मेरी खामोशियाँ 

वक्त ऐसा भी आएगा, मेरी उम्र की तकाज़ मे ।
मेरे साथ झुर्रियां आ जाएगी. मेरे ही अल्फाज़ मे ।।

ये बड़ा ही अच्छा हुआ है, मेरी जिंदगी के मुकाम मे ।
सारे जज्बातों को उतार दिया है, मैंने अपनी ही किताब मे ।

खत्म जब भी होगी, मेरी जिंदगी ऐ -सफर ।
साथ ही रूक जाएगी मेरी तराशी हुई कलम ।

किसी ने पढ कर छोड भी दिया तन्हा, किसी कोने के दराज मे 
चलो अच्छा हुआ, दीमक ने चखा तो सही मेरी ही याद मे।।

जब मेरी रूखसती के वक्त मेरे अल्फाज़ बिखरते जाएगे ।
नींद मे रहूंगी, पर शीशा चटखते जाऐगें ।।

अक्स रहेगी, मेरी किताब पर 
वो तो तन्हा ही रह जाएगें ।

सोचती हूँ मै इन पन्नो मे अपनी हकीकत को उतार दूं ।
मै शकुन को लिखूं, गमों को छुपा दूं । 

चाहती नही मै अपने बोझ से 
किसी के कंधो को झुका दूं ।
मेरी अच्छाई को दबा दूं, मेरी खामियों को बता दूं ।।

     तबस्सुम परवीन, अम्बिकापुर ( सरगुजा ) छत्तीसगढ़।

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परिचय

तबस्सुम परवीन, अंबिकापुर (सरगुजा) छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। आप एक गृहणी हैं और साहित्य की सेवा आप इबादत की तरह करती हैं। हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में सृजन करती हैं। साहित्य की कई विधाओं में आपकी लेखनी चलती है। आप आशु कवि की तरह भी तात्कालिक रचना तैयार कर लेती हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
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