शैलेश तिवारी
आर्थिक मंदी का असर है या हमारे कुप्रबंधन का.... कि सियाचिन में सैनिक कष्ट में हैं और हम मेरे- तेरे के बांटने वाले जुमलों में व्यस्त हैं।उन्हें जितना डर दुश्मन की बंदूक से निकली गोली का नहीं होता, उससे ज्यादा डर उन बर्फ़ीली हवाओं का होता है जो बदन को सीधे वेध जाती हैं। प्रकृति से तालमेल बैठाने के लिए जरूरी चीजो के लिए हमारे सियाचिन में तैनात जवान तरस रहे हैं। हमेशा चुनावी मोड पर रहने वाली सरकार खुद की पीठ ठोकने में इतनी व्यस्त है कि उस को जवान की आह सुनाई नहीं दे रही। अपनी कामयाबी में इतनी मस्त भी है कि आर्थिक मंदी की आहट से उसके कानों में जूं नहीं रेंगती और न ही आँखों से वो सी ए जी की रिपोर्ट दिखाई देती है, जो चीख चीख कर सियाचिन के सैनिकों का दर्द बयाँ कर रही है। रिपोर्ट का हर शब्द उनकी परेशानी की व्यथा कह रहा है लेकिन सरकार उन शब्दों से आँखें फेर कर अपनी ही कारगुजारियों में मस्त है।
जी हाँ, हम चर्चा कर रहे हैं जंगली गुलाब की घाटी कहे जाने वाले सियाचिन दर्रे की और वहाँ तैनात सैनिकों की। दुनियाँ के सबसे ऊँचे रणक्षेत्र की सीमाओं की चौकसी करने वाले हमारे जवानों को इंद्रा कोल नामक चौकी तक पहुंचने के लिए 20 से 22 दिनों की पैदल यात्रा एक दूसरे की कमर में रस्सी बांध कर करना होती है। स्नो बूट पहन कर चलने से कभी कभी कोई सैनिक बर्फ में फिसल जाए तो कमर में बंधी रस्सी ही उसको बचाती है। माइनस 50 डिग्री तक के तापमान का सामना करने के कपड़ों की कई तहों के ऊपर स्नो कोट पहना जाता है। बिना पशु पक्षी और अन्य जीवन के बिना जिस टेंट में समय गुजारा जाता है, उसे गर्म बनाये रखने के बुखारी नाम की सिगड़ी ही काम आती है। काली अंधियारी रात के बाद जब कभी सूर्य निकलता है तब बर्फ से उसकी किरणें टकरा कर आँखों को चकाचौन्ध करती है तब उनकी आँखों को स्नो ग्लास के चश्में जवानों की आँखों को सुरक्षित रखते हैं। अगर ये स्नो ग्लास आँखों पर न हो तो व्यक्ति की आँखों की पुतलियाँ या रेटिना काम करना बंद कर देता है। सीधे शब्दों में जवान अंधा हो जाएगा। हरी सब्जियां या ताजा भोजन सियाचिन में सपना है। 13 अप्रेल 1984 को भारतीय सेना ने अपनी चौकियाँ ऑपरेशन मेघदूत के तहत सियाचिन में तब स्थापित की थी जब पाकिस्तान ने इस भारतीय क्षेत्र में पर्वतारोहियों के जरिये अपनी घुसपैठ यहाँ की और इसको अपने नक्शे में शामिल कर लेने की नापाक कोशिश की थी। इस एरिया की लगभग डेढ़ सौ चौकियों पर दस बटालियन तैनात की जाती हैं। किसी भी सैनिक को यहाँ तीन महीने से ज्यादा रखा नहीं जाता है। इसके बाद भी वापसी पर अधिकांश जवान प्रकृतिदत्त बिमारियाँ लेकर लौटते हैं।
यह सब जिक्र केवल इसलिए किया जा रहा है कि यहाँ तैनात भारतीय फौज के जोश के दम पर ही हम शुकुन की नींद ले पाते हैं। लेकिन आज इन्हीं जवानों के पास मौसम से लड़ने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है। स्नो कोट, स्नो बूट, स्नो ग्लास आदि अन्य जरूरी सामान के बिना कितने सैनिक परिवार अपने सैनिक सदस्यों को खो देंगे। इसका खुलासा अभी बजट सत्र के दौरान सी ए जी की रिपोर्ट के माध्यम से हुआ है। हमारी व्यवस्था का काला चेहरा ये भी है कि सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं हुई है तो विपक्ष ने भी पूरी धीरता और गंभीरता से इस मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकृषित करने की पुरजोर कोशिश नहीं की है। जिस दर्रे से पाक के साथ चीन पर भी नजर रखी जाती है वहाँ के जवानों पर गर्व तो करते हैं लेकिन जरूरते पूरी करने में क्या हमारी सरकार के खजाने खाली हैं? सुनो सरकार..... जवानों की पुकार....।


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