लेखिका
अब की बार राखी पर,,
**********************बहन गर है रूठी तो जाकर मना लो तुम
गर है भाई रूठा तो बहना बुला दो तुम
बहुत हुआ अब तो सब एक होना चाहिए
रक्षा बंधन पर ये गिले शिकवे हटा लो तुम
बिना परिवार के तो त्यौहार भी अधूरा है
तरक्की मिलेगी पर व्यापार ही अधूरा है
कुछ भी करो मग़र रिश्तों को बचा लो तुम
जो साथ न बहनभाई आधार ही अधूरा है
मुस्कुरा कर ऊँची इन दीवारों को गिरा दो
नफ़रत की सारी इन मीनारों को हटा दो
कहो बहन सजा थाली भाई तेरा आया है
बचपन की पुरानी सब तस्वीरों को सजा दो
बहनों को भाईयों की जायदाद नहीं चाहिए
उन्हें पैसे की भी कोई इम्दाद नहीं चाहिए
वो तो चाहे बहुत सी खुशियां लाना घर में
उन्हें तुमसे कोई भी ख़िताब नहीं चाहिए
उधड़े रिश्तों को तुरपाई कर सी आओ तुम
ज़िंदगी को कुछ मायना कभी तो दे आओ तुम
कुछ तुम बढ़ो थोड़े क़दम बहना भी बढ़ायेगी
ज़्यादा नहीं 'साया' दो घूँट चाय पी आओ तुम
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