सरस्वती नदी भारत की तीसरी पवित्र नदी मानी जाती है, जिसका वर्णन 'ऋग्वेद' से लेकर 'महाभारत' तक में है । प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है पर वहां सरस्वती अदृश्य ही रहती है। बद्रीनाथ के रास्ते में सरस्वती नदी के अस्तित्व को माना जाता है और दर्शन भी किए जा सकते हैं,पर यह नदी कुछ ही दूर जाने के बाद विलुप्त हो जाती है। यह सोचकर मेरे मन में जो भाव जगे, उसे कविता रूप में मैं प्रस्तुत कर रही हूं:
------सरस्वती
********सागर में ऐसा क्या है आकर्षण
कि सारी नदियां करती हैं प्रेम वर्षण!
खुद को सागर में कर देती हैं लीन
नहीं रखती अपनी कोई चिह्न ।
सागर कब किसी एक का हो कर रहा है
कब वह नदी की तरह बहा है?
अनेकों से मिला है कइयों में रमा है
गरजा है अपने ही घमंड में झुमा है ।
पर सरस्वती वैसी नदी नहीं
उसे एक निर्मल अंतर चाहिए
एक अदद समंदर चाहिए ।
नदी सागर की ओर उमड़ी प्रेम की तलाश में
बंधना चाहती थी प्रिय के प्रेम पाश में।
पर देखा
यहां तो सागर सब के लिए बाहें फैलाए बैठा है
सर्वोच्चता के गुमान में ऐंठा है।
नदी को सब कुछ व्यर्थ लगा
अब तक का बहना निरर्थक लगा ।
प्रेम में बहके कदम थम गए
उसके मासूम सपने सहम गए ।
उसकी उफान ठिठक गई
प्रिय मिलन की चाह झटक गई।
एक अदद सागर की तलाश में
नदी ने अपना अस्तित्व
खो दिया ।
सागर के सपने से मुँह मोड़ लिया ।
संजू वर्मा,जमशेदपुर
--------------------------परिचय
लेखिका- संजू वर्माशिक्षा- स्नातकोत्तर(हिंदी)व्यवसाय-गुलमोहर हाई स्कूल में हिंदी शिक्षिका, हिंदी विभागाध्यक्षाशहर- जमशेदपुर, टाटानगर,झारखंड


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