लेखिका
माया अपने ससुराल आ गई। ससुराल मे बहुत लम्बा परिवार था। माया के हाथों की मेहंदी का रंग अभी छुटा भी नही था कि ससुराल के लोगों ने उससे सारा काम करवाना शुरू कर दिया।उस समय गांव मे स्वयं चकरी से गेहूं पीसकर आटा तैयार किया जाता था अतः माया भी चकरी से गेहूं पीसकर आटा तैयार करती थी फिर घर के सभी सदस्यों के लिए चूल्हे पर खाना पकाती।जब घर के सभी सदस्य खाना खा लेते थे तब वह खाना खाने बैठती थी कभी उसे खाने में एक रोटी मिलती तो कभी एक भी नही वह भूखे ही सो जाती। कुछ समय बाद माया गर्भवती हो गई। माया ने एक बेटी को जन्म दिया बेटी सुनते ही ससुराल के लोग उससे नाराज हो गए और उसे कोसना शुरू कर दिया।इसी तरह माया ने चार बेटियों को जन्म दिया। बेटीयों के जन्म के बाद ही सास माया को ठंडे पानी से नहला देती थी , बेटियों के साथ भी अच्छा बर्ताव नही करती थी।गांव वालों को दिखाने के लिए खूब मेवे डालकर सिठौरा बनाया परन्तु माया को कभी भी लड्डू खाने को नही दीया। कोठरी मे छुप कर सभी लड्डू सास खुद का गई। माया बहुत कमजोर हो गई थी अब उसको अक्सर बुखार हो जाता था ससुराल वालों ने उसका इलाज नही करवाया बल्कि उसको र्निवसीन कहके मायके भेजवा दिया। अवध शंकर (पिता) को जब माया के बारे मे सब कुछ पता चला तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने माया को डाक्टर को दिखाया,डाक्टर ने बताया कि माया को TB हो गया है। बहुत दिनों तक माया का इलाज हुआ तथा माया के स्वास्थ्य मे काफी सुधार हो गया। अवध शंकर ने माया के ससुराल वालों को एक सख्त चिट्ठी लिखी।ससुराल वाले आये और माया को अपने साथ ले गए ।
माया हमेशा की तरह घर के काम में लग गई कुछ सालों बाद माया फिर से गर्भवती हो गई। ससुराल वालो का अत्याचार दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था।माया की सांस राम(बेटा)की दूसरी शादी के लिए जोर देने लगी।राम ने दूसरी शादी करने से इंकार कर दिया। माया अपनी चारों बेटियो के लालन-पालन मे लग गई। कुछ सालो बाद माया फिर गर्भवती हो गई। उसको पांचवीं सन्तान भी बेटी हुई।एक तरफ वंश चलाने का दबाव दूसरी तरफ ससुराल वालों के अत्याचार से माया तंग आ चुकी थी। उसने आत्महत्या करने की ठान ली और चल पड़ी ट्रेन से कटकर मरने। कुछ गांव वालो ने उसे देख लिया तथा समझा बुझाकर उसे घर वापस ले आए। बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी।अतः राम(पती) माया को बेटियों के साथ शहर ले आया।बेटियां स्कूल जाने लगी सभी खुश थे।माया पुनः गर्भवती हो गई नौ महीने बाद माया को एक बेटा हुआ सब बहुत खुश थे परन्तु माया बहुत कमजोर हो गई थी।वंश तो चल गया परन्तु माया का देहांत हो गया।
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प्रियंका त्रिपाठी, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त प्रियंका जी को साहित्य के प्रति विशेष लगाव रहा है। इसी लगाव के चलते आपकी सृजनशीलता निरंतर जारी है। आपकी रचानाओं का प्रकाशन समय समय पर विभिन्न मंचों से होता रहता है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।
संपादक
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चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोये
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय
