भगवान आए..... दबे पाँव... 

सीहोर, एमपी मीडिया पॉइंट 

छः दशक की लंबी अवधि... गुजर चुकी है...  जबसे भगवान का आना.... धूमधाम से हुआ करता रहा...। वक्त का मिजाज बदला... तो भगवान ने भी अपना अंदाज... बदल लिया..। गाजे बाजे के साथ.... आने वाले भगवान इस साल... दबे पाँव आए... अपने भक्तों की खातिर... और अपने दर्शन से कर दिया कृतार्थ... उन्हीं भक्तों को... जो पलक पाँवड़े बिछाये.... कर रहे थे इंतजार...। 
आषाढ शुक्ल पक्ष द्वितीया.... वह तिथि है.. जो उड़ीसा की जगन्नाथ पुरी में.... दुनिया भर के भक्तों को अपनी तरफ खींचती है....। जिन जगन्नाथ का भात.... पाने के लिए जगत... हाथ पसारता है... वही भगवान जगन्नाथ इस दिन.... अपने दाऊ बलराम भगवान..... और बहन सुभद्रा के साथ..... रथ में सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं...। जगदीश पुरी की इस रथ यात्रा का आकर्षण.... केवल वहीं तक सीमित नहीं रह पाया....। रथ यात्रा का यह आयोजन.... भारत भूमि के नगरों से होते हुए.... छोटे छोटे कस्बों तक में अपनी पैठ बना चुका है...। अनेक स्थानों पर भगवान की रथ यात्रा का आयोजन... पुरी की रथ यात्रा की तर्ज पर किया जाने लगा.....। 
कभी नवाबी.... और कभी अंग्रेजी हुकूमत... की प्रत्यक्षदर्शी रही... सिद्धपुर की धरा भी कैसे अछूती रह पाती.....।  आज़ाद भारत की... लोकतांत्रिक सरकार के दौर में..... काशी से विद्या अध्ययन कर लौटे.... होल्कर स्टेट इंदौर के राजवैद्य पंडित चिरंजीवीलाल जी आचार्य..... ने सीहोर में भी रथयात्रा निकाले जाने की योजना बनाई.... अलग अलग हिस्सों ने बंटे नगर में.... सांस्कृतिक एकरूपता लाने के उद्देश्य से... बनाया गया यह विचार.... जगदीश मंदिर की संचालन समिति के समक्ष रखा..... तब तक सुदूर रेल्वे स्टेशन के पास गल्ला मंडी.... स्थित लंगड़े बाबा के मंदिर... के तत्कालीन महंत जी की सहमति ले ली गई.....। 
ये बात है..... 1961 की.... जब जगदीश मंदिर.... का न केवल भव्य निर्माण हो चुका था.... वरन वहाँ ठाकुर जी... प्रतिष्ठित भी हो गए ....। उसी साल से बैलगाड़ी में... बने रथ में भगवान के तीनों विग्रह... विराजित हो... संपूर्ण सीहोर का भ्रमण करते हुए.... मंडी के लंगड़े बाबा के मंदिर में आकर...रात्रि विश्राम करते..... तृतीया को उनकी वापसी होती... उस समय भंडारे का आयोजन भी किया जाता....। इस मौके पर...नगर और आसपास के साधु संतों का जमावड़ा भी होता रहा है....। हरि की कृपा...और संतों का संग.... इस यात्रा का अनूठा संगम है....। कालांतर में भगवान की यह दिव्य रथ यात्रा... भव्यता को प्राप्त करती गई....। बैंड बाजों के साथ.... आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की भजन मंडलियाँ भी..... यात्रा की शोभा बनती गई...। नर नारी की विशाल संख्या... गाती बजाती यात्रा में शामिल होने लगी..... तो जगह जगह पर... श्रद्धालुओं द्वारा रथ में विराजित भगवान की पूजा भी.... महत्व पाती गई...। और साठ सालों से यह क्रम न केवल अनवरत चला आता रहा... बल्कि शहर की जीवंत परंपराओं... में से एक का उदाहरण भी बन गया...। सांस्कृतिक एकता की मिसाल बने इस आयोजन पर.. वैश्विक महामारी का साया... इस साल मंडराया...। लेकिन यात्रा से जुड़े पक्षों ने इसकी भव्यता को न्यून कर... दिव्यता को बरकरार रखा...। आज मंगलवार को... भगवान सुसज्जित रथ में विराजित होकर.... भ्रमण करते हुए... वर्कशॉप रोड स्थित लंगड़े बाबा के सार्वजनिक राम मंदिर... पूरी सादगी के साथ गरिमामय तरीके से पधारे...। रात्रि विश्राम के बाद... बुधवार को भगवान की विदा होगी....।
Share To:

Post A Comment: