लेखिका 

उस शून्यता का कोई क्या करे
जो दिनभर उसकी कोमल भावनाओं को अपनी आगोश में लेकर
उससे ही दूर
पत्थरों से पटी वादियों और
बंजर वीराने में ले जाकर छोड़ आती है

और वो है कि 
सारे रसभीने संस्मरणों के
अवसान के बाद भी
मंत्रमुग्ध सी
उस शून्यता के साथ कदमताल 
करते हुए
उसी वीरान वादियों में
अपने सर्द बर्फीले अहसास के साथ
दिनभर बेमकसद भटकती रहती है

इस शून्यता के होने और रहने के
विस्फोटक धकापेल में
आज उसकी कितनी ही बेशकीमती स्मृतियां
मन के निभृत कोने में दुबकी
थरथरा रही है

शून्यता के इस उन्माद में
कोई प्यास नहीं
बस एक रहस्य है
जिससे सिर्फ वो परिचित है

आज एक बार फिर
 हृदय के हर तार को 
झंकृत करते शून्यता के 
इस आर्द्र आह्वाहन को
 गले लगा कर
मूक आलिंगन में कांपती 
वो और उसकी शून्यता
स्मृतियों के रेशमी पैराशूट को पहन कर
अतीत में स्वच्छंद विचरने लगती है

सुना था कभी कि
अतीत में लौटना हमेशा सुखद होता है ...शायद !!

2 . कास का जंगल
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जिंदगी के चढ़ते-उतरते ग्राफ में
 आड़ी तिरछी रेखाओं का 
अपने-आप खींच जाना
आकाश में बादल के छाते ही
हवा का पागल हो जाना
वर्षा की बाढ़ में
नदी का उतावलापन दिखाना
वसंत के आते ही
 घायल जर्जर चिड़ियाँ की
उड़ान की आखिरी कोशिस

चाही-अनचाही सारी खुशियों को
कलेजे से लगाकर उसके स्पंदन में 
विभोर हो जाना
पतले गुलाबी अधर-द्वय को कस कर भींच
अंतर्व्यथा की वाष्प को 
बरबस बंद करने का निरर्थक प्रयास करना
सब कुछ स्वाभाविक है

फिर क्यों
जो अप्राप्य है 
उसी के लिए स्वपनों के शून्याकाश में
बाहें फैल जाती है
तंद्रा तो तब टूटती है
जब शांत, निर्द्वंद अतीत राग कानों में
बज उठता है और सारी आकृतियां
कास के जंगल में खो जाती है.....!


नंदा पांडेय, रांची, झारखंड

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परिचय 

नंदा पाण्डेय, रांची, झारखण्ड की निवासी हैं। 
पढ़ना और लिखना की रुचि ने इन्हें साहित्य सेवक बना दिया। आपका एकल कविता संग्रह"बस कह देना कि आऊंगा" और
17 साझा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ नियमित प्रकाशित हो रहती हैं। आपकी कविताएँ कविता कोष पर भी पढ़ी जा सकती हैं। आपको विभिन्न साहित्यिक मंचों से सम्मानित और पुरस्कृत किया जा चुका है। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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