सीमा पर तैनात जवान
खेतों में बेहाल किसान
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केदारनाथ शब्द मसीहा
ये आदर्श वाक्य दिया था देश के महान प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने । और न सिर्फ सेना के साथ झण्डा लेकर चले थे बल्कि देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए हर जगह अन्न उगाने की मुहिम शुरू की थी । सप्ताह में एक दिन का उपवास भी शुरू किया था मगर दुश्मन के आगे देश की अस्मिता को नीलाम नहीं होने दिया था। संसाधन छोटे थे मगर जज्बा बड़ा था।
लंबाई कम थी मगर गहराई बहुत ज्यादा थी । भले ही नदी से मगरमच्छ नहीं पकड़ा था मगर पढ़ने के लिए नन्हें ने नदी पार की थी ।
आज सीमा पर जवान है और देश में किसान घर में रहकर भी बेदम है। फसल बोनी है । बारिश आ गई है । अब इंतज़ामों की भी पोल खुल रही है । किसान भले ही देश का पेट भरता हो मगर उसकी फसल का दाम आज भी उसे पूरा नहीं मिलता ।
अखबारों में किसानों की आत्महत्या की खबरें आम हैं । अब शायद हम पर इन खबरों का कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता । हर साल ही तो बारह से पंद्रह हजार किसान मर जाते हैं । जो लोग खेती छोड़ रहे हैं सो अलग । आज खेती मुनाफे का धंधा नहीं रहा । वजह क्या है ?
पहली वजह है कि सरकार किसान की फसल के भाव तय करती है और वह भी अपने हिसाब से । किसान के सिर पर ही महंगाई नियंत्रण का ठीकरा फूटता है । जबकि न दवाओं के दाम पर सरकारी नियंत्रण है और न ही बीज और खाद पर । किसान की लागत हर साल बढ़ जाती है और सरकारी समर्थन मूल्य न बढ्ने से वह धीरे-धीरे कर के हलाल होता है । लेकिन यह हत्या नहीं होती ...किसान कोई पत्थर तो नहीं होता ? उसके भी सपने होते हैं ....उसकी भी जिम्मेदारियाँ होती हैं । उसे भी अपने बच्चों को पढ़ाना होता है , घर चलाना होता है और शादियाँ भी करनी होती हैं ।
किसानों की समस्याओं को उठाने वाले नेता अब कम बचे हैं । गन्ना बोते हैं , काटकर मिल में भेजते हैं और महीनों अपने ही सामान के दाम के लिए तड़पते हैं । सरकारों ने कई जगह गुड़ बनाना बंद किया हुआ है । तो किसान कुछ नकद कमा भी नहीं सकता । गन्ना मिलों वाले भी मनचाहा व्यवहार करते हैं क्योंकि ज़्यादातर मिल मालिकों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। कोरोना काल में किसान हर तरफ से परेशान हैं, पांच माह पहले थोक में 100 रुपए प्रतिकिलो बिकने वाला प्याज 2 रुपए से 6 रुपए प्रतिकिलो तक बिक रहा है। लोगों ने टमाटर को खेतों में फेंक दिया । पाम ऑयल के दाम 20 प्रतिशत बढ़े हैं मगर तिलहन का बाजार भाव नर्म है ।
