समीक्षक
संतुलन : सिद्धांत व व्यवहार में सामंजस्य बनाता आलेख।
आज एमपी मीडिया पाइट डॉट कॉम के साहित्यिक कोने में संपादक भाई शैलेश तिवारी जी की लेखनी से फूटे सोते ने ध्यान आकृष्ट किया और उनके शब्दों व सोच में अद्भुत साम्य महसूस किया।
अक्सर नववर्ष के अवसर पर जनमानस दो धड़ों में बँट जाता है। एक आंग्ल कैलेंडर के अनुसार मनाने वाला तथा दूसरा सनातन परम्परा व हिन्दू संस्कृति की पैरवी करने वाला।
इस पृष्ठभूमि को जमीन बनाकर शैलेश जी ने उन लोगों को करारा तमाचा मारा है जो अपने अल्प ज्ञान व संकुचित सोच की वजह से मन में कुंठा पाले हुए हैं और अपनी कुंठा को समाज पर थोपना भी चाहते हैं।
इस आलेख में प्रयुक्त कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाना चाहूँगा।
शैलेश जी ने लिखा है, "हमारी सोच में संस्कृति का सिद्धांत तो है... लेकिन व्यवहार में आंग्ल कैलेंडर है।"
विचारणीय बिन्दु है यह। विचारना यह है कि हममें से कितने लोग व्यावहारिक जीवन में हिन्दू संस्कृति के पञ्चांग का पालन करते हैं। जन्म दिनांक व जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ अथवा अन्य किसी भी अवसर को हम किस रूप में मान रहे हैं।
यह बात प्रमाण है शैलेश जी के चिंतन के परिणाम से उपजी पंक्ति "हमारे सिद्धांत और व्यवहार में भिन्नता है" से भी सहमत हूँ मैं।
एक स्थान पर वो कहते हैं "हम ज्ञान और विज्ञान के पक्ष-विपक्ष में उलझे रहते हैं" बिल्कुल सही है।
दरअसल हम मौकापरस्त हो चुके हैं। जब जिस तरफ खीर मिले साझे तथा महेरी देख न्यारे हो जाते हैं।
हमारा यह दोहरा व्यवहार हमारी शैली बन जीवन में समाहित हो गया है।
इस दोहरे आचरण में लिप्त हम भूल गये हैं कि ज्ञान और विज्ञान से इतर प्रज्ञान भी महत्वपूर्ण है उन्नति व विकास के लिए अन्यथा हम संस्कृति के ढोल के नाद में बहरे होकर विज्ञान के उन सिद्धांतों को सुनने से वंचित रह जायेंगे जो आधार हैं संस्कृति का।
अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए अंत में शैलेश जी ने आंग्ल दिनांक व हमारी धार्मिक तिथियों का तुलनात्मक अध्ययन रखा है यह बताने के लिए कि जब तक हमें तत्व ज्ञान न हो, अपने अल्प ज्ञान से कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए।
समसामयिक परिदृश्य में जब चहुंओर अलगाव व वैमनस्य चरम पर है, मानवता सिसक रही है तथा संवेदनाएँ मृतप्राय पड़ी छटपटा रही हैं, यह आलेख और प्रासंगिक बन गया है।
बहुत बधाई देना चाहूँगा शैलेश तिवारी जी को इस आलेख के लिए जो धर्मांधता से मुँद रही आँखों को खोल रहा है।
-मुकेश दुबे 🖋️
-------------------परिचय
समीक्षक सीहोर से हैं और लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं । शासकीय सेवाओं को देते रहने के बावजूद आपकी साहित्य के प्रति रुचि आदरणीय है। आपकी लेखनी का एमपी मीडिया पाइंट को सौभाग्य प्राप्त हुआ। आभार
राजेश शर्मा


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