लेखिका
सारा घर पोटली बने हुए सामान से घिरा हुआ था। तभी राघव की आवाज़ आई, "जानवी ओ जानवी समेट लिया घर, बांध लिया सारा सामान तुमने?,"
जानवी सोचती रह गई, "समेट लिया घर" ये वाक्य उसके दिमाग को बार बार झिंझोडता रहा। अभी जैसे कल की ही बात हो, वह अपने पति और दो नन्हीं बच्चियों के साथ रहने आई थी इस घर में। बढ़ी बेटी कुल पांच वर्ष की थी, कुछ समझ में आता कुछ समझने की कोशिश में लगी रहती थी वो मासूम, और एक साल की नन्हीं जिसे इस घर की देहरी बहुत भा गयी थी। हमेशा वहीं बैठकर वो आने जाने वालों को देख खुश होती रहती थी। जानवी को भी तो बहुत पसंद आ गया था ये घर, हर तरफ़ रौनक ही रौनक, अब तक कितने मकान बदल डाले थे, जानवी और राघव ने। जब तक एक मकान को वो अपना घर बना पाती थी वो दोबारा मकान बन जाता था और जानवी फिर किसी दूसरे मकान को घर बनाने में जुट जाती थी।
यही तो होता है न किराए के घर में। पर क्या सच में उसमें रहने वालों के लिए किराए का मकान कभी घर नहीं होता क्यूं, क्यूंकि उसका हकदार कोई और होता है? जानवी ये सब अब सहन नहीं कर पा रही थी। उम्र, तजूर्बे और भावनाओं के मेल से सजे इस घर में उसने बीस साल बिताए थे। उसकी पांच साल की नासमझ जिया अब बढ़ी हो गयी थी सब समझती थी, जानवी को भी समझा देती थी। उसकी नासमझियां भी पल बढ़कर समझदार हो गयी थी अब तो।
एक साल की नन्हीं दीया का बचपन भी इस घर में कूदते फांदते कब बढ़ा हो गया पता ही नहीं चला। उसके टूटे फूटे शब्द आज भी दिवारों पर अंकित हैं, जो आज भी आभास कराते हैं बचपन की मीठी यादों का। एक दीवार पर मां की ऊंगली थामें "जिया" तो दूसरी पर पापा की गोद में "दीया" , बालसुलभ मन ने कितनी खूबसूरती से सजाई थीं ये दीवारें।
इन सबके साथ ही उसके और राघव के बीच स्नेह, झड़प और मनुहारों के कितने ही किस्से भी तो थे इस घर में। अपने जीवन का शुरूआती सफ़र आज रह रह कर याद आ रहा था उसे। कभी न भूलने वाली उसकी तीसरी संतान "मिष्ठी" की किलकारियाँ और उसके जाने का रूदन भी तो यहीं दफ्न है, वो असहनीय पीड़ा सांत्वना बन जाती है, जब जब उसकी यादें चलचित्र की तरह इस घर के चारों कोनों में चलती हैं। ऐसा महसूस होता है जैसे वो आसपास ही हो कहीं। पर अब सब छूट रहा था इस घर की तरह, खुशियों और मायूसियों की मिली जुली छाप भी तो इस घर की दिवारों पर है अब तक। कलेजे से खींचकर बाहर निकाल रहा हो जैसे कोई सबकुछ।
अपनी अल्हड़ता और परिपक्वता तक का सफ़र आज उसकी आंखों से अश्रु बन कर झलक रहा था। राघव की आवाज से वो जीवन के धरातल पर वापिस आ जाती है। राघव उत्साहित और प्रसन्न हैं क्योंकि उन्होंने अपनी अथक मेहनत और प्रयासों से जानवी को मकान से घर देने का वादा जो पूरा कर दिया था। राघव को चहकता देख वो एक बार फिर खुद को समझा लेती है कि अब जो वो घर बसाएगी उसे इस तरह बार बार पोटलियों में नहीं समेटना पड़ेगा। इस घर की यादें तो उसके मन में कैद हैं हमेशा के लिए, जब जी चाहे उन्हें जी लेगी फिर से, मानों, आश्वस्त कर रही हो खुद को जानवी।
अपनी गीली डबडबाई आंखों को सबसे छुपाती हुई जानवी, आखिरी बार घर को निहारती है और सोचती है कि कहीं किसी दीवार पर यादों का कोई बिछौना टंगा हुआ तो नहीं छूट गया, दिल को सयंत करने की लाख कोशिश कर रही थी वो। ये कैसा मंज़र था विदाई का, कैसा मोह था ये?
