शैलेश तिवारी 


संतुलन.... 

आईने के सामने खड़े होकर निहारा एक बार खुद को...। सफेद पाजामा और उस पर रंगीन लंबा सा कुर्ता उसके एकहरे लेकिन बलिष्ठ जिस्म पर फब रहा था...। गिरे हुए तापमान में भी खुद को ऊँचा उठाने में लिबास का भी अपना महत्व है...। संदीप ने जाकेट पहनी और माथे पर लगे तिलक के गोले गुनिये चेक कर... बाहर निकला। एक बार सर की चोटी को भी सीधे हाथ से सहला कर इत्मिनान किया उसके यथास्थान होने का...। 
हालांकि कार्यक्रम शुरू होने में अभी समय था पूरा एक घंटा... लेकिन बालसखा किशोर और उसके गायक साथियों के कराओके फिल्मी गानों के प्रोग्राम में वक्त से पहले पहुँच कर व्यवस्थाओं में हाथ बँटाना उसने परम कर्तव्य मान लिया.। सर्द हवाओं की चुनोतियाँ स्वीकार करते हुए दस मिनट में ही कार्यक्रम स्थल पर बाइक को खडा कर दिया। 
सांस्कृतिक भवन के हाल के बाहर ही एक आधुनिक वेशभूषा वाले आकर्षक व्यक्तित्व ने उसका ध्यान खींचा...। जींस पर शानदार जैकेट पहने हुए...जनाब का व्यक्तित्व चुंबकीय और असल उम्र को अंगूठा दिखा रहा था...। पहले कभी इन्हें देखा नहीं...।  लेकिन उसके चेहरे का ओज और तेज बता रहा था कि .. भाई कुछ अलग ही है। ... और मैं जानता भी कैसे... अभी तो गाँव से यहाँ शिफ्ट हुआ हूँ...। आते ही संगठन की बैठकों.... और अधिकारियों से मिलने मिलाने के साथ..... संगठन के महासचिव के उत्तरदायित्व... को निभाने में वक्त कब बीत जाता... इसका पता बिस्तर पर लेटते वक्त ही होता... कि लो एक दिन और गुजर गया..। आने वाले कल की रणनीति बनाते बनाते.... सुबह ही नींद खुलती। 
सामूहिक ठहाके की आवाज ने उस को फिर से सांस्कृतिक भवन के प्रांगण में ला खडा किया....। हर आने जाने वाले से उसकी आत्मीयता से होती मुलाकात .... बता रही थी उसकी लोकप्रियता को...। बराबरी वालों से गले मिलना.... बड़ों के चरण स्पर्श करना.... छोटे आते पैर पड़ने तो... बाँह से पकड़कर गले लगा लेना...उसकी नेतागिरी के गुणों का बयाँ करने को काफी थे...। आसपास में कालेज के युवाओं की जमा खासी संख्या उसके.... हरफनमौला चरित्र की चुगली भी कर रही थी.... मैं हैरान तो तब रह गया जब.... आने वाली किसी भी उम्र की महिला.... पूरी श्रद्धा के साथ उसके चरण स्पर्श करती.... सबसे हैप्पी न्यू ईयर... का कहा जाने वाला उसका जुमला.... मेरे दिल को हर बार अंदर तक घायल कर देता.... आखिर हम भारतीयों का नव वर्ष... चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर आता है... उस समय इनके मुँह में ताले लग जाते हैं... अभी देखो ईसवी सन् की बधाई कितने खुशी खुशी ली और दी जा रही है...। इतने में ही संगठन के संयोजक और अध्यक्ष महोदय का चोपहिया वाहन... अपने पूरे रुआब के साथ प्रवेश करता है.... वाहन रुकता है.... गेट खुलते हैं.... दोनो पदाधिकारीयों की नजर उतरते ही उन महानुभाव पर पड़ती है.... वे उनकी तरफ ही बढ़ जाते हैं... और उन महाशय के पैर छूने के लिए... उनके घुटनों तक उनके हाथ जाते हैं... वो सज्जन उन्हें भी गले से लगाते हैं....। मैं भी लपक कर वहीं पहुँच जाता हूँ....। हमारे पदाधिकारी मेरा परिचय उनसे कराते हैं.... भाई साहब यह संदीप जी हैं.... संगठन के महासचिव.... अभी गाँव सेमरा से यहां शिफ्ट हुए हैं... संगठन का दायित्व निभाने के लिए.....। उन महोदय ने गर्मजोशी से मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा ... आपका नगर में स्वागत है...। जो अगली बात उनके मुँह से निकली.... उस बात ने मुझे काफी आश्चर्यचकित कर दिया....। उन्होंने कहा ...." संदीप जी" .... वह बात पूछ लीजिये... जो आप बहुत देर से पूछना चाह रहे हैं....।   यह था वो अचरज कि इन्होंने कैसे जाना कि मैं इनसे कोई सवाल करना चाहता हूँ....? ...ये कैसे जाना.....इनकी ये जाने.... मुझे तो मुँह मांगी मुराद मिल गई थी जैसे.....। अब तक भीड़ हाल में प्रवेश कर चुकी थी..... इक्का दुक्का से लोग ही बाहर थे....। उन्होंने अपना स्नेह भरा हाथ मेरे कंधे पर रखा.... और मुख्य धारा से कुछ पीछे हटा कर खुद ही ले गए...। 

