लेखक-सनत जैन / ईएमएस
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी को ईश्वर ने एक अवसर दिया है। जो होता है, वह अच्छे के लिए होता है। 70 साल बाद कांग्रेश एक बार फिर आंदोलन के रूप में सारे देश की जनता के सामने हैं। पिछले 2 वर्षों में राहुल गांधी ने जिस आक्रमकता के साथ नरेंद्र मोदी और भाजपा का मुकाबला किया है। उससे ना केवल मतदाताओं वरन विपक्षी दलों के बीच में भी कांग्रेश को लेकर आशाएं बड़ी है। प्रियंका गांधी हाल ही में चुनाव मैदान में उतरी हैं। उन्हें भी जनता ने भरपूर प्यार दिया है। उनकी आक्रामकता को बड़ी आशा भरी निगाहों से देखा है। जिस तरह से लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जनता की लड़ाई लड़ी है उससे उनकी नई पहचान बनी है। एक बहुत बड़ा वर्ग उनकी तरफ बड़ी आशा भरी निगाहों से देख रहा है। उसके सामने लोकसभा चुनाव में हुई हार अप्रत्याशित है। कुरुक्षेत्र के मैदान में राहुल गांधी अभिमन्यु की भूमिका में थे। भाजपा का संगठित कैडर, प्रधानमंत्री मोदी का शक्तिशाली व्यक्तित्व और भाजपा की बड़ी सेना का मुकाबला कर पाना कांग्रेश और राहुल गांधी के लिए संभव नहीं था। इसके बाद भी राहुल गांधी ने भाजपा और मोदी की छवि का चक्रव्यूह भेदने का काम बड़े साहस के साथ किया जिसे सारे देश ने स्वीकार किया। उनकी लोकप्रियता इन्हीं 2 वर्षों में मोदी के मुकाबले बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। लोकसभा चुनाव के जो परिणाम आए हैं। 2014 की तुलना में कांग्रेस की सीटें बढ़ी हैं। कांग्रेस के वोट बढ़े हैं। इसके साथ ही जनमानस का विश्वास भी राहुल गांधी के प्रति बढ़ा है। यही उनकी इस चुनाव की सबसे बड़ी सफलता है।
लोकसभा 2019 का चुनाव सरकार के कामकाज पर नहीं लड़ा गया। मतदान के समय तक पूरा चुनाव राष्ट्रीयता के मुद्दे पर केंद्रित हो गया। पिछले 30 वर्षों में कांग्रेश का संगठन धीरे-धीरे समाप्त हो गया। इसके स्थान पर कांग्रेश के नेताओं और दलालों ने संगठन के पदों पर भी कब्जा कर, कांग्रेस को जनता से दूर कर दिया है। जिसके कारण 2019 के चुनाव में भाजपा का मुकाबला कर पाना संभव ही नहीं था। 1996 से 2004 तक का समय विपक्ष के रूप में काम करने का अवसर कांग्रेश को मिला था। किंतु कांग्रेश विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करने में पूरी तरह असफल साबित हुई। 1996 से 2004 का कार्यकाल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के शासनकाल का था। इन वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। दर्जनों राज्य सरकारें बैंकों से ओवरड्राफ्ट लेकर कर्मचारियों को वेतन का भुगतान कर पा रही थी। देश के अधिकांश राज्यों में विकास कार्य लगभग पूरी तरह ठप्प हो गए थे। अटल जी के राज में ही केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने 30 फ़ीसदी स्वीकृत पदों को समाप्त करने और दैनिक वेतन भोगियों को हटाने का निर्णय लिया था। सेवानिवृत्त कर्मचारियों के मुकाबले कई वर्षों तक सरकारी विभागों में भर्तियां नहीं हुई। भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व की केंद्र सरकार ने साजिश के तहत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार का बंटवारा करके तीन नए राज्य बनवा दिए। जबकि इसकी मांग कहीं से नहीं हो रही थी। राज्यों के विघटन से मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार आर्थिक दृष्टि से बदहाल हुए। जो नए राज्य बने, उन्हें भी केंद्र ने कोई सहायता नहीं दी। जिसके कारण आर्थिक स्थिति और खराब हुई। उसके बाद हुए चुनाव में भाजपा लगभग सभी राज्यों में काबिज हो गई। जिसे कांग्रेश आज तक नहीं समझ पाई। सही मायने में कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद विपक्ष की भूमिका में हमेशा नाकाम रही है।