संपादक
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ये लेखिका के कथानक... किराये के घर की... प्रकट कथा है.... अगर इसके भाव अर्थ को टटोलने की कोशिश करें तो.... अध्यात्म का पक्ष भी.... झाँकता है उस स्मृति के गवाक्ष से..... जो रह रह कर... मन को द्रवित करती है.... लेकिन हकीकत से रूबरू भी कराती है... वह हकीकत है... इस दुनिया रूपी मकान में हमारा आना.... लेकिन छोड़ कर जाने का डर अंतस को भयभीत करता है...। फिर भी छोड़ कर जाना तय... होता ही है....। इस फिलासफी को भी.... कथानक कह ही देता है... लेकिन दिल है कि मानता नहीं....। शब्दों की सरलता और ..... कथानक की तरलता दोनों का.... सामंजस्य कथानक का अप्रितम सौंदर्य है....। जो यकीन नही होने देता कि... यह लेखिका की कलम से निकली... पहली शब्द रचना है....। कथा सृजन के दौरान... यह लगता है कि.... कलम ने उस मोह के बंधन से खुद को... कस कर बांधे रखा है... तभी उसका शब्द चित्रण इतना... भाव पूर्ण हो पाया है.....। भावपूर्ण कथानक के लिए.... बधाई... तृप्ति शर्मा जी.....।
शैलेश तिवारी, संपादक
किराए का घर
************सारा घर पोटली बने हुए सामान से घिरा हुआ था। तभी राघव की आवाज़ आई, "जानवी ओ जानवी समेट लिया घर, बांध लिया सारा सामान तुमने?,"
जानवी सोचती रह गई, "समेट लिया घर" ये वाक्य उसके दिमाग को बार बार झिंझोडता रहा। अभी जैसे कल की ही बात हो, वह अपने पति और दो नन्हीं बच्चियों के साथ रहने आई थी इस घर में। बढ़ी बेटी कुल पांच वर्ष की थी, कुछ समझ में आता कुछ समझने की कोशिश में लगी रहती थी वो मासूम, और एक साल की नन्हीं जिसे इस घर की देहरी बहुत भा गयी थी। हमेशा वहीं बैठकर वो आने जाने वालों को देख खुश होती रहती थी। जानवी को भी तो बहुत पसंद आ गया था ये घर, हर तरफ़ रौनक ही रौनक, अब तक कितने मकान बदल डाले थे, जानवी और राघव ने। जब तक एक मकान को वो अपना घर बना पाती थी वो दोबारा मकान बन जाता था और जानवी फिर किसी दूसरे मकान को घर बनाने में जुट जाती थी।
यही तो होता है न किराए के घर में। पर क्या सच में उसमें रहने वालों के लिए किराए का मकान कभी घर नहीं होता क्यूं, क्यूंकि उसका हकदार कोई और होता है? जानवी ये सब अब सहन नहीं कर पा रही थी। उम्र, तजूर्बे और भावनाओं के मेल से सजे इस घर में उसने बीस साल बिताए थे। उसकी पांच साल की नासमझ जिया अब बढ़ी हो गयी थी सब समझती थी, जानवी को भी समझा देती थी। उसकी नासमझियां भी पल बढ़कर समझदार हो गयी थी अब तो।
एक साल की नन्हीं दीया का बचपन भी इस घर में कूदते फांदते कब बढ़ा हो गया पता ही नहीं चला। उसके टूटे फूटे शब्द आज भी दिवारों पर अंकित हैं, जो आज भी आभास कराते हैं बचपन की मीठी यादों का। एक दीवार पर मां की ऊंगली थामें "जिया" तो दूसरी पर पापा की गोद में "दीया" , बालसुलभ मन ने कितनी खूबसूरती से सजाई थीं ये दीवारें।
इन सबके साथ ही उसके और राघव के बीच स्नेह, झड़प और मनुहारों के कितने ही किस्से भी तो थे इस घर में। अपने जीवन का शुरूआती सफ़र आज रह रह कर याद आ रहा था उसे। कभी न भूलने वाली उसकी तीसरी संतान "मिष्ठी" की किलकारियाँ और उसके जाने का रूदन भी तो यहीं दफ्न है, वो असहनीय पीड़ा सांत्वना बन जाती है, जब जब उसकी यादें चलचित्र की तरह इस घर के चारों कोनों में चलती हैं। ऐसा महसूस होता है जैसे वो आसपास ही हो कहीं। पर अब सब छूट रहा था इस घर की तरह, खुशियों और मायूसियों की मिली जुली छाप भी तो इस घर की दिवारों पर है अब तक। कलेजे से खींचकर बाहर निकाल रहा हो जैसे कोई सबकुछ।
अपनी अल्हड़ता और परिपक्वता तक का सफ़र आज उसकी आंखों से अश्रु बन कर झलक रहा था। राघव की आवाज से वो जीवन के धरातल पर वापिस आ जाती है। राघव उत्साहित और प्रसन्न हैं क्योंकि उन्होंने अपनी अथक मेहनत और प्रयासों से जानवी को मकान से घर देने का वादा जो पूरा कर दिया था। राघव को चहकता देख वो एक बार फिर खुद को समझा लेती है कि अब जो वो घर बसाएगी उसे इस तरह बार बार पोटलियों में नहीं समेटना पड़ेगा। इस घर की यादें तो उसके मन में कैद हैं हमेशा के लिए, जब जी चाहे उन्हें जी लेगी फिर से, मानों, आश्वस्त कर रही हो खुद को जानवी।
अपनी गीली डबडबाई आंखों को सबसे छुपाती हुई जानवी, आखिरी बार घर को निहारती है और सोचती है कि कहीं किसी दीवार पर यादों का कोई बिछौना टंगा हुआ तो नहीं छूट गया, दिल को सयंत करने की लाख कोशिश कर रही थी वो। ये कैसा मंज़र था विदाई का, कैसा मोह था ये?
