लेखिका 

है अकेला ही जला
वो दीप जो पथ तम का है।
चीर कर घनतम अंधेरा
पथ प्रदीप्त जग जन का है।

कब तलक भय संकटों का
मेघ बन घन छाएगा।
बन वृतासुर भय का बादल
चढ़ कर सिर मंडराएगा।।

छट ही जाएगा ये कोहरा
जो कोरोना बन कर ठहरा।
काली बिपदा काल बनकर
दे रहा है जग में पहरा ।।

डर सहम कर ज़िन्दगी क्या
वो मनुज जी पाएगा।
छोड़ दें जो मुस्कराना 
वो विजय क्या पायेगा।।

आज सहमी है फिजा में
डाली की हर एक कली।
फूल बनकर जब खिलेगी
बागवां   मुस्कराएगा ।।

एक सूरज आसमां में
विश्व को देता उजाला
चांद बनकर चांदनी में
ज्योति वो बिखराएगा।।

हैं अदृश्य सा जो जगत में
वो पिघल ही जाएगा।
रो रहे हर शख्स के लब
 को  हंसी दे जाएगा।।


आर्यावर्ती सरोज "आर्या"लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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परिचय


 आज हम साहित्य सोपान में परिचय कराने जा रहे हैं आर्यावर्ती सरोज "आर्या" से... जो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से हैं। आप कवयित्री / कहानीकार  / उपन्यासकार  / गीतकार के रूप में अपनी साहित्य यात्रा को जारी रखें हुए हैं। आपका उपन्यास -- छोटी मालकिन, कहानी संग्रह  --  कुछ पन्ने ज़िन्दगी के, काव्य संग्रह --  सरोज काव्य मंजरी और 16  साझा संग्रह  प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी कहानी "बूढ़ी अम्मा"  सी बी एस सी बोर्ड के पाठ्यक्रम में आठवीं कक्षा में  शामिल है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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