लेखक
हैं चारों और वीरानियाँ
खामोशियाँ, तन्हाईयाँ,
परेशानियाँ, रुसवाईयाँ
सब ओर ग़ुबार है ।
*****
आ अब लौट चलें..............
चीत्कार, हाहाकार मचा
मृत्यु का है तांडव यहां,
है आदमी के भेष में
भेड़िये हजार हैं !
*****
आ अब लौट चलें..............
खून से सनी यहां
इंसानियत की ढाल है,
नफ़रतों के ज़हर से
भरी आंधियाँ बयार है !
*****
आ अब लौट चलें.........
ज़मीर मिट चला यहाँ
क़ायनात शर्मसार है,
घोर अंधकार में
गुमनामियाँ सवार हैं !
*****
आ अब लौट चलें............
कस्तियां रही डूब यहाँ
लहरों में उभार है,
डूबता वही यहाँ पे
गुमां का जिसमें ख़ुमार है !
*****
आ अब लौट चलें.............
मुफ़लिसी के दौर में
मजबूरियाँ बेशुमार है,
नजर जहां भी पड़े
अंगार ही अंगार है !
*****
आ अब लौट चलें.............
मंज़र ये कैसा यहाँ
फिक्र में जहान है,
ना सरहदें महफ़ूज यहां
सब दिलों में ख़ार हैं!
*****
आ अब लौट चलें...........
स्वार्थ की बेड़ियों से बंधे
सब गुमनामियों की कैद में,
सब्र है किसे यहाँ
ये तंग सोच से बीमार हैं !
*****
आ अब लौट चलें............
विश्वास के पनपते बूटों पे
दगाबाज़ इल्लियाँ सवार हैं,
कब तलक जलेगा "दीप" यू
यहां दामन दाग़दार हैं .....!!
*****
आ अब लौट चलें................
-------
आ अब लौट चलें...........
हैं चारों और वीरानियाँ
खामोशियाँ, तन्हाईयाँ,
परेशानियाँ, रुसवाईयाँ
सब ओर ग़ुबार है ।
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आ अब लौट चलें..............
चीत्कार, हाहाकार मचा
मृत्यु का है तांडव यहां,
है आदमी के भेष में
भेड़िये हजार हैं !
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आ अब लौट चलें..............
खून से सनी यहां
इंसानियत की ढाल है,
नफ़रतों के ज़हर से
भरी आंधियाँ बयार है !
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आ अब लौट चलें.........
ज़मीर मिट चला यहाँ
क़ायनात शर्मसार है,
घोर अंधकार में
गुमनामियाँ सवार हैं !
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आ अब लौट चलें............
कस्तियां रही डूब यहाँ
लहरों में उभार है,
डूबता वही यहाँ पे
गुमां का जिसमें ख़ुमार है !
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आ अब लौट चलें.............
मुफ़लिसी के दौर में
मजबूरियाँ बेशुमार है,
नजर जहां भी पड़े
अंगार ही अंगार है !
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आ अब लौट चलें.............
मंज़र ये कैसा यहाँ
फिक्र में जहान है,
ना सरहदें महफ़ूज यहां
सब दिलों में ख़ार हैं!
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आ अब लौट चलें...........
स्वार्थ की बेड़ियों से बंधे
सब गुमनामियों की कैद में,
सब्र है किसे यहाँ
ये तंग सोच से बीमार हैं !
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आ अब लौट चलें............
विश्वास के पनपते बूटों पे
दगाबाज़ इल्लियाँ सवार हैं,
कब तलक जलेगा "दीप" यू
यहां दामन दाग़दार हैं .....!!
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आ अब लौट चलें................
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