विशेष संपादकीय

सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष करने पर विचार 

(लेखक-सनत जैन / ईएमएस)


बीएसएनएल के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर सरकार बड़ी गंभीरता से विचार कर रही हैं। सरकार में जो विचार मंथन हो रहा है, उसके अनुसार बीएसएनएल के 1 लाख 76 हजार कर्मचारियों में से 50 फ़ीसदी कर्मचारी अगले 5 से 6 वर्षों में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। यदि उनकी आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष कर दी जाती है, तो 3 से 4 साल के अंदर लगभग 85,000 अधिकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाएंगे।
सरकारी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। 2016-17 में 4793 करोड़, 2017-18 में 7992 करोड़ और 2018-19 में भी लगभग 7000 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। बीएसएनएल के बढ़ते हुए घाटे को देखते हुए कंपनी, बीआरएस के माध्यम से 50 वर्ष की उम्र में तथा सेवानिवृत्त आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसके लिए कंपनी को 6365 करोड़ रुपए वीआरएस में खर्च करने की जरूरत होगी। वित्त मंत्रालय ने इतनी बड़ी रकम वीआरएस में खर्च करने के स्थान पर और कोई उपाय सुझाने के लिए कहा था। इसके बाद कर्मचारियों की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष करने तथा वीआरएस के माध्यम से जो बोझ कंपनी पर पड़ने वाला था, वह कम हो जाएगा। बीएसएनएल में कुल कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या 176000 बताई जा रही है। सेवानिवृत्ति की आयु घटाने से केंद्र सरकार को फौरी तौर पर कोई मदद नहीं देनी पड़ेगी। अगले तीन-चार वर्षों में अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या अपने आप आधी हो जाएगी।
वीआरएस का लाभ देने पर प्रत्येक वर्ष के लिए सरकार को 35 दिन का वेतन और शेष वर्षों के लिए 25 दिन का वेतन दिया जाता है। सरकार 50 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके अधिकारियों कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति तथा वीआरएस योजना का लाभ लेकर नौकरी छोड़ने का विकल्प रखती है, ऐसी स्थिति में सरकार को लग रहा है, कि यदि सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष से घटाकर 58 वर्ष की जाती है। तो इसका अन्य कंपनियां विरोध कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार पुनरुद्धार योजना में सेवानिवृत्ति की उम्र घटाकर तथा बीएसएनल को परिसंपत्तियों की बिक्री कर राशि जुटाने का विकल्प कंपनी को देने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। बीएसएनएल जैसी एकाधिकार वाली कंपनी पिछले 3 वर्षों से लगातार घाटे में चल रही है। इसके पहले वर्षों में भी उसका मुनाफा तेजी के साथ घट रहा था। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को उबारने का कोई प्रयास नहीं किया। जिसके कारण बीएसएनएल की हालत बड़ी तेजी के साथ खस्ता होती चली गई। वही जिओ जैसी कंपनी ने बीएसएनएल के मार्केट में बड़ी तेजी के साथ कब्जा जमाते हुए, उसे आर्थिक रूप से इतना कमजोर कर दिया है। बी एस एन एल अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को समय पर वेतन भी नहीं बांट पा रही हैं। दूरसंचार क्षेत्र की एकाधिकार वाली यह कंपनी यदि डूबती है, तो इसका असर अन्य कंपनियों पर भी पड़ना तय है, केंद्र सरकार को इस दिशा में काफी गंभीरता से सोच समझ कर निर्णय लेने की जरूरत है। बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के इस दौर में विशेष रूप से, जब निजी क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियां भी आर्थिक दृष्टि से सरकार के ऊपर भार बन गई हैं। ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। आशा है केंद्र सरकार बीएसएनल की कार्यप्रणाली को सुधारने और आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए बेहतर निर्णय लेगी।

- शेयर बाजार में सूचीबद्ध 400 कंपनियां लापता
भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह काला धन और भ्रष्टाचार का खेल होता है। इसका उदाहरण है, शेयर बाजार की 400 सूचीबद्ध कंपनियॉं जिनके बारे में सरकार एवं कंपनी मामलों के मंत्रालय और सेबी को कोई जानकारी नहीं है। निवेशकों का काफी बड़ा निवेश इन सूचीबद्ध कंपनियों में होता है। इसके अलावा सरकार की वित्तीय संस्थाएं भी कंपनियों में भारी निवेश करती हैं। उसके बाद यह कंपनियां यदि गायब हो जाती हैं, तो इससे बड़ी चिंता की कोई बात नहीं हो सकती हैं।
भारत के कंपनी रजिस्टर के पास करीब 11 लाख कंपनियां पंजीकृत हैं। इनमें से लगभग 5 लाख कंपनियां सक्रिय हैं। शेष छह लाख कंपनियां मुखौटा कंपनियों के रूप में उपयोग में आती हैं। जो कंपनियों के नाम पर काले धन का लेन-देन बेरोक-टोक करने का काम करते हैं। 2016 में नोटबंदी के बाद बड़ी तेजी के साथ मुखौटा कंपनियों पर कार्रवाई सरकार द्वारा की गई थी। जिसके कारण लाखों कंपनियां रातों-रात बंद हो गईं और लगभग 6000 कंपनियां एलएलपी में परिवर्तित हो गई। एलएलपी कंपनियों के लिए संसद ने सीमित दायित्व भागीदारी कानून 2008 में बनाया था। जिसमें प्रत्येक साझेदार का सीमित दायित्व निर्धारित होने की वैधता का नियम है। भागीदारों के अधिकार और दायित्व का निर्धारण उनके बीच हुए समझौते की शर्तों के आधार पर तय होता है।
नोटबंदी के बाद पहले चरण मैं सरकार ने 2 लाख 25 हजार कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही की थी। इसमें कंपनियों के तीन लाख डायरेक्टर भी शामिल थे। इन कंपनियों का कारोबार जरूर बंद हो गया। किंतु किसी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जिसके कारण कंपनियों का यह गोरखधंधा लगातार चल रहा है। 400 कंपनियां जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई थी। उनका पैन कार्ड नहीं होना और उनका गायब हो जाना, इस बात का द्योतक है, कि भारत में कंपनियों के माध्यम से किस तरह कर चोरी और आम जनता के पैसों की बंदरबांट कंपनियों के माध्यम से की जा रही है। कंपनियों में सरकार की वित्तीय संस्थाओं का भी समय-समय पर भारी निवेश होता है। शेयर बाजार के आधार पर इसका निवेश होने से यदि यह कंपनियां गायब होती हैं , या घाटे में जाती हैं, या दिवालिया घोषित होती हैं, ऐसी दशा में सरकार के वित्तीय संस्थानों को भी अरबों खरबों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। इसके साथ ही जिन लोगों ने बैंकों में अपने पैसे जमा कराए हैं, या कंपनियों पर सीधा निवेश किया है। उन सभी को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। केंद्र सरकार को इस दिशा में विशेष सजगता बरतनी होगी। अरबों खरबों रुपए के घोटाला करने वाले कंपनियों के कर्ताधर्ताओं के ऊपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा भारत का आर्थिक संकट और तेजी के साथ बढ़ेगा। इस पर नियंत्रण कर पाना सरकार की वश में भी नहीं होगा।
21जून/ईएमएस
Share To:

Post A Comment: