लेखक
कहा था ना तुमसे, रात में ही मिठाई लेकर रख लेते हैं। आज पूरा बाज़ार बंद है, अब बाउजी को खाने के साथ मीठे में क्या दोगी? मैं शहर जा रहा हूँ.... अब तुम ही संभालो।
हमेशा बड़ बड़ करने वाली सुमन, पति के ये शब्द सुन अवाक रह गई। पिछली बार भोजन की थाली में मीठा नहीं देने की सजा आज भी याद थी उसे।
ससुर जी को दिन और रात में भोजन के बाद मीठा खाने की ऐसी आदत थी की मीठा ना मिले तो सारा गाँव सर पर उठा लेते थे। पिछली बार पूरे एक हफ्ते तक बात नहीं की थी उन्होने सुमन से।
अब ना जाने क्या होगा? यही सोच सोच जाड़े के दिनों में भी सुमन के माथे पर पसीना चमकने लगा था। बाउजी का ग़ुस्सा इतना तेज था कि सारा गाँव उनसे थरथराता था।
सुमन को इस परेशानी का कोई हल नहीं सूझ रहा था और जैसे जैसे वक़्त निकाल रहा था तनाव और बढ़ता ही जा रहा था। वो आँगन में एक छोर से दूसरे छोर चक्कर लगा रही थी। मन ही मन खुद को डाँट भी रही थी, कह रही थी... तू कभी अच्छी बहू नहीं बन पाएगी सुमन, एक छोटी सी चीज़ याद नहीं रहती तुझे।
अभी उसका दिमाग शिकायतें कर ही रहा था कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। वो खिलखिला उठी उसे लगा जरूर उसके पति होंगे और अब उसकी समस्या का हल निकल जाएगा।
झट से दरवाजे की तरफ बड़ी, दरवाजा खोला तो सुमन की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया, दरवाजे पर पति की जगह खड़े थे, बाउजी।
डील डॉल में लंबे चोड़े, सर पर कम बाल पर मूँछे घनी, सफ़ेद कुर्ता और सफ़ेद धोती पहने दरवाजे पर खड़े अपने आप में ही कुछ बड़बड़ा रहे थे। उनकी लाल आँखें दिखा रही थी कि जरूर किसी से झगड़ कर आए हैं।
सुमन ने हिम्मत कर धीरे से पूछा – क्या हुआ बाउजी, सब ठीक तो है ना?
समझता क्या है मोहन अपने आप को, बहुत बड़ा सेठ बनता है चोर साला, बच गया आज घनश्याम बीच में नहीं आता तो आज बताता उसे.... कहता है जब मैं सरपंच था तो गाँव के हाल बेहाल थे और अब वो रघुवीर प्रसाद सरपंच है तो गाँव फल फूल रहा है…… बाउजी बोले जा रहे थे और आँगन में बने कुए से पानी भर हाथ मुँह भी धो रहे थे।
फिर बोले – खाना तो तैयार है न बहू, चल जल्दी लगा दे बहुत भूख लगी है, मोहन को तो मैं देख लूँगा।
सुमन की हालत तो ऐसी हो गई की काटो तो खून नहीं……. दिल इतनी ज़ोर से धडक रहा था जैसे अभी निकल कर बाहर गिर जाएगा।
बहू... क्या हुआ, इतनी देर क्यूँ लग रही है। बाउजी की आवाज़ में आये इस वाक्य के साथ जैसे समय समाप्ती की घोषणा हो गई।
जी लाई बाउजी....