मोल्याखेड़ी के किसान जगदीश पाटीदार ने 10 बीघा में जमीन में प्याज लगाया था, लागत आई 2 लाख पहले तो ओले से फसल खराब हुई जो बची उसमें लॉकडाउन में कीमतें लॉक हो गईं। हमारा प्याज 2 रु किलो बिक रहा है, बीज महंगा मिलता है, सब महंगा हो गया है। सोचा था इस बार अच्छे पैसे मिल जाएंगे लेकिन लागत 8 रु किलो होती है 2 रु में क्या करेंगे। रोडमल मेघवाल छोटे किसान है, 2 बीघा में प्याज की उपज तो अच्छी आई है मगर भाव महज 2 रुपये किलो तक ही मिल पा रहा है, 6 सदस्यों का परिवार, कर्ज और बच्चों की पढ़ाई जैसी जिम्मेदारियों के चलते इन दिनों परेशान हैं क्योंकि खर्चा भी नहीं निकल पा रहा है।
प्याज का गणित कुछ ऐसा है, एक बीघा में प्याज रोपने, रोपाई, खाद, डीएपी, कीटनाशक, मजदूरी, मंडी, हम्माली सब जोड़ लें तो लगभग 51,000 का खर्चा आता है। एक बीघे में लगभग 150 कट्टे प्याज उपजता है अगर क़ीमत 5 रु. प्रति किलो भी जोड़ें तो उसे एक बीघे में लगभग 45,000 मिलते हैं, यानी 6000 का सीधा नुकसान। किसान चाहते हैं सरकार समर्थन मूल्य पर प्याज खरीदे, सरकार से गुजारिश करते हैं 8-10 रु समर्थन मूल्य पर खरीदे ताकी घर परिवार चल सके । हमारे 5 व्यक्ति का परिवार है बच्चों की फीस नहीं भर पा रहे हैं। सरकार फिलहाल सपने दिखा रही है, वहीं विपक्ष ताने मार रहा है । कृषि मंत्री ने कहा पीयूष गोयल से बात की है, निर्यातकों से वीडियो कांफ्रेंसिंग से बात कर रहे हैं, हर जिले का सर्वे करा रहे हैं कि कितना प्याज कहां हुआ, मिर्ची कहां हुई, टमाटर कहां हुई। सरकार का दावा है कि बिचौलिये खत्म कर सीधे किसानों से 4-25 रु. किलो मिलेगा।
पाँच -सात साल पीछे जाना होगा । जब ये घोषणा हुई थी कि किसानों की आय दोगुनी होगी । बहुत सारे गोदाम बनाए जाएँगे ताकि किसानों की फसल का संरक्षण हो सके । क्या कोई योजना जमीन पर उतरी ? किसान अभी भी बेहाल है।
अब डीजल के दाम पेट्रोल को पछाड़कर देश के इतिहास में पहलीबार आगे निकल गए हैं । अब किराया भाड़ा भी बढ़ेगा और महंगाई भी । लेकिन न कोई चूड़ी वाली नजर आ रही है और न ही कोई विपक्षी इस मुद्दे पर बोल रहा है । चीन...चीन और चीन ने सारे मुद्दों को ढँक लिया है । इस देश का चूतियम सल्फेट मीडिया भी सत्ता के पैर पखार रहा है ताकि विज्ञापन की खुराक मिलती रहे । देश इवेंट मैनेजमेंट नहीं होता है। इस बात को जितना जल्दी समझ लिया जाय अच्छा है। किसान की आत्महत्या का भले ही कोई भी कारण हो लेकिन रस्सी सत्ता की उदासी ही होती है।
मैं महसूस करता हूँ कि देश की जनता गरीब है और इसे किसी ग्रह ने नहीं बल्कि सत्ता ने गरीब बनाया हुआ है जिसमें किसाना भी शामिल हैं । क्या कारण है कि ऑनलाइन सामान बेचने वाली कंपनियाँ एक सेव चालीस रुपये का बेचती है मगर किसान से बीस या तीस रुपये किलो भी उधार में खरीदा जाता है । केला पंद्रह रुपये का एक मिलता है मगर किसान से किस भाव खरीदा जाता है ? यही हाल आलू, टमाटर, लहसुन का भी है । मगर आज किसान की कौन सोच रहा है ?
