तुगलकी फरमान.. असमंजस  का बढ़ता अंधेरा... 

राजेश शर्मा 


"कोरोना" का कहर बढ़ता जा रहा है। आंकड़े लगातार अकड़ बता रहे और जनमानस के हौसले पिचकते जा रहे हैं। राजा भी प्रजा को दिलासा देने लाइव आते हैं। कुछ घोषणाओं का पुलिंदा साथ लाते हैं उसे खोलकर वापस चले जाते हैं। हर जिम्मेदार यही कहता है कि यह संकट का समय है हमे  कोरोना से लड़ना है और उसे हराना है... हराने के पेतरे मे बस इतना कि घर रहिए_हाथ धोते रहिए_सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कीजिये_घर से बाहर निकलें तो मूंह पर मास्क बांधकर....

कहावत है कि "मरता क्या नहीं करता" लोग वही कर रहे हैं जिससे प्राण बच सकें। 135 करोड़ की आबादी वाला देश भारत सिर्फ़ अमेरिका आदि देशों से तुलना कर फिलहाल अपना तना हुआ सीना विश्व को बता रहा है लेकिन हालात बेकाबू होने मे वक्त नहीं लगेगा।
जब आप यह मान ही चुके हैं कि लाकडाउन ही फिलहाल कोरोना के संक्रमण का उपचार है तो फिर उसे अधबीच मे तरह-तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश क्यों किया जा रहा है। क्या आपको कोरोना से किसी बढ़े नुकसान का इंतज़ार है। 

यह कैसा मजाक है कि शराब की दुकानें खोलने का निर्णय लिया जाता है__भीड़ उमड़ती है तो लाठियां भांजना पड़ता है और फिर दुकानें सील कर दी जाती हैं। किसी प्रांत मे दुकानें खुलती हैं तो किसी प्रदेश मे बंद के आदेश जारी कर दिए जाते है।

एक ऐसे दुश्मन से जिसकी शक्ल ही नहीं देखी, उससे निपटने तीन जोन बनाने की सलाह देने वाला आखिर है कौन ? छूट देना मंहगा सौदा साबित हो सकता है__यह छूट अब तक की सबसे भारी साबित हो सकती है। पलक झपकते ही ग्रीन जोन ओरेंज मे और ओरेंज जोन रेड जोन मे तब्दील हो सकता है। तब बेकाबू हुए हालातों से निपटने के लिए क्या सरकार के पास पुख्ता इंतजाम हैं ?
गनीमत है कि कोरोना का कहर देश के गांवों मे नहीं बरप रहा वरना लेने के देने पड़ जाते। देश की 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पसीने-पसीने है तो कोरोना के कहर को कैसे झेल पाएगी। वहां के हालातों को काबू पाने मे सरकारें खुद कोरोनाग्रस्त हो जाएगी।__कहने का मतलब यह कि जो रक्षित-सुरक्षित क्षेत्र हैं उन्हें छूट देकर वर्तमान हालातों मे जोखिम क्यों उठाया जा रहा है ? माना जा सकता है  दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल सही कह रहे हैं कि कोरोना के साथ जीना सीखना होगा__यही बात विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बोल रहा है। लेकिन बात यह है कि फिलहाल जिंदा रहेंगे तभी तो कोरोना के साथ जीएंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष दूत डॉ.डेविड नैबोरो ने कहा, 'यहां कुछ वायरस हैं जिनकी कोई वैक्सीन नहीं है। हम यह नहीं मान कर चल सकते कि वैक्सीन आ जाएगी और अगर यह आती है भी है, तो क्या सभी तरह की सुरक्षा और क्षमता के मानकों पर खरा उतरती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक "सबसे बुरी स्थिति यह हो सकती है कि कभी कोई वैक्सीन ही न हो।" एक तरफ लोगों की उम्मीदें बढ़ रही हैं और फिर खत्म हो रही हैं, क्योंकि आखिरी मुश्किलों से पहले ही कई प्रयास असफल होते दिख रहे हैं। ध्यान रहे, पिछले चार दशकों से अब एचआईवी से 3.2 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन दुनिया उसका वैक्सीन नहीं ढूंढ पाई है। डेंगू तो हर साल चार लाख लोगों को प्रभावित करता है, लेकिन अभी तक डेंगू की सफल वैक्सीन नहीं मिल पायी है। तो ऐसे मे फिलहाल कोरोना को खुद अपनी मौत मरने दिया जाए और किसी भी क्षेत्र मे कोई छूट नहीं दी जाए। हर जोन को रेड ही माना जाए तभी हालात बिगड़ने से बच सकते हैं।

कभी-कभी ठहर जाना भी चलने से बढ़ा होता है__आज का ठहराव कल के चलने का शुभ संकेत दे रहा है और  उतावलापन जिंदगी के रुकने का__एतरेय ब्राह्मण का सुभाषित ध्यान रखें-

कलि: शयनो भवति, संजिहानस्तु द्वापर:।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति,कृतं संपद्धते चरण।।
चरैवेति। चरैवेति ।।

अर्थात जो सो रहा है वह कलि है, निद्रा से उठ बैठने वाला द्वापर है, उठकर खड़ा हो जाने वाला त्रेता है और जो चल पड़ा वह कृतयुग है इसीलिए चलते रहो, चलते रहो।
दूसरे शब्दों मे__चलना ही जिंदगी है...आज रुकना होगा क्योंकि हमे कल चलना है। हम कृतयुग के इंतज़ार मे आज घरों के अंदर बैठे हैं मगर हमे सरकार असमय ही घर से निकलने का फरमान जारी कर रही है जो उचित नहीं कहा जा सकता। कोई अंदर, कोई बाहर है। तुग़लकी फरमानो ने देश-प्रदेशों को असमंजस के अंधकार मे ला खड़ा किया है।
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