डरते डरते थाली परोसी.... थाली लेकर आगे बड़ी ही थी कि सामने नज़र आया वो डिब्बा जिसमें गुड रखा था। सोचा गुड़ भी तो मीठा होता है, शायद कुछ काम बन जाए। मरता क्या न करता.... थाली में मीठा रखने वाले खन में एक छोटी सी गुड़ की डली रख बाऊ जी के सामने धीरे से थाली रखी और बिना नज़रें मिलाये किचिन में आ गई।
और फिर जिस घड़ी का इंतज़ार था वो घड़ी आ ही गई। बैठक से बाऊ जी की बुलंद आवाज़ आयी।
सुमन बेटा...... आवाज़ सुन भीगे पक्षी की तरह कंपकपाने लगी थी सुमन।
डरती, घबराती बैठक तक जैसे जिंदगी का सबसे लंबा सफर तय कर पहुंची।
बाउजी ने हाथ से इशारा कर सामने बैठ जाने को कहा। साड़ी के पल्लू को बार बार अपनी उंगली पर लपेटती सुमन.... पहले इतना कभी नहीं डरी थी। फिर हिम्मत कर धीरे से नज़रें उठा बाउजी की तरफ देखा।
बहुत समझदार हो गई है, तेरी सासू माँ देती थी भोजन के साथ मीठे में गुड़, तूने आज उसकी याद दिला दी बेटी। बाउजी ने करुणा भाव के साथ बोला।
सुमन को सुनाई दिया तो बस एक शब्द.... बेटी।
जानती है कितना फायदा करता है गुड़? रक्त साफ करता है, इसमें आयरन होता है और छोटा मोटा जुकाम तो इसके सेवन से ऐसे ही भाग जाता है... बाउजी गुड़ के फायदे गिना रहे थे और सुमन बहू से बेटी बनने की खुशी में आँखें भिगो रही थी।
संपादक
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शैलेश तिवारी, संपादक
गुड़ की डली
कहा था ना तुमसे, रात में ही मिठाई लेकर रख लेते हैं। आज पूरा बाज़ार बंद है, अब बाउजी को खाने के साथ मीठे में क्या दोगी? मैं शहर जा रहा हूँ.... अब तुम ही संभालो।
हमेशा बड़ बड़ करने वाली सुमन, पति के ये शब्द सुन अवाक रह गई। पिछली बार भोजन की थाली में मीठा नहीं देने की सजा आज भी याद थी उसे।
ससुर जी को दिन और रात में भोजन के बाद मीठा खाने की ऐसी आदत थी की मीठा ना मिले तो सारा गाँव सर पर उठा लेते थे। पिछली बार पूरे एक हफ्ते तक बात नहीं की थी उन्होने सुमन से।
अब ना जाने क्या होगा? यही सोच सोच जाड़े के दिनों में भी सुमन के माथे पर पसीना चमकने लगा था। बाउजी का ग़ुस्सा इतना तेज था कि सारा गाँव उनसे थरथराता था।
सुमन को इस परेशानी का कोई हल नहीं सूझ रहा था और जैसे जैसे वक़्त निकाल रहा था तनाव और बढ़ता ही जा रहा था। वो आँगन में एक छोर से दूसरे छोर चक्कर लगा रही थी। मन ही मन खुद को डाँट भी रही थी, कह रही थी... तू कभी अच्छी बहू नहीं बन पाएगी सुमन, एक छोटी सी चीज़ याद नहीं रहती तुझे।
अभी उसका दिमाग शिकायतें कर ही रहा था कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। वो खिलखिला उठी उसे लगा जरूर उसके पति होंगे और अब उसकी समस्या का हल निकल जाएगा।
झट से दरवाजे की तरफ बड़ी, दरवाजा खोला तो सुमन की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया, दरवाजे पर पति की जगह खड़े थे, बाउजी।
डील डॉल में लंबे चोड़े, सर पर कम बाल पर मूँछे घनी, सफ़ेद कुर्ता और सफ़ेद धोती पहने दरवाजे पर खड़े अपने आप में ही कुछ बड़बड़ा रहे थे। उनकी लाल आँखें दिखा रही थी कि जरूर किसी से झगड़ कर आए हैं।
सुमन ने हिम्मत कर धीरे से पूछा – क्या हुआ बाउजी, सब ठीक तो है ना?
समझता क्या है मोहन अपने आप को, बहुत बड़ा सेठ बनता है चोर साला, बच गया आज घनश्याम बीच में नहीं आता तो आज बताता उसे.... कहता है जब मैं सरपंच था तो गाँव के हाल बेहाल थे और अब वो रघुवीर प्रसाद सरपंच है तो गाँव फल फूल रहा है…… बाउजी बोले जा रहे थे और आँगन में बने कुए से पानी भर हाथ मुँह भी धो रहे थे।
फिर बोले – खाना तो तैयार है न बहू, चल जल्दी लगा दे बहुत भूख लगी है, मोहन को तो मैं देख लूँगा।
सुमन की हालत तो ऐसी हो गई की काटो तो खून नहीं……. दिल इतनी ज़ोर से धडक रहा था जैसे अभी निकल कर बाहर गिर जाएगा।
बहू... क्या हुआ, इतनी देर क्यूँ लग रही है। बाउजी की आवाज़ में आये इस वाक्य के साथ जैसे समय समाप्ती की घोषणा हो गई।
जी लाई बाउजी....
