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भय बिनु होई न प्रीत...रामचरित मानस के इस एक सूत्र वाक्य का भी भूमि पूजन में समावेश था। राम मंदिर निर्माण का स्थूल निर्माण लोग देख रहे हैं और लार्सन एंड टुबरो उसे मूर्त रूप देने में लगी है। मानवीय संचेतना को श्री राम मंदिर का स्थूल निर्माण आवश्यक आधुनिक गति नहीं देगा बल्कि एक आधार देगा। एक ऐसा आधार जो राम की मर्यादा के अनुरूप होगी। इस मर्यादा को भी अधिकांश कथा वाचक जन समुदाय में इस तरह प्रस्तुत करते रहे हैं कि जैसे राजपाठ छोड़कर श्री राम वनवास के दौरान बहुत कष्ट में रहे। यदि श्री राम में कष्ट सहने की क्षमता होती तो रामायण में युद्ध का इतना प्रसंग ही नहीं होता। श्री राम में असाधारण धैर्य शक्ति थी। श्री राम " भय बिनु होई न प्रीत" सिद्धांत पर चलनेवाले थे पर उनका भय मन या मस्तिष्क को ही प्रभावित नहीं करता था बल्कि नसों और हड्डियों में भी भय का कंपन लाता था। प्रधानमंत्री मोदी ने भय बिनु होई न प्रीत कहकर भूमि पूजन के एक महत्वपूर्ण पक्ष को रखा और आधुनिक हिंदुत्व की ओर संकेत किया। अयोध्या का राम मंदिर अपनी तेजस्विता के संग अपनी वर्चस्वता को भी बनाए रखेगा यह भूमि पूजन के अवसर पर स्पष्ट किया गया।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंचालक डॉ भागवत ने देशवासियों के मन में अयोध्या निर्माण की बात की। पुरानी अयोध्या से लेकर आधुनिक अयोध्या के घटनाक्रम में एक लंबा संघर्ष और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता ही प्रमुख थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष, प्राणों की आहुति तथा कभी शांत न होनेवाली ऊर्जा का सम्मिश्रण अनवरत रहा। डॉ भागवत ने इसी प्रकार की अयोध्या को देशवासियों के मन में जिलाए रखने का आग्रह किया। सबको साथ लेकर चलने का लक्ष्य भी एक प्रमुख मुद्दा था।
सबका साथ यह किसी राजनैतिक नेता द्वारा कहा गया वाक्य नहीं है बल्कि आरएसएस के प्रमुख का विचार है। निःसंदेह यह एक व्यापक अर्थ को समेटे है।
3. भूमि पूजन में मंत्रों का उपयोग हुआ, आचार्य द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की गई, देश के प्रतिष्ठित साधु-संत थे, आचार्य ने पूजा के क्रम में यहां तक का दिया कि यह अवसर उनके कई जन्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है। देश के प्रधानमंत्री और आरएसएस के सरसंघचालक दोनों अति महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं और भूमि पूजन के दौरान उनके प्रमुख संदेश एक आधुनिक राम मंदिर के निर्माण के बारे में था जो स्वप्न भी देखेगा और उसे यथार्थ रूप में परिणित भी कर लेगा। राम मंदिर के द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक आदि चेतना को सरणीबद्ध कर सम्पूर्ण विश्व में प्रवाहित करने का असाधारण और अकल्पनीय संकल्प भूमि पूजन की आत्मा स्वरूप थी। दोनों वक्ताओं ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता से श्री राम मंदिर के माध्यम से परिवर्तन और परिवर्धन की बात की उससे यह प्रतीत हो रहा है कि भविष्य की योजनाएं निर्धारित की जा चुकी हैं और क्रमशः उनसे हमारा परिचय होगा। लगभग तीन दिन तक अयोध्या में राम नाम की अनुगूंज केवल एक आध्यात्मिक पल्लवन नहीं बल्कि कल्पवृक्ष की तरह श्री राम मंदिर का निरूपण का द्योतक है। मंदिर के रूप में एक ऐसा कल्पवृक्ष जिसकी शाखाएं भौगोलिक, सांस्कृतिक आदि दूरियों को आच्छादित करते प्रसारित होती रहेंगी। पांच अगस्त दो हजार बीस भारत देश की न भुलाए जानेवाली तिथि बन चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब जय श्री राम अभिवादन का लोकप्रिय उच्चारण बन जाएगा। जय सियाराम।
धीरेन्द्र सिंह, नवी मुंबई