2004 में केंद्र की सरकार मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी। 2004 से 2014 के बीच देश की आर्थिक दृष्टि कई गुना बेहतर हुई। केंद्र और राज्यों के पास बड़ी मात्रा में संसाधन और राजस्व एकत्रित हुआ। केंद्र सरकार ने इस दौरान लगभग 5 दर्जन योजनाएं शुरू करके, राज्यों को खरबों रुपए योजनाएं में राज्यों को आवंटित किए। इसका प्रचार प्रसार करने में मनमोहन सरकार और कांग्रेस पूरी तरह असफल साबित हुई। 10 वर्ष सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेश ने अपने संगठन को मजबूत करने का कोई प्रयास नहीं किया। उल्टे कांग्रेश के मंत्री और पदाधिकारी सत्ता के मद में मदमस्त होकर संगठन और आम जनता से दूर होते चले गए। गांधी परिवार की उस समय सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी, कि वह संगठन को मजबूत करने और केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को योजनाओं के माध्यम से जो आर्थिक सहायता दी जा रही थी। उसका प्रचार प्रसार वह जन जन तक करते। उन्होंने नहीं किया। इस मामले में कांग्रेश को प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के मुख्यमंत्रियों से सबक लेने की जरूरत है। 2004 से 2014 के बीच गैर कांग्रेसी सरकारों ने केंद्र से बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता लेकर उसका प्रचार-प्रसार अपने पक्ष में करके, केंद्र की मनमोहन सरकार को बदनाम करने के लिए किया। सही मायने में 2014 के बाद एनडीए गठबंधन की सरकार ने राज्यों को पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में कम धनराशि दी है। दर्जनों योजनाएं बंद हो गई हैं। बजट में जो राशि आवंटित की गई थी। वह भी रिलीज नहीं की गई। किंतु इन 5 वर्षो में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने में पूर्णता असफल साबित हुई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनके आक्रमक तेवरों का मुकाबला कोई नहीं कर पा रहा था। सभी विपक्षी दल आतंकित होकर शांत बैठे थे। उस समय राहुल गांधी ने आक्रामक रूप से उनका मुकाबला संसद और संसद के बाहर किया। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी एक नई भूमिका में आए। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के विधानसभा चुनाव में इसका लाभ भी मिला। केंद्र और राज्यों के चुनाव में मतदाताओं की सोच अलग अलग होती है। 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी था। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है, कि 2014 में राहुल गांधी की लोकप्रियता नरेंद्र मोदी के मुकाबले में लगभग लगभग शून्य पर थी। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी की लोकप्रियता 46 फ़ीसदी के मुकाबले राहुल गांधी की लोकप्रियता 34 फ़ीसदी पर पहुंच गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें भी 2014 के मुकाबले बढ़ी हैं। कांग्रेस का वोट बैंक भी लगभग 6 फ़ीसदी सारे देश में बढ़ गया है। यह उनकी सफलता का प्रमाण है। इसमें हतोत्साहित होने की कोई जरूरत नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पहली बार कांग्रेश इस तेवर में दिखी है, जो इस समय की मांग है।
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा ने जो वादे किए थे। वह पिछले 5 वर्षों में पूरे नहीं हुए। 2019 का लोकसभा चुनाव राष्ट्रीयता के मुद्दे पर लड़ा गया। कांग्रेस को देशद्रोही टुकड़े-टुकड़े वाली गैंग का समर्थक बताकर, राष्ट्रहित के लिए मोदी जरूरी हैं। मतदाताओं के बीच यह संदेश भेजकर ध्रुवीकरण कराने में भाजपा और नरेंद्र मोदी सफल रहे। इसमें सरकार के कामकाज को लेकर जनमानस के बीच में कांग्रेश अपनी बात नहीं रख पाई। यह कांग्रेस की असफलता है। कांग्रेस के पास ना तो संगठन था, और ना ही संसाधन। ऐसी स्थिति में नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और उनके नेटवर्क का मुकाबला करने की स्थिति भी नहीं थी। अंतोगत्वा परिणाम जो आने थे वह आ गए।
