लेखिका

मैं शराब लिखूं, तुम अर्थव्यवस्था समझना 


मैं शराब लिखूं तुम अर्थव्यवस्था समझना,
मुझे मयखाने की परवाह नहीं, 
तुम तो देश की व्यवस्था समझना,

हां माना की मधुशाला ज़रा बदनाम हैं,
एक वक्त की रोटी नहीं पर , दो वक्त का जाम हैं,

घंटों तक लोग कतार में रह सकते हैं,
शराब के लिए तो कई जिन्दगी तबाह कर सकते हैं,

रोजमर्रा की मेहनत को किनारा किया जा रहा है,
बेचकर शराब मयखाने में अब कोरोना को हराया जा रहा है,

मौत का खौफ कहां है इनको?
वह तो शराब पीकर मस्त है,
यमराज से कहो ज़रा ठहरने को,
अभी तो वह मयखाने में व्यस्त हैं,

एक बोतल शराब के लिए, 
कतारों में ज़िन्दगी लेकर वह खड़ा हैं,
अरे!!
मौत तो वहम मात्र हैं,
आज तो नशा जिंदगी से बड़ा है।


          --मनीषा सिंह     सिलीगुड़ी, रानीडंगा (पश्चिम बंगाल)

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 परिचय

लेखिका मनीषा सिंह जी सिलीगुड़ी के रानीडंगा (पश्चिम बंगाल) से हैं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी मनीषा जी कविता लिखने के साथ-साथ संगीत से भी जुड़ी हैं। एनएसएस के माध्यम से समाजसेवा मे भी अमूल्य योगदान देती रहती हैं। आप जिला स्तर पर कई काव्यमंचों  को सुशोभित कर चुकी हैं। साथ ही विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों मे आपकी कविताओं का प्रकाशन अक्सर होता रहता है। साहित्य और संगीत से जुड़ी इस प्रतिभा का एमपी मीडिया पाइंट पर स्वागत है।
संपादक
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