मालवा की माटी से डिप्टी जी कहिन.... 

म्हारे कईं मिलेगो...

       
काल-परुं का दन परधान मंत्री मोदी बोलियो के बीस लाख करोड़ रुपियो हमार लिये दे है.....,  खेत की तरफ जाते हरिया को टोकते हुए बोली.....__आयगो की नी अायोगो कि  समदा वो ई खा जा जाएगो जो पेले भोत सारी सासन की योजनाए निगल गयो। .... भूरी सांस लेने के लिए कुछ देर रुकी.... फिर बोली.... 

तम देवीपरसाद को अोको (पहचान) कंई ,, अरे,,,, वई पंचात् आला....इनंग आड़ी आयो थो_लायो थो रजिस्टरा, अंगूठो लगवायो और जो गयो तो इनंग आड़ी मूं करके भी नी सोयो_
वो के है कि "लोकल". . .कंई होय यो "लोकल"__रामपरसादिया से पूछू कि मनीसी(मनीषा) से _मारे तो सूज नी पड़े--तम इ बाताओ कसे कइ होये??
हरिया ने सरजू से कहा,,,,, ओके लाकडाउन के हैं _म्हारे  तो सूज से तो उई लुकड़नो है---अबार की बार यो लुकड़नों बोड़ो परेसान करे है। हूं कईं जऊं तो वो पुलिसावाला परेसान करे है....के कि घर के अंदर घुसो ओ मे ही जीनो है।
म्हारे नी आए समझ मे की अबार की बार ये कईं होय_ कसे-कसे टेम निकालूं,

ब्यई को फोन काल आयो थो कि कसो कईं चल रयो ? हूं कईं बतातो _जसो चल रयो ,सभी जगे वसो ही चल रयो --तम जसा हो--हूँ भी वसा हूँ --सरकार वाला के हे कि तमारे काजू (वास्ते) कुछ करंगा..लेकिन इ बात म्हरे गले नी उतरे है।
काल-परुं का दन चौपाल पे भी इ बातां चले थी--पड़ोस वाली रिधिया  ने बतई थी।
हूँ तो असी कूं कि यो कोरोनो के खतम कुन करेगो--जसी बोलूं वसी होए_कुच्चदियो अपनी मौत खुद नी मर जाए...

कें कि बीस लाख करोड़ दियो है उना मोदी ने_मसान का धकिया ही नी खजाएं ?
लसन-कांदों हम खांए ओर वी पइसा खाएं। असो कसे होए? बांदरा की बाट बताएं ओके--अबार की बार जामना (जामुन) भी नी अया__कें कि जामना पेड़ पे नी पड़े तो आपदा आए है। लल्ता (ललिता) भी ये इ के रई थी। मनीसी(मनीषा) ने सुनियो थो।

5-7 दिन मे तो आए है उ मोदी बतिया के चले जाए है। ओके कुन बताए कि हमारो कसे कही चल रियो। ताजो-मोटो छोरो घर बेठो है। ओ की लुगाई बच्चा के कब तक खिलाए!! म्हारे तो सूज नी पड़े। कसे कईं करुं....तम ही बताओ! रजुआ के दायजी

हूं कंइ बतऊं कुटीर के एक किसत आके रे गई दूसरी किसत को पैसो नी अायो, सरपंच के कि म्हारे पैसो दो, सेकेटरी के म्हारे दो किन किन के दू ? पेली किसत के टेम  5 हजार दोनों के बाल (पटक) दिया था। मसानधक्या होन को पेट ही नी भराय।

पइसा का बात निकली तो राजू का दायजी मे तमे बतऊं उनी रामपरसादिया (रामप्रसाद) के जमीन कुओ खुदे है समदा (सभी) देहाड़िया पइसा काजे इनंग-उनंग मूंह ताके पन दो मइना होने चलो एक छदाम नी मिली। पंचायत वाला के उपर से नी आयो पइसा। ओर उनी रामप्रसादा की रोज जान खावे देहाड़किया होन, अब वो बिचारो कई करे। विधायक जी भी नी सुने __उनके कने जाओ तो वी कें कि "हूं कईं करुं" कुर्सी पे चोड़ल्ला ही चोड़ल्ला बठिगया। कसे कईं करां वो वो दोलिया (दुली चंद्र) की यहा से लाड़ी (संपत बाई) भी परेसान है इनी बात को रोज रोनो रोय है....
ये कुच्चदयो लुकड़नों (लाकडाउन) कब खतम होयेगो। बताए् ओ के बाद कुछ सूज समज पड़े। अब जसो कईं होयगो देख लांगा_तम तो रोटा लगाओ....

राजेश शर्मा 

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