.... संत कबीर के इस दोहे को गृहस्थी से जोड़ कर देखा जाता है.....। माया.... निर्वंशी कहानी की नायिका ....... परिवार की जिम्मेदारियों.... और अपने नैतिक कर्तव्यों.. के दो पाटों के बीच फंसकर.... ताउम्र पिसती रहती है.... लेकिन पति राम... अपनी माया को समेट कर... शहर चला जाता है...। तब कहानी में सास को अहसास.... होता है कि..... न माया मिली..... न राम....।
नारी के शोषण के लिए...... नर से ज्यादा नारी ही जिम्मेदार है.... यह कहानी भी कहती है...। यह सीधा और..... प्रकाश की तरह... सरल रेखा में गमन... करने वाला कथानक... बेटों को.... बेटियों की तुलना में मिलने वाली ज्यादा तवज्जो.... की सच्चाई को एक बार फिर उजागर करता है....। बेटा या बेटी के जन्म के लिए... पुरुष की भूमिका.... को मेडिकल साईंस द्वारा तय कर दिए जाने के बाद भी.... कटघरे में नारी को ही खडा किया जाना.. आज भी बदस्तूर जारी है...। इस दकियानूसी सोच को पढ़े लिखे लोग भी... समय आने पर.... कलेजे से चिपकाए नजर आते हैं.....। बहरहाल माया ने जितने बच्चों को जन्म दिया... उतनी ही बार उसने भी पुनर्जन्म पाया है.... इस बात को कहानी बहुत ही मौनता के साथ.. मुखरित करती है... लेकिन उस स्वर को नहीं सुन पाने का परिणाम माया का.... वंश के अंश को जन्म देते ही.... परलोक गमन के रूप में सामने आता है....। अपने अर्थ और उद्देश्य.. दोनो की पूर्ति.... यह कहानी अपने.. देशज अंदाज में करती है....। बधाई प्रियंका जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक
निर्वंशी....
माया, जिसने अपने बचपन में माँ के आँचल की छाँव को महसूस नही किया लेकिन पिता अवध शंकर दूर शहर में नौकरी की वजह से अपने दो छोटे भाइयों को गाँव में रहकर ममता लुटाने की जिम्मेदारी जरूर निभानी पड़ी। अपनी चाची के घर रहते हुए ही तेरह साल की उम्र मे माया की शादी हो गई। समय गुजरते कहाँ देर लगती है....जब वह 18 साल की हुई तब उसके पिता ने बड़े धूम-धाम से उसका गौना किया तथा नम आंखों से उसकी विदाई की।माया अपने ससुराल आ गई। ससुराल मे बहुत लम्बा परिवार था। माया के हाथों की मेहंदी का रंग अभी छुटा भी नही था कि ससुराल के लोगों ने उससे सारा काम करवाना शुरू कर दिया।उस समय गांव मे स्वयं चकरी से गेहूं पीसकर आटा तैयार किया जाता था अतः माया भी चकरी से गेहूं पीसकर आटा तैयार करती थी फिर घर के सभी सदस्यों के लिए चूल्हे पर खाना पकाती।जब घर के सभी सदस्य खाना खा लेते थे तब वह खाना खाने बैठती थी कभी उसे खाने में एक रोटी मिलती तो कभी एक भी नही वह भूखे ही सो जाती। कुछ समय बाद माया गर्भवती हो गई। माया ने एक बेटी को जन्म दिया बेटी सुनते ही ससुराल के लोग उससे नाराज हो गए और उसे कोसना शुरू कर दिया।इसी तरह माया ने चार बेटियों को जन्म दिया। बेटीयों के जन्म के बाद ही सास माया को ठंडे पानी से नहला देती थी , बेटियों के साथ भी अच्छा बर्ताव नही करती थी।गांव वालों को दिखाने के लिए खूब मेवे डालकर सिठौरा बनाया परन्तु माया को कभी भी लड्डू खाने को नही दीया। कोठरी मे छुप कर सभी लड्डू सास खुद का गई। माया बहुत कमजोर हो गई थी अब उसको अक्सर बुखार हो जाता था ससुराल वालों ने उसका इलाज नही करवाया बल्कि उसको र्निवसीन कहके मायके भेजवा दिया। अवध शंकर (पिता) को जब माया के बारे मे सब कुछ पता चला तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने माया को डाक्टर को दिखाया,डाक्टर ने बताया कि माया को TB हो गया है। बहुत दिनों तक माया का इलाज हुआ तथा माया के स्वास्थ्य मे काफी सुधार हो गया। अवध शंकर ने माया के ससुराल वालों को एक सख्त चिट्ठी लिखी।ससुराल वाले आये और माया को अपने साथ ले गए ।
