लेखिका
जाने क्यों ----
अब सपने नहीं आते , खयाल भी नहीं आते
विश्वास की धरती पे उपजा स्नेह
उस वक्त सूख जाता है जब
उमड़ते बादल को देख भी
जमी बंजर ही रहती है
सूख जाता है अंदर समेटा स्नेह
ओर
मन वितृष्णा से भर जाता है
ये सोच कर
वो रिक्त है भावनाओं से
स्नेह की बारिश में भीग कर भी
तब आत्म मंथन रोक देता है ओर
प्यार एक परिधि में सिमट गौण हो जाता है हमेशा के लिए !!
प्यार
नही अब में प्यार नही करतीजाने क्यों ----
अब सपने नहीं आते , खयाल भी नहीं आते
विश्वास की धरती पे उपजा स्नेह
उस वक्त सूख जाता है जब
उमड़ते बादल को देख भी
जमी बंजर ही रहती है
सूख जाता है अंदर समेटा स्नेह
ओर
मन वितृष्णा से भर जाता है
ये सोच कर
वो रिक्त है भावनाओं से
स्नेह की बारिश में भीग कर भी
तब आत्म मंथन रोक देता है ओर
प्यार एक परिधि में सिमट गौण हो जाता है हमेशा के लिए !!


Post A Comment: