लेखक 

छोटे मुँह बड़ी बात... 


दो तीन से नर्मदा तट से सटे उस छोटे से गाँव छीपानेर में वाहनों की गहमागहमी भरी आवक जावक ने रघु को हैरान कर रखा था। दूसरे के खेतों में काम कर अपनी जिंदगी की गाड़ी.. जैसे तैसे खींचने वाले रघु ने...अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी गुजर जाने पर भी इतनी आवाजाही अपने छोटे से गाँव में कभी नहीं देखी थी। हाँ भक्त गण धूनी वाले दादा जी की तपोस्थली पर आते जाते बने रहते हैं लेकिन वाहनों की ऐसी रेलम पेल फिर भी देखने में नहीं आई। कभी चुनावी माहौल में ही वाहनों की आवाजाही ज्यादा होती रही, लेकिन इतनी तादात में कभी नहीं....। ऐसी भीड़ भाड़ देख उसे कुंभ के मेले की याद आ गई। कम आबादी वाले गाँव में अचानक सरकारी और असरकारी लोगों के अपनी अपनी गाड़ी में सवार होकर गाँव आने जाने का राज उसकी समझ में तब आया जब प्रदेश के मुखिया जी के काफिले के साथ आने की भनक लगी। तभी समझ में आया इतनी सारी पुलिस क्यों लगी है गाँव में....। जहाँ देखो वहाँ खाकी वर्दीधारी नजर आ रहे थे। गाँव तो गाँव, वहाँ से एकाध किलोमीटर दूर तक चहल पहल बनी हुई थी। 
 आखिर वो दिन आ ही गया जिस दिन उड़न खटोले से प्रदेश के मुखिया जी को आना था।उनकी पार्टी के झंडे बैनर से पूरा गाँव पट गया था। छुटभैये नेता भी पार्टी का गमछा गले में डाले इधर से उधर घूम रहे थे। हेलिपेड से लेकर कार्यक्रम स्थल तक जगह जगह मंच लगे थे सीएम साहब की अगवानी के लिए। जो अगवानी के लिए कम और सीएम की नज़रों में आने के लिए... फोटो वाले बैनर से सजाए गए थे...। कुछ मुकद्दम टाइप नेता छुटभैयों को आवश्यक दिशा निर्देश देते हुए अपना रुतबा जता रहे थे। स्कूल के बच्चों से लेकर आसपास के गाँवों के कई सरकारी नुमाइन्दो की भारी भीड़ का इंतजाम किया गया। जिनमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तक को बुलाया गया था महिलाओं की भीड़ के साथ। गाँव में प्रवेश करने से पहले वाहनों की भारी संख्या के लिए पार्किंग भी बनाई गई। जहाँ ट्राफिक पुलिस की सीटियां लगातार गूँज रही थी। दोपहरी की उमस भरी गर्मी और चिलचिलाती धूप से सभी के पसीने छूट रहे थे। सभी अपने अपने गड्डों के पास तैनात थे। जिनमे पौधे रोपे जाने थे। तय यह भी था कि किस गड्डे में कौन से नेताजी पौधा रोपेंगे, उनके नाम की तख्ती भी लगी थी। 
रघु झिझकते हुए गाँव के स्कूल के मास्साब के पास पहुंचा। उसने अपनी हिम्मत को बटोरते हुए मास्साब से सवाल कर ही लिया।
" मास्साब जे पौधे जो रोपे जा रए हैं। जे उछर पायें के नई? " 
मास्साब ने ट्रेनिंग पाए मार्केटिंग एक्जुक्युटिव की तरह चेहरे पर व्यवसायिक मुस्कान लाते हुए जवाब दिया, 
"रघु भैया! (जिसे वो आमतौर पर रग्घू ही कहते थे) हर पौधे की साज संवार की जिम्मेदारी बंटी है। अच्छी परवरिश यानी बेहतर देखभाल से हर पौधा पेड़ बनेगा ही।" 
 रघु की हिम्मत को दाद देना होगी। जिसने धीरे से मास्साब से यह कह ही दिया कि , 
" मास्साब जे मुखिया जी को जे तो बता दो के जो उछरे भये पेड़ भगवान किरपा से  जंगलन में खड़े हैं ....उनई को कटवो रुकवा दयें.... पेड़न को काटवे वारे...सोई उनई के साथ तो आ रये....। बताओ वे भी पेड़ लगावें...। अच्छो है, तनक पाप कट जैहैं...बिनन के। जिन्ने खूब कुल्हाड़ी चलवाई पेड़न पे...।


शैलेश तिवारी, सीहोर (मध्यप्रदेश)

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परिचय

लेखक- संपादक, एमपी मीडिया पाइंट से होकर कहानीकार,साहित्यकार,कुशल वक्ता के रुप मे पहचान रखते हैं। आध्यात्म और धार्मिक धाराओं मे हिलोरे लेते आपके शब्द किसी परिचय के मोहताज नहीं है। पत्रकारिता जगत मे आपकी लेखनी को कभी पानी की तरलता से तो कभी अग्नि की तेजता से आंका जाता है। विभिन्न विषयों पर आपकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शब्दों के जादूगर का आज "साहित्य के सोपान" फिर से स्वागत है।
राजेश शर्मा 
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समीक्षा

मानसूनी मौसम की गरज-चमक और कहीं झमाझम बरसती बरसात से चुटीले व्यंग्यों से सजी खूबसूरत रचना।
दुखियाओं के गाँव में मुखियाओं के आने का सजीव चित्रण फिर कैमरा संस्कृति का फोटो खेंच दिया।
वृक्षारोपण के नाम पर होने वाले तमाशे के गुब्बारे में कुछ गर्म हवा हर साल भरी जाती है ताकि यह ऊपर उठकर राजनैतिक धर्ममध्वजा को फहराये। बिना यह जाने कि अगले दिन उन पौधों का क्या हुआ।
यह भी ज्वलंत मुद्दा है कि लगाते तब जब जंगलों से पाले पोसे वृक्षों का विनाश रोकते।
इससे तो बेहतर है जब बारिश का मौसम आये कुछ बीज एकता, भाईचारे व सौहार्द के बिखेर दिये जायें ताकि सामाजिक संचेतना की पौध पनप सके। हरियाली का जिम्मा प्रकृति के पास ही रहने दिया जाये बिना उसकी कार्यप्रणाली में दखल दिये हुए।
वाह्ह्ह शैलेश भाई, समसामयिक सरोकार पर उम्दा कलम चलाई। बधाई स्वीकारें भाई।

मुकेश दुबे, वरिष्ठ साहित्यकार,
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