लेखिका 

 प्रेम


तुम प्यार हो,
तुम जीवन हो,
तुम प्राण हो,
तुम आत्मा हो,

तुम और क्या हो.....मैं नहीं जानती
पीती हूँ तेरी यादोँ को
अहसासों को
इक-इक बूँद कर 
रूक जाती हूँ, 
डरती हूँ...लूँगीं और कहाँ से 
कभी गर हो गयी रीती
प्रीत की गगरी...तुम्हारी मेरे लिये......

प्रिय
ऐसा क्यूँ लगता है
लिपटे हो "हम"बन
मुझमें मेरे लिये..........
और मेरी पहचान 
तुममे सिमटी पुरानी सी है.......
क्यूँ हो जाता है...मुझे
प्रेम तुम्हारे हर इक ज़ज्बात से......

क्यूँ फिरती हूँ .......चंचल 
नदी बन बेचैन 
हर पल खामोश सागर 
से मिलन को ...........
वो मिलन के हसीन लम्हे.............
वो तुम्हारा जादुई स्पर्श
ले मैं उड़ चलती हूँ.........
अनन्त आकाश में
क्यूँ खो जातीं हूँ मैं.ख्वाबों में  .........।

दिल की जमीन 
पर उभरते हैं,पलते हैं 
उतर आते हैं .....वो 
अनकहे-अहसास,
और उनके साये में
जो रंगीन सपने ....देखे थे
मिल मैंने तुमने.........
जगमगाते है उम्र भर
आँखों में हर पल जुगनुओं की तरह.....
शायद ....
यही "प्रेम"है..........!!"

किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"
नोयडा
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अहसास

अहसास तेरे 
शब्दों के अर्थ 
बदल देते हैं..........
मेरे अहसासों के
और वे अहसास 
डुबोते हैं मुझे
कहीं गहरे 
अन्तस तक
प्रेम की पराकाष्ठा में
जहाँ मैं....तू मिल कर 
बस तू ही तू में 
विलीन हो जाते है.......
शायद यही तो "प्रेम" है
उस परमात्मा की .......
पूर्ण-अनुपम 
"अलौकिक कृति"

किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा" नोयडा

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