डरते डरते थाली परोसी.... थाली लेकर आगे बड़ी ही थी कि सामने नज़र आया वो डिब्बा जिसमें गुड रखा था। सोचा गुड़ भी तो मीठा होता है, शायद कुछ काम बन जाए। मरता क्या न करता.... थाली में मीठा रखने वाले खन में एक छोटी सी गुड़ की डली रख बाऊ जी के सामने धीरे से थाली रखी और बिना नज़रें मिलाये किचिन में आ गई।
और फिर जिस घड़ी का इंतज़ार था वो घड़ी आ ही गई। बैठक से बाऊ जी की बुलंद आवाज़ आयी।
सुमन बेटा...... आवाज़ सुन भीगे पक्षी की तरह कंपकपाने लगी थी सुमन।
डरती, घबराती बैठक तक जैसे जिंदगी का सबसे लंबा सफर तय कर पहुंची।
बाउजी ने हाथ से इशारा कर सामने बैठ जाने को कहा। साड़ी के पल्लू को बार बार अपनी उंगली पर लपेटती सुमन.... पहले इतना कभी नहीं डरी थी। फिर हिम्मत कर धीरे से नज़रें उठा बाउजी की तरफ देखा।
बहुत समझदार हो गई है, तेरी सासू माँ देती थी भोजन के साथ मीठे में गुड़, तूने आज उसकी याद दिला दी बेटी। बाउजी ने करुणा भाव के साथ बोला।
सुमन को सुनाई दिया तो बस एक शब्द.... बेटी।
जानती है कितना फायदा करता है गुड़? रक्त साफ करता है, इसमें आयरन होता है और छोटा मोटा जुकाम तो इसके सेवन से ऐसे ही भाग जाता है... बाउजी गुड़ के फायदे गिना रहे थे और सुमन बहू से बेटी बनने की खुशी में आँखें भिगो रही थी।
जयंत दासवानी, सीहोर मप्र
-----------------परिचय
जयंत दासवानी.... सीहोर मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। आप शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के साथ साथ एक अंग्रेजी दैनिक के लिए पत्रकारिता भी करते हैं और समय समय पर साहित्य की सेवा भी....। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचनाएँ लिखते रहते हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है...।संपादक
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समीक्षा
गुड़ की डली..... एक कथानक है... व्यक्तिगत रुचि का... परिवार में रिश्तों का... पुरानी परंपराओं का.... और सामाजिक धाक का भी...। युवा लेखक की लेखनी... जब गुजरे ज़माने की बातों को अपनी कहानी में पिरोती है.... तब वक्त का लम्हा ठहर जाता है.... देखता है उस पल को... जिसमें नई पीढी़ भूल चुकी है... अपने बुजुर्गो का सम्मान... उनका वो आदर... जिसके वो हकदार हैं...। जंक फूड में सेहत खोती... अपने में ही सिमटी नई पीढी के लिए... रिश्ते ऊब हैं या बोझ...। उसी पीढी का प्रतिनिधि जब... गाँव के वातावरण में किसी रोबिले व्यक्तित्व का शब्द चित्रण... सटीक तरीके से करता है...। आशा जगाता है.. परिवार के जीवंत रहने की... और सबक देता है उन बहुओं को जो... बेटी जैसा व्यवहार पाना तो चाहती हैं... लेकिन अपने कार्यों से बहु ही बनी हुई हैं....। खान पान में गुड़ की डली... आज भी चलन में है....। जो कुछ मीठा हो जाए.... के चॉकलेटी दौर में... सेहत के प्रति सजगता का संदेश भी देती है...। रिश्तों को निभाने से ऊपर जाकर... जीने की बात करता यह कथानक.... सरलता और सहजता से अपनी बात कह जाता है... भाषाई क्लिष्टता में तो उलझता ही नहीं है... अलंकारिक शब्दों के मायाजाल... से भी खूब बचा है.....। साधारण कहानी में... असाधारण बात कह देने का तजुर्बा कराती कहानी लेखन के लिए बहुत बहुत बधाई.....। और जन्म दिन की भी अनंत शुभकामनाएं......।शैलेश तिवारी, संपादक


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