क्या होगा अनुयायियों का...
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से तौबा करते हुए बुझी भाजपा की ज्योति जला दी,राजनीतिक गलियारों मे जान फूंक दी। कमलनाथ सरकार के स्थिर और अस्थिर रहने के सवाल कईयों को रोजगार दिए हुए हैं।
ज्ञान प्राप्त करना हो तो चिंता करना जरुरी है। चिंतन या तो पहाड़ पर होता है या छोटी सी कुटिया में। सिंधिया पहाड़ पर चिंतन कर रहे हैं और उनके अनुयायी कुटिया मे। दोनों के चिंतन मे भारी अंतर है। पहाड़ वाले पहाड़ी का रास्ता खोज रहे हैं और कुटिया वाले गुफा का।
वैसे राजनीति मे तरबतर लोगों की एकमात्र चिंता "सत्ता" रहती है। कोई नहीं जानता आप क्या चिंतन कर रहे हैं लेकिन "साहित्य" जानता है कि फिलहाल आप किस दशा मे हैं और किस दिशा को भुगत रहे हैं।
सिंधिया ऐसे गए जैसे घर का कोई वरिष्ठ, अब बच्चे क्या करें---अनाथ हो गए। उनके साथ या फिर??
लाभ जोंक को सीने से लगाए रखने,खून पिलाकर मीठा-मीठा मजा लेने मे नहीं, जोंक को निकालकर फेंकने मे होगा।
सिंधिया के अनुयायी सांप-सिड़ी के इस खेल मे वहीं पहुंच गए जहां से उन्होंने राजनीति की शुरुआत की थी। मप्र के ग्रामीण क्षेत्रों से उभरते कांग्रेस नेता अनाथ हो गए। यदि वह भाजपा मे जाते हैं तो कोई पूछ-परख नहीं। इधर कांग्रेस मे "आका" नहीं रहा।
सत्ता बदले या न बदले लेकिन सिंधिया (महाराज साहब) के अनुयायी "सिंधिया चालिसा" पढ़ने वाले इस समय मुसीबत मे हैं। फिलहाल पोजिशन यह है कि कहावतानुसार धोबी के कुत्ते बनकर रह गए "न घर के रहे न घाट के"
राजेश शर्मा
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से तौबा करते हुए बुझी भाजपा की ज्योति जला दी,राजनीतिक गलियारों मे जान फूंक दी। कमलनाथ सरकार के स्थिर और अस्थिर रहने के सवाल कईयों को रोजगार दिए हुए हैं।
ज्ञान प्राप्त करना हो तो चिंता करना जरुरी है। चिंतन या तो पहाड़ पर होता है या छोटी सी कुटिया में। सिंधिया पहाड़ पर चिंतन कर रहे हैं और उनके अनुयायी कुटिया मे। दोनों के चिंतन मे भारी अंतर है। पहाड़ वाले पहाड़ी का रास्ता खोज रहे हैं और कुटिया वाले गुफा का।
वैसे राजनीति मे तरबतर लोगों की एकमात्र चिंता "सत्ता" रहती है। कोई नहीं जानता आप क्या चिंतन कर रहे हैं लेकिन "साहित्य" जानता है कि फिलहाल आप किस दशा मे हैं और किस दिशा को भुगत रहे हैं।
सिंधिया ऐसे गए जैसे घर का कोई वरिष्ठ, अब बच्चे क्या करें---अनाथ हो गए। उनके साथ या फिर??
लाभ जोंक को सीने से लगाए रखने,खून पिलाकर मीठा-मीठा मजा लेने मे नहीं, जोंक को निकालकर फेंकने मे होगा।
सिंधिया के अनुयायी सांप-सिड़ी के इस खेल मे वहीं पहुंच गए जहां से उन्होंने राजनीति की शुरुआत की थी। मप्र के ग्रामीण क्षेत्रों से उभरते कांग्रेस नेता अनाथ हो गए। यदि वह भाजपा मे जाते हैं तो कोई पूछ-परख नहीं। इधर कांग्रेस मे "आका" नहीं रहा।
सत्ता बदले या न बदले लेकिन सिंधिया (महाराज साहब) के अनुयायी "सिंधिया चालिसा" पढ़ने वाले इस समय मुसीबत मे हैं। फिलहाल पोजिशन यह है कि कहावतानुसार धोबी के कुत्ते बनकर रह गए "न घर के रहे न घाट के"


Post A Comment: