लेखक 

अपना अपना हक :~~~~~~~~~~


"भाई मज़ा आ गया! क्या स्वाद है तुम्हारे छोले कुलचे में। रात को होटल में जो खाना मंगवाया बिल्कुल बकवास। तुम्हारी ये तीस रुपये की प्लेट में आनंद आ गया और वहां तीन सौ की दाल भी बेस्वाद। ऊपर से रूम सर्विस के चार्ज और जोड़ दिए।"

"वो साब क्या है। ऊंची दुकान फीके पकवान। लेकिन लोग कहाँ समझते हैं । वहां पता भी नहीं चलता कब का बासी खाना तड़का लगा कर, ऐ सी की ठंडक और रंगीन रोशनी की चमक में परोस दिया जाता है। बट आई कांट डू दिस।"

"अरे वाह ! तुम तो अंग्रेज़ी भी बोलते हो। कितना पढ़े लिखे हो भाई ?"

"सर! आई एम ग्रेजुएट ।"

"ओह ! वंडरफुल।"

"तो यार! जॉब क्यों नहीं की। मेरा मतलब कोई नौकरी वगैरह।"

"सर! मैं गरीब, मजदूर माँ बाप का बेटा। उनके सपने थे बेटे को पढ़ा लिखा कर बड़ा आदमी बनाएंगे। नौकरी करेगा तो हमारी गरीबी के दिन भी मिट जाएंगे। लेकिन सर आप तो जानते हो ना, जिसे देखो वो सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहा है। हा हा ...और हालत क्या है। एक अनार सौ बीमार। हम भी खूब कोशिश किए लेकिन सफलता नहीं मिली। हार कर यहां शहर आ गए बड़ी मुश्किल से एक जगह काम मिला। बारह सोलह घंटे काम और तनख्वाह इतनी कम कि अपना गुजारा भी मुश्किल, फिर अम्मा बापू को क्या भेजते? एक दिन हम सोचे, यूँ तो उम्र बीत जाएगी। तो सोचे, गरीब का सबसे बड़ा दुश्मन है भूख और चाहे जो भी इंसान हो खाना तो खायेगा ही। बस फिर क्या था हम जिनके पास सवेरे शाम खाना खाते थे उनसे ही बिनती किए .... छह आठ महीने उनके साथ काम किए और फिर यहां ये अपना ठिया लगा लिए।"

"अरे गज़ब, भाई ग़ज़ब! यार एक बात कहें तुम्हारे जैसे युवा को देख छाती चौड़ी हो जाती है। अब तुम नाश्ते के साथ, चाय कॉफी भी रखो तो और ज्यादा अच्छा रहेगा।" 

"नहीं सर! नहीं, हम ऐसा कभी नहीं करेंगे। आपको चाय कॉफी पीने के लिए यहाँ से चालीस पचास कदम दूर जाना पड़ेगा। हम अपना नसीब का पा रहे हैं और हम ही नहीं ये सब लड़का लोग हमारे ही गांव से आये हैं। ऐसे ही चाय कॉफी वाला भी हमारे जैसा ही है, तो हम उसका हक क्यों मारें? "

"भाई तुमने तो बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों को भी फ़ेल कर दिया। रियली यू आर ए ग्रेट पर्सन, शाबाश बेटे शाबाश ...!

अरुण धर्मावत

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परिचय

 अरुण धर्मावत जी... जयपुर राजस्थान से है... मुद्रण व्यवसाय से जुड़े होने के साथ... साहित्य से लगाव बना रखा है। लगभग एक दर्जन पुस्तकों के रचियता होने के साथ कुछ साझा संग्रह में भी आपकी हिस्सेदारी है। एम पी मीडिया पॉइंट के लिए आपकी स्वीकृति और सहमति के लिए हम आपके आभारी हैं... स्वागत है...।
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समीक्षा 


 अपना अपना हक.... 
यह कहानी... वह कहानी है.. जिसकी रवानी.... देश की जवानी को एक नई राह दिखाती है..।... है तो लघु कथा की तरह... परंतु संदेश की गहराई के बारे में... बस इतना कहा जा सकता है कि.. देखन में छोटे लगे... घाव करें गंभीर..। बात करें कथानक की तो बातचीत है.. एक खोमचे वाले और उसके ग्राहक के बीच की... सामान्य तरीके से लिखे गए इस कथानक में.... भाव बहुत असामान्य हैं....। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है.. और ग्राहक पूछता है.. अरे आपको तो अंग्रेजी भी आती है... कोई जॉब क्यों नही की..। इसी वार्ता में पहला संदेश है कि... हमारी शिक्षा प्रणाली क्या सिर्फ नौकर पैदा करती है... क्या मालिक बनाने की क्षमता उस मे नहीं है..। शुक्र है कि.. बातों ही बातों में.. यह राज खुल ही जाता है कि.. मालिक बनकर ठेला वाला ज्यादा खुश है... नौकर बनकर उसने तकलीफों को भोग लिया है..। और दूसरे संदेश में अपने अपने भाग्य की कमाई के अर्थ शास्त्र को... इतनी आसानी से कह दिया गया है कि... दुनिया के पहले अर्थ शास्त्री को भी यह बात इतनी सरलता से समझ नहीं आई होगी। 
कथानक की सहजता और सरलता के साथ गांभीर्य प्रकृति के संदेश देने में लेखक की लेखनी सफल रही है..। अरुण जी.. बधाई....।
संपादक 
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