना होगा जवाब
शैलेश तिवारी
सुप्रीम कोर्ट ने आज 22 जनवरी को सीएए के खिलाफ और पक्ष में दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई शुरु करते हुए केंद्र सरकार को मामले में चार हफ्ते तक जवाब देने को कहा है। मामले में माननीय न्यायालय ने स्टे देने से इंकार किया है।ज्ञातव्य है कि बीते दिसम्बर में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित किया है। इसके बाद से ही देश भर में इस कानून के पक्ष और विपक्ष में धरने प्रदर्शन और रैलियों की गहमागहमी से माहौल सरगर्म है। एक महीने से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी विरोधी खामोशी अपनाने के लिए तैयार नहीं है तो समर्थन की रैलियां भी थमने का नाम नहीं ले रही हैं। और सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने भी बीते दिन लखनऊ की रैली में गर्जना करते हुए सरकार के कदम पीछे हटाए जाने की अटकलों पर लगाम लगा दी है। कहीं हिंसक तो कहीं शांतिपूर्ण तरीके से जारी विरोध प्रदर्शन और कानून के पक्ष में गूंजते नारों के बीच सुप्रीम कोर्ट में कुल 144 याचिकाएं सुनवाई के लिए दायर की गई थी। इनमें से 141 याचिकाएं कानून के खिलाफ दायर की गई। जिनमें मुख्य तर्क यही था कि कानून देश के सविधान की मूल भावना (समानता) के खिलाफ होकर पक्षपात करता है। वहीं तीन याचिकाएं कानून के पक्ष में भी दायर हुईं। विरोध में दायर करने वालों में कांग्रेस नेता जयराम रमेश, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन ओवैसी समेत कई अन्य लोगों और अन्य संगठनों के नाम शामिल हैं।
इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन सदस्यीय पीठ ने नौ जनवरी को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। और सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख तय की थी।
गौरतलब बात यह भी है कि इन याचिकाओं में से लगभग साठ याचिकाएं CAA के खिलाफ हैं तो अस्सी के करीब याचिकाएं NPR के विरुद्ध हैं।
और इसमें से अदालत असम की याचिकाओं पर अलग से सुनवाई करेगा। इसका कारण जानकार यह बता रहे हैं कि असम में चूंकि NRC लागू है और शेष देश में नहीं। इस वजह से वहाँ की सुनवाई अलग से की जा सकती है। वहाँ के लोगों का कहना है कि 1985 में केंद्र सरकार से जो समझौता हुआ था उसमें 1971 के पहले भारत आये लोगों को नागरिकता दिए जाने का करार हुआ था और वर्तमान कानून में इस डेड लाइन को 2014 किया गया है।
कानून के जानकारों के अनुसार किसी भी प्रकार का निर्देश कोर्ट से जारी नहीं हो पाने से किसी को भी उत्साहित या निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अभी प्रकरण शुरू हुआ है। प्रकरण को अंजाम तक पहुंचने में अदालत की प्रक्रिया का पालन होने तक का इंतजार रहेगा। वैसे देश भर की निगाहें आज सुप्रीम कोर्ट की तरफ ही लगी रहीं। यही वजह रही होगी कि आज अदालत में भारी भीड़ मौजूद रही।


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