(साहित्य का सोपान)
लेखिका |
जूनून..!
..."यह क्या दिनभर लिखा करती हो तुम.. और यह देखो कितने कागज़ बर्बाद किए है तुमनें",
वसुधा एक हाथ में झाड़ू लिए अपनी बेटी अनु के कमरे को साफ़ करती बड़बड़ा रही थी, "रहने दो माँ मै यह सब कर दूँगी जब तक एक सटीक सार्थक कहानी नही मिलेगी तब तक यह इसी तरह फैला रहेगा।"
अनु माँ को समझा रही थी। पर वसुधा बस बड़बड़ किए जा रही थी।
कहानी लेखन प्रतियोगिता थी और उत्कृष्ठ कहानी को प्रशस्ति पत्र के साथ इक्कीस हज़ार का इनाम था। उत्कृष्ठ कहानी पर एक शॉर्ट फ़िल्म भी। औरों के लिए यह महज़ एक प्रतियोगिता थी।पर अनु के लिए एक ख़्वाब... इस कहानी पर उसका सपना टिका था एक उम्मीद टिकी थी।वह पूरी मेहनत से अपनी कहानी के एक एक किरदार को असलियत का जामा पहना रही थी । हर हाल में उसे यह प्रतियोगिता जीतनी थी ।अंतिम तिथि नज़दीक आ रही थी और अनु उतनी ही सजग। प्रतियोगिता का दिन भी आ गया और कहानी शामिल भी हुई। अगले दिन परिणाम भी आ गया। कॉलेज का हॉल भरा हुआ था सारे प्रतियोगी अपने अपने परिणाम का इंतज़ार कर रहें थे। अनु फिंगर क्रॉस कर एक कोने में ख़ड़ी सिर्फ दुआ कर रही थी, प्रतियोगिता के नियम के अनुसार उत्कृष्ठ पाँच चुने जाने थे और उन #पांच में से एक विजेता। खैर पांच विजेताओं में से अनु भी एक थी और अब वह मंच से होने वाली घोषणाओं में नम आँखों और धड़कते दिल से प्रथम रचनाकार का नाम सुनने को आतुर भी। शोर गुल में उसका नाम प्रथम रचनाकार के रूप में लिया गया तो उसे कुछ सुनाई नही दे रहा था वह बस आँख बन्द किए खड़ी थी। स्नेहा ने जब उसे झिंझोड़ा तब उसे यकीन हुआ की विजेता वही है। उसकी रचना..."जूनून "....को निर्णायक मंडल ने प्रथम स्थान दिया था। कई दिनों की ज़ुनूनियत ने आज उसे एक मुकाम पर पहुँचा ही दिया था आख़िर।
वह पुरस्कार राशी और अपनी कहानी के साथ माँ के सामने खड़ी थी। उसका जूनून आज नए आयाम को आगाज़ दे रहा था।और वसुधा आँखों में आँसु लिए एक टक अपनी लाड़ली को निहार रही थी। ...!!
"स्वरा" सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ, (यू पी)
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