तृप्ति शर्मा, हर्ष विहार- दिल्ली
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तृप्ति शर्मा , हर्ष विहार , दिल्ली की निवासी हैं। वर्तमान में एक गृहिणी हैं, बीते कई साल वो अध्ययन के श्रेत्र में सक्रिय रही हैं। साहित्य के प्रेम ने उन्हें मन के उद्गार पन्नो पर उकेरने को प्रेरित किया। नवोदित कलम कार के रूप में उनकी पहली कहानी ने प्रमाणित कर दिया है कि उनकी कलम में जादू है। हम उम्मीद करते हैं कि उनकी कलम से अब अनवरत ऐसी हृदयस्पर्शी और शानदार कहानी पढ़ने को मिलेंगी। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।संपादक
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समीक्षा
मकान.... बनता है रेत, सीमेंट, सरिये और गिट्टी आदि के मेल से है..... लेकिन उसको घर बनाने के लिए.... आपसी प्रेम, सद्भाव, एक दूसरे के प्रति त्याग... की भावना लगती है....। इन सब के बावजूद.... जब सर छुपाने के लिए... मकान रूपी आशियाना... किराये पर लेकर.... उस को घर बनाया जाता है.... तब मालिकाना हक.... अपना नहीं होने के बाद भी.... उसको छोड़ने के समय जो... मोह मन में आता है.... वही इस कथा की सार वस्तु है....। यादों और स्मृतियों का... गुच्छ एक गुलदस्ता बनकर... जेहन में पैबस्त हो जाता है.... इतने गहरे से कि.... उसको छोड़ कर जाने की कल्पना से भी.... अंदर तक सिहरन पैदा हो जाए.....। ये प्यार है.... उस निर्जीव से... जो सजीव की तरह.... जिंदगी के सफर में.... हमसफर बन जाती हैं..... लेकिन या सफर के वो मुकाम ही क्या... जो लौट कर आ जाएं.... आती है केवल उनकी याद.. याद... और केवल याद.....।ये लेखिका के कथानक... किराये के घर की... प्रकट कथा है.... अगर इसके भाव अर्थ को टटोलने की कोशिश करें तो.... अध्यात्म का पक्ष भी.... झाँकता है उस स्मृति के गवाक्ष से..... जो रह रह कर... मन को द्रवित करती है.... लेकिन हकीकत से रूबरू भी कराती है... वह हकीकत है... इस दुनिया रूपी मकान में हमारा आना.... लेकिन छोड़ कर जाने का डर अंतस को भयभीत करता है...। फिर भी छोड़ कर जाना तय... होता ही है....। इस फिलासफी को भी.... कथानक कह ही देता है... लेकिन दिल है कि मानता नहीं....। शब्दों की सरलता और ..... कथानक की तरलता दोनों का.... सामंजस्य कथानक का अप्रितम सौंदर्य है....। जो यकीन नही होने देता कि... यह लेखिका की कलम से निकली... पहली शब्द रचना है....। कथा सृजन के दौरान... यह लगता है कि.... कलम ने उस मोह के बंधन से खुद को... कस कर बांधे रखा है... तभी उसका शब्द चित्रण इतना... भाव पूर्ण हो पाया है.....। भावपूर्ण कथानक के लिए.... बधाई... तृप्ति शर्मा जी.....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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