मेरी खामोशियाँ
वक्त ऐसा भी आएगा, मेरी उम्र की तकाज़ मे ।मेरे साथ झुर्रियां आ जाएगी. मेरे ही अल्फाज़ मे ।।
ये बड़ा ही अच्छा हुआ है, मेरी जिंदगी के मुकाम मे ।
सारे जज्बातों को उतार दिया है, मैंने अपनी ही किताब मे ।
खत्म जब भी होगी, मेरी जिंदगी ऐ -सफर ।
साथ ही रूक जाएगी मेरी तराशी हुई कलम ।
किसी ने पढ कर छोड भी दिया तन्हा, किसी कोने के दराज मे
चलो अच्छा हुआ, दीमक ने चखा तो सही मेरी ही याद मे।।
जब मेरी रूखसती के वक्त मेरे अल्फाज़ बिखरते जाएगे ।
नींद मे रहूंगी, पर शीशा चटखते जाऐगें ।।
अक्स रहेगी, मेरी किताब पर
वो तो तन्हा ही रह जाएगें ।
सोचती हूँ मै इन पन्नो मे अपनी हकीकत को उतार दूं ।
मै शकुन को लिखूं, गमों को छुपा दूं ।
चाहती नही मै अपने बोझ से
किसी के कंधो को झुका दूं ।
मेरी अच्छाई को दबा दूं, मेरी खामियों को बता दूं ।।


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