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भूमि पूजन - आधुनिक हिंदुत्व का पूजन
भय बिनु होई न प्रीत...रामचरित मानस के इस एक सूत्र वाक्य का भी भूमि पूजन में समावेश था। राम मंदिर निर्माण का स्थूल निर्माण लोग देख रहे हैं और लार्सन एंड टुबरो उसे मूर्त रूप देने में लगी है। मानवीय संचेतना को श्री राम मंदिर का स्थूल निर्माण आवश्यक आधुनिक गति नहीं देगा बल्कि एक आधार देगा। एक ऐसा आधार जो राम की मर्यादा के अनुरूप होगी। इस मर्यादा को भी अधिकांश कथा वाचक जन समुदाय में इस तरह प्रस्तुत करते रहे हैं कि जैसे राजपाठ छोड़कर श्री राम वनवास के दौरान बहुत कष्ट में रहे। यदि श्री राम में कष्ट सहने की क्षमता होती तो रामायण में युद्ध का इतना प्रसंग ही नहीं होता। श्री राम में असाधारण धैर्य शक्ति थी। श्री राम " भय बिनु होई न प्रीत" सिद्धांत पर चलनेवाले थे पर उनका भय मन या मस्तिष्क को ही प्रभावित नहीं करता था बल्कि नसों और हड्डियों में भी भय का कंपन लाता था। प्रधानमंत्री मोदी ने भय बिनु होई न प्रीत कहकर भूमि पूजन के एक महत्वपूर्ण पक्ष को रखा और आधुनिक हिंदुत्व की ओर संकेत किया। अयोध्या का राम मंदिर अपनी तेजस्विता के संग अपनी वर्चस्वता को भी बनाए रखेगा यह भूमि पूजन के अवसर पर स्पष्ट किया गया।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंचालक डॉ भागवत ने देशवासियों के मन में अयोध्या निर्माण की बात की। पुरानी अयोध्या से लेकर आधुनिक अयोध्या के घटनाक्रम में एक लंबा संघर्ष और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता ही प्रमुख थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष, प्राणों की आहुति तथा कभी शांत न होनेवाली ऊर्जा का सम्मिश्रण अनवरत रहा। डॉ भागवत ने इसी प्रकार की अयोध्या को देशवासियों के मन में जिलाए रखने का आग्रह किया। सबको साथ लेकर चलने का लक्ष्य भी एक प्रमुख मुद्दा था।
सबका साथ यह किसी राजनैतिक नेता द्वारा कहा गया वाक्य नहीं है बल्कि आरएसएस के प्रमुख का विचार है। निःसंदेह यह एक व्यापक अर्थ को समेटे है।
3. भूमि पूजन में मंत्रों का उपयोग हुआ, आचार्य द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की गई, देश के प्रतिष्ठित साधु-संत थे, आचार्य ने पूजा के क्रम में यहां तक का दिया कि यह अवसर उनके कई जन्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है। देश के प्रधानमंत्री और आरएसएस के सरसंघचालक दोनों अति महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं और भूमि पूजन के दौरान उनके प्रमुख संदेश एक आधुनिक राम मंदिर के निर्माण के बारे में था जो स्वप्न भी देखेगा और उसे यथार्थ रूप में परिणित भी कर लेगा। राम मंदिर के द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक आदि चेतना को सरणीबद्ध कर सम्पूर्ण विश्व में प्रवाहित करने का असाधारण और अकल्पनीय संकल्प भूमि पूजन की आत्मा स्वरूप थी। दोनों वक्ताओं ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता से श्री राम मंदिर के माध्यम से परिवर्तन और परिवर्धन की बात की उससे यह प्रतीत हो रहा है कि भविष्य की योजनाएं निर्धारित की जा चुकी हैं और क्रमशः उनसे हमारा परिचय होगा। लगभग तीन दिन तक अयोध्या में राम नाम की अनुगूंज केवल एक आध्यात्मिक पल्लवन नहीं बल्कि कल्पवृक्ष की तरह श्री राम मंदिर का निरूपण का द्योतक है। मंदिर के रूप में एक ऐसा कल्पवृक्ष जिसकी शाखाएं भौगोलिक, सांस्कृतिक आदि दूरियों को आच्छादित करते प्रसारित होती रहेंगी। पांच अगस्त दो हजार बीस भारत देश की न भुलाए जानेवाली तिथि बन चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब जय श्री राम अभिवादन का लोकप्रिय उच्चारण बन जाएगा। जय सियाराम।
धीरेन्द्र सिंह, नवी मुंबई
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