मैंने भी अपने अंदर काले काले मेघों की तरह  के उमड़ घुमड़ रहे सवाल को.... उनकी तरफ उछाल दिया... " आप जैसा व्यक्तित्व भी अगर आंग्ल वर्ष की बधाई देगा.... भाईसाहब... तो हमारी संस्कृति... का मटियामेट हो जाना तय है.....। "  उनके चेहरे की गहरी मुस्कान ने मुझे भी अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयास किया.... लेकिन मैं केवल जवाब सुनना चाहता था.... और अपनी संस्कृति के प्रति उनके मन में भाव जगाना चाहता था.... हाल के अंदर के प्रोग्राम से ज्यादा जरूरी मुझे ये लग रहा था....। 
वह कुछ देर के लिए खामोश होकर.... शून्य को ताकने लगे...। अब तक मेरे अंदर के अहंकार ने जीत जाने की कगार पर खड़े विजेता की तरह...अपनी अंगड़ाई ले ली थी....। 

तभी उनके मुख से मेरे लिए सवाल निकला... आज तारीख क्या है?.... मैंने कहा 31 दिसंबर...।... सन् कौन सा है... ? अगला जवाब मेरा था... 2019....। मैं उलझन में था सवाल का जवाब सवाल क्यों किया जा रहा है...। तभी अगला सवाल सुना मेरे कानों ने.... आज किस भारतीय माह की कौन सी तिथि है..?.... उनके इस प्रश्न ने तो मुझे निरुत्तर ही कर दिया.....। मेरे कंधे को सहलाते हुए वे बोले... आज पौष शुक्ल पक्ष की उदया तिथि पंचमी है.... विक्रम संवत 2076 शालि वाहन शक संवत 1941..। उनकी जानकारी ने मुझे कुछ पशोपेश में डाल दिया था...। मेरे अंदर का शुरुआती विजेता अब हार महसूस कर रहा था......। तभी उनकी धीर गंभीर आवाज सुनाई दी....संदीप जी आपके पास संस्कृति का सिद्धांत तो है.... लेकिन व्यवहार में आंग्ल कैलेंडर ही है..। यही हमारी चूक है.....। हमारे सिद्धांत और व्यवहार में भिन्नता है....। जब तक दोनों में संतुलन नहीं होगा.... तब तक हम ज्ञान और विज्ञान के पक्ष या विपक्ष में उलझे रहेंगे....। हमारे कदम उस प्रज्ञान की तरफ नहीं बढ़ पाएंगे.... जो संस्कृति के ज्ञान को सहेजना और विज्ञान को अपनाने के साथ उन्नति की तरफ ले जाते हैं....। हम एक ही तरह से न सोचे... विचारों को व्यापकता के साथ अपनाने की जरूरत है आज की.....। अब मुझ को समझ आ रहा था इनका लोकप्रिय होने का राज....आधुनिक वेश भूषा और पारंपरिक सांस्कृतिक ज्ञान का अनूठा संगम देख रहा था मैं.....।
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परिचय 

कहानीकार शैलश तिवारी मप्र के ख्यातनाम विचारक,लेखक,चिंतक,साहित्यकार, प्रवचक है वह पूर्व मे राष्ट्रीय स्तर के हिंदी अंग्रेजी समाचारपत्रों के पत्रकार रहे; वर्तमान मे वह एमपी मीडिया पाइंट के संपादक हैं। शैलेश जी की सेवाओं को पत्रकारिता का क्षेत्र और साहित्य जगत कभी नहीं भुला पाएगा।
राजेश शर्मा 
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