सरकार के स्कूल चलें से उपजा प्रश्र, क्यों स्कूल जाए विद्यार्थी..?
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स्कूल में बच्चों की कैसे होगी स्क्रीनिंग,
चिकित्सक एक फोन पर स्कूल पहुचंगेे यह जिम्मेदारी कौन लेगा ?
कोरोना के बीच छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कांउसलर रखने की व्यवस्था क्या सरकारी स्कूल में संभव है ?
सुधीर पाठक
सरकार का काम हैं आदेश जारी करना और अधिकारियों का काम है आदेश का पालन कराना। लेकिन बात कोरोना संक्रमण के बीच
केंद्र सरकार के 15 अक्टूबर से स्कूल, कॉलेज, कोचिंग खोलने की गाइड लाईन से जुड़ी हैं, वैसे राज्य सरकार को यह अधिकार दिए गए हैं कि वह शिक्षण संस्थान खोले या बंद रखे।
...बात यहा तक तो ठीक हैं, लेकिन स्कूलों में डाक्टर और नर्स की व्यवस्था कैसे होगी? हर क्लास के बच्चों के आने-जाने का समय अलग-अलग कैसे निधार्रित होगा? बच्चों को स्कूल बुलाने के लिए पालक या माता-पिता की लिखित सहमति कौन लेकर आएगा? और सबसे बड़ा प्रश्न तो यहि इस संक्रमण काल में शिक्षक शिक्षिकाएं क्यों घर-घर जाएं? उनकी सुरक्षा की कौन गारंटी लेगा?
यही वह सवाल हैं, जो स्कूल खुलने के पहले ही उत्तर की मांग कर रहे हैं...
शिक्षा विभाग की बात की जाए तो जो अनुभव हैं, उसके आधार पर यह कहा जा सकता हैं कि राजधानी में आसीन अधिकारी ग्राम्यांचलों की स्थिति से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उनके अनेक निर्णय इसकी बानगी हैं। प्रदेश सरकार के अधिकारियों को यह जानकारी होना चाहिए कि दशहरा से दीपावली तक ग्राम्यांचलों में और उन कस्बों तथा तहसीलों में जहा की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित हैं, इस समय पूरा परिवार कृषि कार्य में व्यस्त रहता हैं।
प्रदेश के अमूमन सभी तहसीलों की अर्थ व्यवस्था भी कृषि आधारित हैं। ऐसे में यदि 15 अक्टूबर से केंद्र सरकार के निर्देश का पालन राज्य सरकार करे तो ग्राम्यांचलों के स्कूलों में बच्चों का पहुंचना आसान नहीं हैं, तहसील मुख्यालयों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हैं। राजधानी भोपाल से सटे सीहोर जिले की बात करें तो तहसील मुख्यालय आष्टा-जावर,इछावर,नसरुल्लागंज,में चिकित्सकों और पेरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी हैं। स्वास्थ्य विभाग के अन्य कर्मचारियों का भी टोटा हैं। ऐसे में यह कल्पना कैसे की जा सकती हैं कि डाक्टर और नर्स एक फोन पर स्कूल में उपलब्ध हो जाएंगे? बड़ा सवाल यह हैं कि जब कोरोना संक्रमण इस तहसील में तेजी से बड़ रहा हैं और सरकारी आंकडे ही इसकी भयावहता को खुद रेखांकित कर रहे हैं, तो फिर कौन पालक होगा जो अपने बच्चों को असुरक्षित माहौल में स्कूल भेजेगा?
... यहां बात सरकारी स्कूलों की हो रही हैं, जिन स्कूलो को सरकार की नीति के चलते विद्यालय से भोजनालय में बदल दिया गया हो, वहां पर यह कैसे संभव हैं कि स्कूल में हर क्लास में बच्चों के आने-जाने का समय अलग-अलग होगा? सरकारी स्कूलों में सरकारी नीति के चलते बच्चों का प्रवेश ही पालक नहीं करा रहे हैं। ऐसे अनेक सरकारी स्कूल हैं जहां पर्याप्त साधन नही, बैंठने की व्यवस्था नही, ऐसे में सरकारी स्कूलों में कौन रोज पूरा परिसर सैनिटाईज करेगा? कौन कोरोना संक्रमित परिवार के बच्चों को घर में पाठ्य सामग्री पहुंचाएगा? यह वह सवाल हैं जो बच्चों और शिक्षकों दोनो के जीवन को खतरे में डालते हैं? पूछा जाना चाहिए कि जिन स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था सरकार नही कर सकी, उन स्कूलों में किस मद से एवं किस आदेश से कैसे पूरा स्कूल परिसर सैनिटाईज होगा? और इसे कौन करेगा? प्रशासन के आदेश का पालन कराने में राजस्व विभाग खुद ही अपने कार्यालय और परिसर में आने वाले लोगो को मास्क नहीं लगाने पर स्वंय को असहाय महसूस कर रहा हैं, तो फिर शिक्षा विभाग, डाक्टर तो दूर नर्स तक को नहीं बुला सकता। सरकार को निर्णय से पूर्व इन सवालों के जवाब देना होगा? वरना कौन अपने नोनिहालों को स्कूल भेजेगा? जरूरी हैं जीवन को बचाना। क्योंकि कहावत हैं कि जान हैं, तो जहान हैं...
वैसे सरकार ज्यादा फिक्रमंद हैं, तो अपने पार्टी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को इस काम में जुटा दे। वे बच्चों के घर भी पहुंच जाएंगे और पालकों से लिखित सहमति भी ले आएंगे और संक्रमण में डाक्टर की जरूरत पड़ी तो पार्टी की सत्ता होने के नाते डाक्टर-नर्स को भी ले आएंगे और लगे हाथ कांउसलर की भी व्यवस्था कर देंगे, काश ऐसा हो?
सुधीर पाठक

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