माया हमेशा की तरह घर के काम में लग गई कुछ सालों बाद माया फिर से गर्भवती हो गई। ससुराल वालो का अत्याचार दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था।माया की सांस राम(बेटा)की दूसरी शादी के लिए जोर देने लगी।राम ने दूसरी शादी करने से इंकार कर दिया। माया अपनी चारों बेटियो के लालन-पालन मे लग गई। कुछ सालो बाद माया फिर गर्भवती हो गई। उसको पांचवीं सन्तान भी बेटी हुई।एक तरफ वंश चलाने का दबाव दूसरी तरफ ससुराल वालों के अत्याचार से माया तंग आ चुकी थी। उसने आत्महत्या करने की ठान ली और चल पड़ी ट्रेन से कटकर मरने। कुछ गांव वालो ने उसे देख लिया तथा समझा बुझाकर उसे घर वापस ले आए। बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी।अतः राम(पती) माया को बेटियों के साथ शहर ले आया।बेटियां स्कूल जाने लगी सभी खुश थे।माया पुनः गर्भवती हो गई नौ महीने बाद माया को एक बेटा हुआ सब बहुत खुश थे परन्तु माया बहुत कमजोर हो गई थी।वंश तो चल गया परन्तु माया का देहांत हो गया।
प्रियंका पांडेय त्रिपाठी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश------------------------
परिचय
प्रियंका त्रिपाठी, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त प्रियंका जी को साहित्य के प्रति विशेष लगाव रहा है। इसी लगाव के चलते आपकी सृजनशीलता निरंतर जारी है। आपकी रचानाओं का प्रकाशन समय समय पर विभिन्न मंचों से होता रहता है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोये
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय
.... संत कबीर के इस दोहे को गृहस्थी से जोड़ कर देखा जाता है.....। माया.... निर्वंशी कहानी की नायिका ....... परिवार की जिम्मेदारियों.... और अपने नैतिक कर्तव्यों.. के दो पाटों के बीच फंसकर.... ताउम्र पिसती रहती है.... लेकिन पति राम... अपनी माया को समेट कर... शहर चला जाता है...। तब कहानी में सास को अहसास.... होता है कि..... न माया मिली..... न राम....।
नारी के शोषण के लिए...... नर से ज्यादा नारी ही जिम्मेदार है.... यह कहानी भी कहती है...। यह सीधा और..... प्रकाश की तरह... सरल रेखा में गमन... करने वाला कथानक... बेटों को.... बेटियों की तुलना में मिलने वाली ज्यादा तवज्जो.... की सच्चाई को एक बार फिर उजागर करता है....। बेटा या बेटी के जन्म के लिए... पुरुष की भूमिका.... को मेडिकल साईंस द्वारा तय कर दिए जाने के बाद भी.... कटघरे में नारी को ही खडा किया जाना.. आज भी बदस्तूर जारी है...। इस दकियानूसी सोच को पढ़े लिखे लोग भी... समय आने पर.... कलेजे से चिपकाए नजर आते हैं.....। बहरहाल माया ने जितने बच्चों को जन्म दिया... उतनी ही बार उसने भी पुनर्जन्म पाया है.... इस बात को कहानी बहुत ही मौनता के साथ.. मुखरित करती है... लेकिन उस स्वर को नहीं सुन पाने का परिणाम माया का.... वंश के अंश को जन्म देते ही.... परलोक गमन के रूप में सामने आता है....। अपने अर्थ और उद्देश्य.. दोनो की पूर्ति.... यह कहानी अपने.. देशज अंदाज में करती है....। बधाई प्रियंका जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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