लोकसभा चुनाव की इस हार में राहुल गांधी और प्रियंका को एक नया अवसर मिला है। जो जीता वही सिकंदर, यहां तक तो ठीक है। किंतु जनता की अपनी समस्याएं हैं। देश में कई चुनौतियां हैं, जिसको लेकर सरकार नाकाम साबित हुई है। उसमें विपक्ष की भूमिका में राहुल, प्रियंका और कांग्रेश के नेताओं को सत्ता पक्ष को घेरने के सैकड़ों मौके हैं। विपक्ष की भूमिका में उन्हें अपनी छवि और अपनी कार्यप्रणाली से मतदाताओं को जोड़ने के लिए और जनता तक पहुंचने के लिए बहुत बड़ा अवसर मिला है। आक्रमक शैली से यदि वह मुकाबला करेंगे, तो आने वाला समय उनका बहुत बेहतर होगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भावात्मक रूप से मतदाताओं को प्रभावित किया गया है। जिसके कारण यह चुनाव परिणाम आए हैं। इससे भी कांग्रेस को सबक लेते हुए विपक्ष में रहकर अपने संगठन को मजबूत बनाने, जहां पर कांग्रेस की सरकारें हैं। उन्हें मजबूती से काम करने देने, से कांग्रेस भविष्य बेहतर कर सकती हैं। जिस तरह से राहुल गांधी का बयान सामने आया है, कि कमलनाथ, अशोक गहलोत और चिदंबरम अपने लड़कों को चुनाव जिताने में लगे रहे। जिसके कारण पार्टी की हार हुई। यदि यह सच है, तो अन्य राज्यों में क्या हुआ। चुनाव परिणाम विधानसभा चुनाव की तुलना में लोकसभा के चुनाव परिणाम बिल्कुल अलग हैं। राष्ट्रीयता के नाम पर मोदी ने जो भावात्मक रूप से मतदाताओं को जोड़ा था। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान उसका मुकाबला ही नहीं किया। जिसके कारण इस तरह के परिणाम देखने को मिले। राहुल गांधी ने जो बयान दिया है, उसके बाद निश्चित रूप से इन राज्यों में कांग्रेश के मुख्यमंत्रियों को अपनी ही पार्टी के नेताओं से चुनौतियां मिलेंगी, तथा वह कमजोर होंगे। राहुल के इस बयान से मुख्यमंत्री भी हतोत्साहित होते हैं, तो इससे कांग्रेस कमजोर होगी। राहुल गांधी को काफी गंभीरता से मंथन करना होगा।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी को ईश्वर ने एक अवसर दिया है। जो होता है, वह अच्छे के लिए होता है। 70 साल बाद कांग्रेश एक बार फिर आंदोलन के रूप में सारे देश की जनता के सामने हैं। पिछले 2 वर्षों में राहुल गांधी ने जिस आक्रमकता के साथ नरेंद्र मोदी और भाजपा का मुकाबला किया है। उससे ना केवल मतदाताओं वरन विपक्षी दलों के बीच में भी कांग्रेश को लेकर आशाएं बड़ी है। प्रियंका गांधी हाल ही में चुनाव मैदान में उतरी हैं। उन्हें भी जनता ने भरपूर प्यार दिया है। उनकी आक्रामकता को बड़ी आशा भरी निगाहों से देखा है। जिस तरह से लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जनता की लड़ाई लड़ी है उससे उनकी नई पहचान बनी है। एक बहुत बड़ा वर्ग उनकी तरफ बड़ी आशा भरी निगाहों से देख रहा है। उसके सामने लोकसभा चुनाव में हुई हार अप्रत्याशित है। कुरुक्षेत्र के मैदान में राहुल गांधी अभिमन्यु की भूमिका में थे। भाजपा का संगठित कैडर, प्रधानमंत्री मोदी का शक्तिशाली व्यक्तित्व और भाजपा की बड़ी सेना का मुकाबला कर पाना कांग्रेश और राहुल गांधी के लिए संभव नहीं था। इसके बाद भी राहुल गांधी ने भाजपा और मोदी की छवि का चक्रव्यूह भेदने का काम बड़े साहस के साथ किया जिसे सारे देश ने स्वीकार किया। उनकी लोकप्रियता इन्हीं 2 वर्षों में मोदी के मुकाबले बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। लोकसभा चुनाव के जो परिणाम आए हैं। 2014 की तुलना में कांग्रेस की सीटें बढ़ी हैं। कांग्रेस के वोट बढ़े हैं। इसके साथ ही जनमानस का विश्वास भी राहुल गांधी के प्रति बढ़ा है। यही उनकी इस चुनाव की सबसे बड़ी सफलता है।