ये तेल किसान का तेल निकाल रहा है । टेकल किसान के गले का फंडा है मगर सरकार का ध्यान सिर्फ सीमा पर है । जवान के साथ किसान की मौत पर भी ध्यान देना जरूरी है मगर मीडिया के लिए किसान सनसनी नहीं है ।
खेतों में बेहाल किसान
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केदारनाथ शब्द मसीहा
ये आदर्श वाक्य दिया था देश के महान प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने । और न सिर्फ सेना के साथ झण्डा लेकर चले थे बल्कि देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए हर जगह अन्न उगाने की मुहिम शुरू की थी । सप्ताह में एक दिन का उपवास भी शुरू किया था मगर दुश्मन के आगे देश की अस्मिता को नीलाम नहीं होने दिया था। संसाधन छोटे थे मगर जज्बा बड़ा था।
लंबाई कम थी मगर गहराई बहुत ज्यादा थी । भले ही नदी से मगरमच्छ नहीं पकड़ा था मगर पढ़ने के लिए नन्हें ने नदी पार की थी ।
आज सीमा पर जवान है और देश में किसान घर में रहकर भी बेदम है। फसल बोनी है । बारिश आ गई है । अब इंतज़ामों की भी पोल खुल रही है । किसान भले ही देश का पेट भरता हो मगर उसकी फसल का दाम आज भी उसे पूरा नहीं मिलता ।
अखबारों में किसानों की आत्महत्या की खबरें आम हैं । अब शायद हम पर इन खबरों का कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता । हर साल ही तो बारह से पंद्रह हजार किसान मर जाते हैं । जो लोग खेती छोड़ रहे हैं सो अलग । आज खेती मुनाफे का धंधा नहीं रहा । वजह क्या है ?
पहली वजह है कि सरकार किसान की फसल के भाव तय करती है और वह भी अपने हिसाब से । किसान के सिर पर ही महंगाई नियंत्रण का ठीकरा फूटता है । जबकि न दवाओं के दाम पर सरकारी नियंत्रण है और न ही बीज और खाद पर । किसान की लागत हर साल बढ़ जाती है और सरकारी समर्थन मूल्य न बढ्ने से वह धीरे-धीरे कर के हलाल होता है । लेकिन यह हत्या नहीं होती ...किसान कोई पत्थर तो नहीं होता ? उसके भी सपने होते हैं ....उसकी भी जिम्मेदारियाँ होती हैं । उसे भी अपने बच्चों को पढ़ाना होता है , घर चलाना होता है और शादियाँ भी करनी होती हैं ।
किसानों की समस्याओं को उठाने वाले नेता अब कम बचे हैं । गन्ना बोते हैं , काटकर मिल में भेजते हैं और महीनों अपने ही सामान के दाम के लिए तड़पते हैं । सरकारों ने कई जगह गुड़ बनाना बंद किया हुआ है । तो किसान कुछ नकद कमा भी नहीं सकता । गन्ना मिलों वाले भी मनचाहा व्यवहार करते हैं क्योंकि ज़्यादातर मिल मालिकों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। कोरोना काल में किसान हर तरफ से परेशान हैं, पांच माह पहले थोक में 100 रुपए प्रतिकिलो बिकने वाला प्याज 2 रुपए से 6 रुपए प्रतिकिलो तक बिक रहा है। लोगों ने टमाटर को खेतों में फेंक दिया । पाम ऑयल के दाम 20 प्रतिशत बढ़े हैं मगर तिलहन का बाजार भाव नर्म है ।
