कब तक क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति... की आकांक्षा में.... राष्ट्र हित की बलि चढ़ती रहेगी..।

शैलेश तिवारी 

एक चरवाहा बालक... अपनी बाल मंडली के साथ... राजा प्रजा का खेल खेलते हुए... न्याय और नीति की बात करता है...। वहाँ से गुजर रहे एक ब्राह्मण आचार्य.. उसके खेल से प्रभावित होते हैं...। संभावना का जन्म होता है... सपने को साकार करते वह आचार्य... चरवाहे बालक को शास्त्र और शस्त्र.. की शिक्षा देकर.. भारत को एक सूत्र में बांध कर.. उस को सम्राट बना देते हैं....। भेद भी समाप्त कर देते हैं.... अगड़े पिछड़े का... निर्माण होता है.... अखंड भारत वर्ष का...। यह कहानी आपने भी सुनी है... और देख भी रहे होंगे.. बात है चाणक्य की... नीति और अर्थशास्त्र के जनक की....। 
अस्तो मा सद्ग़मय.... तमसो मा ज्योतिर्गमय.. सदमार्ग पर ले जाने.... अंधकार से प्रकाश की ओर.... ले जाने की प्रार्थना के साथ... प्रसारण शुरू होता है... चाणक्य सीरियल का..। बीच में शांति पाठ के सस्वर मंत्रों का... सुस्पष्ट उच्चारण... वातावरण में एक शांति का उद्घोष भी कर देता है। 
दूरदर्शन पर इन दिनों.... 1991 में प्रसारित हुए.... चाणक्य धारावाहिक का पुनः प्रसारण किया जा रहा है...। चिकित्सा से जुड़े.. डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने इसका निर्माण... लंबे शोध के बाद किया....। स्वयं ही चाणक्य का किरदार भी निभाया...। प्रसारण का आरंभ होता है... और दर्शक आँखों के रास्ते.... उस युग में पहुँच जाता है...जिस युग की घटनाएं फिल्माई गई हैं....ऐसा इस वजह से होता है कि.... जो सेट बनाए गए.. जो संवाद लिखे गए... जो पार्श्व संगीत दिया गया.... पात्रों ने जो अभिनय किया... सब कुछ इतना जीवंत है.. कि उस युग का तो कतई नहीं लगता... जिस युग में हम जी रहे हैं..। 
लॉक डाउन के दौरान... इसका भरपूर मजा लेने का न्यौता भी सरकार के निर्णय ने दिया है...। आधुनिक इतिहास के मध्य काल की व्यवस्थाएँ.... राजनीति... देश की स्थिति... शिक्षा व्यवस्था... आमोद प्रमोद के साधन.. वेश भूषा... जीवन शैली... आदि आदि क्या नहीं दर्शाता है.... ये धारावाहिक..। 
जनपदों.... गण राज्यों.... साम्राज्यो... में बंटे.. खंड खंड भारत..... की  वर्तमान अखंड भारत वर्ष की कल्पना का श्रेय भी... इसी काल को जाता है...। ... " प्रलय और निर्माण.. दोनों शिक्षक की गोद में खेलते हैं...। "  इस संवाद से शिक्षक की महत्ता... को राष्ट्र के लिए कितना महत्वपूर्ण घोषित किया गया..। ये वाक्य आज भी विचार किये जाने का आव्हान कर रहा है..। जब हमारी व्यवस्था... शिक्षकों से शिक्षा के अलावा.... सारे कार्य मुस्तैदी से करवाने पर आमदा है...। परिणाम... आप, हम, सरकार... किसी से छिपा नही है..। आज सरकारी विद्यालय.. छात्रों के लिए... दोपहर का भोजन... मिलने वाले... ढावे भर बनकर रह गए हैं...। निजी सेक्टर की शिक्षा... नौकर का निर्माण कर रही है... अच्छे नागरिक का नहीं...। नतीजा... उच्च शिक्षा प्राप्त प्रतिभा... भारत की नही रह जाती... विदेशो की हो जाती है...। यही राष्ट्रीयता का अभाव कहा जा सकता है...। 
तक्षशिला के गुरुकुल में... दीक्षांत समारोह में.... ताजा स्नातक हुए विष्णु गुप्त को.. दंड नीति और अर्थ शास्त्र का आचार्य नियुक्त कर दिया जाता है...। वही आचार्य चाणक्य हैं.. जो अपने स्नातको को संबोधित करते हैं तब कहते हैं... "आज यहाँ से कोई... मागध, कुरु, पाँचाल, केकये, मालव आदि प्रस्थान नहीं करेगा...। वह केवल भारतीय होगा.... और कुछ नहीं..। यह अपने जनपद में पहुंचकर.. न केवल याद रखना है... वरन स्वयम् को भारतीय मानकर ही कार्य करना है.. न कि छोटी सी जनपद का नागरिक समझकर...। " 
आचार्य चणक के पुत्र विष्णु गुप्त.. ( चाणक्य) ने जो बात ढाई हजार साल पहले अपने शिष्यों से कही.... वही बात आज भी समय की मांग है...। गौर करें तो... हम अभी भी क्षेत्रवाद... भाषावाद.... जातिवाद... वर्णवाद...संप्रदायवाद... और तो और... अब नए विभाजन कारी... राजनीति दलवाद... ने भी गहरे तक अपनी जड़ें जमा ली हैं...। भारतीय को देखने के लिए भारत माता की आँखें आज भी तरसती ही होंगी...। 
तक्षशिला के कुमार की... अलेक्जेंडर से संधि... वहाँ के गुरुकुल के कुलपति का........ " उतिष्ठ विष्णु गुप्त.... माँ भारती तुम्हें पुकार रही है...। " ये कहना... सच में रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। माँ भारती तो आज भी हम सबको पुकार रही है....। भारतीय बनने की गुहार लगा रही है...। कब तक क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति... की आकांक्षा में.... राष्ट्र हित की बलि चढ़ती रहेगी..।
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