पटरी पर नहीं आई व्यवस्था__ पटरी से ठोक गए अंतिम सलाम


राजेश शर्मा 


जिंदगानियां पटरी से उतरी चल रही हैं। व्यवस्थाएँ भी पटरी से दूर खड़ी हैं। प्रयास सभी को पटरी पर लाने के चल रहे हैं ऐसे मे शुक्रवार को रेलवे की पटरी पर जो वाकया हुआ उसने पूरे जनमानस को झंकझोर दिया। जिंदगी की जिस नींद को 16 मजदूर पटरी को तकिया बनाकर ले रहे थे...उन्हें  पता भी न था कि वह हमेशा के लिए सो रहे हैं। एक दर्द के साथ उन्हें चिरनिद्रा मे लीन हो जाना है।

रोटी,कपड़ा और मकान की चाहत ने घर छुड़वाया था। परदेस गए थे। जिंदगी के छविगृह मे कोरोना ने ताला लगाया। भूख ने ऊंगलियों पर समय गिनवाया। परिवार से मिलने की लालसा ने उनका प्रभुमिलन कराया।

मजबूर मजदूर अपनी-अपनी जिंदगी से जुदा होकर कई सवालिया निशान छोड़ गए जो सरकार के भाल पर लगे हैं। सरकार जितनी सोच रही है जिंदगी उतनी सस्ती नहीं है। हर चीख पहाड़ पिघलाने का दम रखती है। कहते हैं मरी खाल से लोहा भी भस्म हो जाता है। 

हुक्मरानों मे हिम्मत हो तो इस प्रकार की जिंदगी मात्र एक सप्ताह गुजार कर दिखलाएं, सब पता चल जाएगा।

जिनके जहन मे दायित्वों का सत्कार नहीं उन्हें सरकार कहलाने का भी कोई अधिकार नहीं__कैसे बिखरी रेल्वे ट्रेक पर रोटियां, देखकर उन्हें आंखों से पानी क्यों नहीं निकला!! कायदे मे तो आंसूओं को स्याही बनाकर इस्तीफे लिखे जाने चाहिए थे लेकिन नहीं___क्योंकि जोड़-तोड़ से हासिल की गई कुर्सी पर फेविकोल का जोड़ जो लगा है। 
खंड-खंड राजनिति है--विखंड कूटनीति__आज के युग मे होते तो चाणक्य इनसे शिक्षा लेते--वो शिष्य यह गुरु होते।

दूसरे शब्दों मे कहें तो विचार का लहरा जाना जरुरी है, क्योंकि आजादी तो मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता है। हम क्यों नहीं  सोचते कि क्या हम कहीं नहीं पहुंचने के लिए चल रहे हैं ? लक्ष्यहीन गति और गतिहीन लक्ष्य दोनों अर्थहीन हो जाते हैं। जिम्मेदारी लेते हुए नैतिकता के आधार पर  पद से इस्तीफा देने की प्रथा स्व. लाल बहादुर शास्त्री के साथ चली गई। प्रवासी मजदूरों की मौत का आखिर कोई तो जिम्मेदार होगा!! उन्हें पैदल यात्रा करने विवश क्यों होना पड़ा? सरकार क्या कर रही है? पूरे सवालों का एक जवाब है कि सबको आगामी विधानसभा के उप चुनाव दिखाई दे रहे हैं चाहे भाजपा हो या कांग्रेस...आंखों पर केवल कोरोना का फर्जी चश्मा लगा है। चश्मे के पीछे केवल कुर्सी हथियाने और बचाने के दृश्य डेरा डाले हुए हैं। 
16 मरे या 1600 कोई फर्क नहीं पड़ता। पब्लिक तो घानी की बैल है घूमफिर कर जहां से चलती है वहीं पहुंच जाती है। इनसे पूछो तो फिल्म आनंद का डायलॉग सुनाने लगते हैं कि
"जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ मे है जहांपनाह__जिसे न आप बदल सकते हैं --न मैं ....इंसान तो  रंगमंच की एक कठपुतली है जिसकी डोर ऊपर वाले ऊंगियों से बंधी है___कौन,कब,कैसे उठेगा....कोई नहीं बता सकता।।"
लेकिन पर्दे मे रहने दो पर्दा न उठाओ__पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा.....गीत की यह पंक्तियाँ भी तो सत्य हैं।
मजदूरों की मौत ने कोरोना को हराया या कोरोना ने व्यवस्था को हराया यह सवाल सुलग रहा है। शर्म नहीं आ रही सरकार को जो मनुष्य को कीड़े-मकोड़े मानकर चल रही है। टीवी पर लाइव आकर पब्लिक का दिल बहला रही है। एक थाली के चट्टे-बट्टे देश और प्रदेश निगलते जा रहे हैं। पंच तत्व का शरीर और रोटियां पटरी पर बिखरे पड़े हैं और इन्हें सिंहासन न हिले उसकी पड़ी है। कायर राजनीति की गोद मे मानवता को अफीम खिलाकर सुला देने का अंजाम ........!!
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