मोल्याखेड़ी के किसान जगदीश पाटीदार ने 10 बीघा में जमीन में प्याज लगाया था, लागत आई 2 लाख पहले तो ओले से फसल खराब हुई जो बची उसमें लॉकडाउन में कीमतें लॉक हो गईं। हमारा प्याज 2 रु किलो बिक रहा है, बीज महंगा मिलता है, सब महंगा हो गया है। सोचा था इस बार अच्छे पैसे मिल जाएंगे लेकिन लागत 8 रु किलो होती है 2 रु में क्या करेंगे। रोडमल मेघवाल छोटे किसान है, 2 बीघा में प्याज की उपज तो अच्छी आई है मगर भाव महज 2 रुपये किलो तक ही मिल पा रहा है, 6 सदस्यों का परिवार, कर्ज और बच्चों की पढ़ाई जैसी जिम्मेदारियों के चलते इन दिनों परेशान हैं क्योंकि खर्चा भी नहीं निकल पा रहा है।
प्याज का गणित कुछ ऐसा है, एक बीघा में प्याज रोपने, रोपाई, खाद, डीएपी, कीटनाशक, मजदूरी, मंडी, हम्माली सब जोड़ लें तो लगभग 51,000 का खर्चा आता है। एक बीघे में लगभग 150 कट्टे प्याज उपजता है अगर क़ीमत 5 रु. प्रति किलो भी जोड़ें तो उसे एक बीघे में लगभग 45,000 मिलते हैं, यानी 6000 का सीधा नुकसान। किसान चाहते हैं सरकार समर्थन मूल्य पर प्याज खरीदे, सरकार से गुजारिश करते हैं 8-10 रु समर्थन मूल्य पर खरीदे ताकी घर परिवार चल सके । हमारे 5 व्यक्ति का परिवार है बच्चों की फीस नहीं भर पा रहे हैं। सरकार फिलहाल सपने दिखा रही है, वहीं विपक्ष ताने मार रहा है । कृषि मंत्री ने कहा पीयूष गोयल से बात की है, निर्यातकों से वीडियो कांफ्रेंसिंग से बात कर रहे हैं, हर जिले का सर्वे करा रहे हैं कि कितना प्याज कहां हुआ, मिर्ची कहां हुई, टमाटर कहां हुई। सरकार का दावा है कि बिचौलिये खत्म कर सीधे किसानों से 4-25 रु. किलो मिलेगा।
पाँच -सात साल पीछे जाना होगा । जब ये घोषणा हुई थी कि किसानों की आय दोगुनी होगी । बहुत सारे गोदाम बनाए जाएँगे ताकि किसानों की फसल का संरक्षण हो सके । क्या कोई योजना जमीन पर उतरी ? किसान अभी भी बेहाल है।
अब डीजल के दाम पेट्रोल को पछाड़कर देश के इतिहास में पहलीबार आगे निकल गए हैं । अब किराया भाड़ा भी बढ़ेगा और महंगाई भी । लेकिन न कोई चूड़ी वाली नजर आ रही है और न ही कोई विपक्षी इस मुद्दे पर बोल रहा है । चीन...चीन और चीन ने सारे मुद्दों को ढँक लिया है । इस देश का चूतियम सल्फेट मीडिया भी सत्ता के पैर पखार रहा है ताकि विज्ञापन की खुराक मिलती रहे । देश इवेंट मैनेजमेंट नहीं होता है। इस बात को जितना जल्दी समझ लिया जाय अच्छा है। किसान की आत्महत्या का भले ही कोई भी कारण हो लेकिन रस्सी सत्ता की उदासी ही होती है।
मैं महसूस करता हूँ कि देश की जनता गरीब है और इसे किसी ग्रह ने नहीं बल्कि सत्ता ने गरीब बनाया हुआ है जिसमें किसाना भी शामिल हैं । क्या कारण है कि ऑनलाइन सामान बेचने वाली कंपनियाँ एक सेव चालीस रुपये का बेचती है मगर किसान से बीस या तीस रुपये किलो भी उधार में खरीदा जाता है । केला पंद्रह रुपये का एक मिलता है मगर किसान से किस भाव खरीदा जाता है ? यही हाल आलू, टमाटर, लहसुन का भी है । मगर आज किसान की कौन सोच रहा है ?
ये तेल किसान का तेल निकाल रहा है । टेकल किसान के गले का फंडा है मगर सरकार का ध्यान सिर्फ सीमा पर है । जवान के साथ किसान की मौत पर भी ध्यान देना जरूरी है मगर मीडिया के लिए किसान सनसनी नहीं है ।

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