लोकसभा 2019 का चुनाव सरकार के कामकाज पर नहीं लड़ा गया। मतदान के समय तक पूरा चुनाव राष्ट्रीयता के मुद्दे पर केंद्रित हो गया। पिछले 30 वर्षों में कांग्रेश का संगठन धीरे-धीरे समाप्त हो गया। इसके स्थान पर कांग्रेश के नेताओं और दलालों ने संगठन के पदों पर भी कब्जा कर, कांग्रेस को जनता से दूर कर दिया है। जिसके कारण 2019 के चुनाव में भाजपा का मुकाबला कर पाना संभव ही नहीं था। 1996 से 2004 तक का समय विपक्ष के रूप में काम करने का अवसर कांग्रेश को मिला था। किंतु कांग्रेश विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करने में पूरी तरह असफल साबित हुई। 1996 से 2004 का कार्यकाल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के शासनकाल का था। इन वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। दर्जनों राज्य सरकारें बैंकों से ओवरड्राफ्ट लेकर कर्मचारियों को वेतन का भुगतान कर पा रही थी। देश के अधिकांश राज्यों में विकास कार्य लगभग पूरी तरह ठप्प हो गए थे। अटल जी के राज में ही केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने 30 फ़ीसदी स्वीकृत पदों को समाप्त करने और दैनिक वेतन भोगियों को हटाने का निर्णय लिया था। सेवानिवृत्त कर्मचारियों के मुकाबले कई वर्षों तक सरकारी विभागों में भर्तियां नहीं हुई। भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व की केंद्र सरकार ने साजिश के तहत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार का बंटवारा करके तीन नए राज्य बनवा दिए। जबकि इसकी मांग कहीं से नहीं हो रही थी। राज्यों के विघटन से मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार आर्थिक दृष्टि से बदहाल हुए। जो नए राज्य बने, उन्हें भी केंद्र ने कोई सहायता नहीं दी। जिसके कारण आर्थिक स्थिति और खराब हुई। उसके बाद हुए चुनाव में भाजपा लगभग सभी राज्यों में काबिज हो गई। जिसे कांग्रेश आज तक नहीं समझ पाई। सही मायने में कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद विपक्ष की भूमिका में हमेशा नाकाम रही है।
2004 में केंद्र की सरकार मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी। 2004 से 2014 के बीच देश की आर्थिक दृष्टि कई गुना बेहतर हुई। केंद्र और राज्यों के पास बड़ी मात्रा में संसाधन और राजस्व एकत्रित हुआ। केंद्र सरकार ने इस दौरान लगभग 5 दर्जन योजनाएं शुरू करके, राज्यों को खरबों रुपए योजनाएं में राज्यों को आवंटित किए। इसका प्रचार प्रसार करने में मनमोहन सरकार और कांग्रेस पूरी तरह असफल साबित हुई। 10 वर्ष सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेश ने अपने संगठन को मजबूत करने का कोई प्रयास नहीं किया। उल्टे कांग्रेश के मंत्री और पदाधिकारी सत्ता के मद में मदमस्त होकर संगठन और आम जनता से दूर होते चले गए। गांधी परिवार की उस समय सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी, कि वह संगठन को मजबूत करने और केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को योजनाओं के माध्यम से जो आर्थिक सहायता दी जा रही थी। उसका प्रचार प्रसार वह जन जन तक करते। उन्होंने नहीं किया। इस मामले में कांग्रेश को प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के मुख्यमंत्रियों से सबक लेने की जरूरत है। 2004 से 2014 के बीच गैर कांग्रेसी सरकारों ने केंद्र से बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता लेकर उसका प्रचार-प्रसार अपने पक्ष में करके, केंद्र की मनमोहन सरकार को बदनाम करने के लिए किया। सही मायने में 2014 के बाद एनडीए गठबंधन की सरकार ने राज्यों को पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में कम धनराशि दी है। दर्जनों योजनाएं बंद हो गई हैं। बजट में जो राशि आवंटित की गई थी। वह भी रिलीज नहीं की गई। किंतु इन 5 वर्षो में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने में पूर्णता असफल साबित हुई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनके आक्रमक तेवरों का मुकाबला कोई नहीं कर पा रहा था। सभी विपक्षी दल आतंकित होकर शांत बैठे थे। उस समय राहुल गांधी ने आक्रामक रूप से उनका मुकाबला संसद और संसद के बाहर किया। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी एक नई भूमिका में आए। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान के विधानसभा चुनाव में इसका लाभ भी मिला। केंद्र और राज्यों के चुनाव में मतदाताओं की सोच अलग अलग होती है। 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी था। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है, कि 2014 में राहुल गांधी की लोकप्रियता नरेंद्र मोदी के मुकाबले में लगभग लगभग शून्य पर थी। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी की लोकप्रियता 46 फ़ीसदी के मुकाबले राहुल गांधी की लोकप्रियता 34 फ़ीसदी पर पहुंच गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें भी 2014 के मुकाबले बढ़ी हैं। कांग्रेस का वोट बैंक भी लगभग 6 फ़ीसदी सारे देश में बढ़ गया है। यह उनकी सफलता का प्रमाण है। इसमें हतोत्साहित होने की कोई जरूरत नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पहली बार कांग्रेश इस तेवर में दिखी है, जो इस समय की मांग है।
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा ने जो वादे किए थे। वह पिछले 5 वर्षों में पूरे नहीं हुए। 2019 का लोकसभा चुनाव राष्ट्रीयता के मुद्दे पर लड़ा गया। कांग्रेस को देशद्रोही टुकड़े-टुकड़े वाली गैंग का समर्थक बताकर, राष्ट्रहित के लिए मोदी जरूरी हैं। मतदाताओं के बीच यह संदेश भेजकर ध्रुवीकरण कराने में भाजपा और नरेंद्र मोदी सफल रहे। इसमें सरकार के कामकाज को लेकर जनमानस के बीच में कांग्रेश अपनी बात नहीं रख पाई। यह कांग्रेस की असफलता है। कांग्रेस के पास ना तो संगठन था, और ना ही संसाधन। ऐसी स्थिति में नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और उनके नेटवर्क का मुकाबला करने की स्थिति भी नहीं थी। अंतोगत्वा परिणाम जो आने थे वह आ गए।
लोकसभा चुनाव की इस हार में राहुल गांधी और प्रियंका को एक नया अवसर मिला है। जो जीता वही सिकंदर, यहां तक तो ठीक है। किंतु जनता की अपनी समस्याएं हैं। देश में कई चुनौतियां हैं, जिसको लेकर सरकार नाकाम साबित हुई है। उसमें विपक्ष की भूमिका में राहुल, प्रियंका और कांग्रेश के नेताओं को सत्ता पक्ष को घेरने के सैकड़ों मौके हैं। विपक्ष की भूमिका में उन्हें अपनी छवि और अपनी कार्यप्रणाली से मतदाताओं को जोड़ने के लिए और जनता तक पहुंचने के लिए बहुत बड़ा अवसर मिला है। आक्रमक शैली से यदि वह मुकाबला करेंगे, तो आने वाला समय उनका बहुत बेहतर होगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भावात्मक रूप से मतदाताओं को प्रभावित किया गया है। जिसके कारण यह चुनाव परिणाम आए हैं। इससे भी कांग्रेस को सबक लेते हुए विपक्ष में रहकर अपने संगठन को मजबूत बनाने, जहां पर कांग्रेस की सरकारें हैं। उन्हें मजबूती से काम करने देने, से कांग्रेस भविष्य बेहतर कर सकती हैं। जिस तरह से राहुल गांधी का बयान सामने आया है, कि कमलनाथ, अशोक गहलोत और चिदंबरम अपने लड़कों को चुनाव जिताने में लगे रहे। जिसके कारण पार्टी की हार हुई। यदि यह सच है, तो अन्य राज्यों में क्या हुआ। चुनाव परिणाम विधानसभा चुनाव की तुलना में लोकसभा के चुनाव परिणाम बिल्कुल अलग हैं। राष्ट्रीयता के नाम पर मोदी ने जो भावात्मक रूप से मतदाताओं को जोड़ा था। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान उसका मुकाबला ही नहीं किया। जिसके कारण इस तरह के परिणाम देखने को मिले। राहुल गांधी ने जो बयान दिया है, उसके बाद निश्चित रूप से इन राज्यों में कांग्रेश के मुख्यमंत्रियों को अपनी ही पार्टी के नेताओं से चुनौतियां मिलेंगी, तथा वह कमजोर होंगे। राहुल के इस बयान से मुख्यमंत्री भी हतोत्साहित होते हैं, तो इससे कांग्रेस कमजोर होगी। राहुल गांधी को काफी गंभीरता से मंथन करना होगा।


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