जापान से भारत सहित सारी दुनिया के देश सबक लें
जापान में ही दूसरी घटना फुकुशिमा त्रासदी के नाम से 11 मार्च 2011 को आई। जापान के ओशिका में 9 तीव्रता वाला भूकंप आया। इस भूकंप की तीव्रता 24 किलोमीटर जमीन के अंदर तक थी। जिसके कारण जापान के समुद्र में सुनामी आ गई। समुद्र की लहरें ओकीनावा द्वीप से टकराई। जिसने भारी तबाही मचाई। इस त्रासदी में 15000 लोग मारे गए। 2,000 से ज्यादा लोगों के शव आज तक नहीं मिल पाए। इस त्रासदी से जापान के बहुत बड़े हिस्से की सड़कें बह गई। कई स्थानों पर जमीन दो भागों में बंट गई रेलवे को काफी नुकसान हुआ। कई दिनों तक 44 लाख घरों की बिजली आपूर्ति बंद हो गई। सुनामी के कारण 2 परमाणु संयंत्रों में रिसाव शुरू हो गया था। 14 लाख घरों की पेयजल आपूर्ति बंद हो गई थी। रेडियोधर्मी विकिरण को रोकने के लिए जापानियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर रिसाव को रोका। इस त्रासदी में हजारों बच्चों के माता-पिता मारे गए। वहीं किसी की पत्नी और किसी के पति की मृत्यु हो गई। लेकिन वाह रे जापानी, 1 सप्ताह के अंदर उन्होंने अपना नया परिवार बना लिया। जिन बच्चों के माता पिता खत्म हो गए थे। उन बच्चों को नए माता-पिता मिल गए। जिनकी पति या पत्नी त्रासदी में मारे गए, उन्होंने एक दूसरे को अपना लिया। 1 सप्ताह के अंदर ही उन्होंने अपना नया जीवन शुरू कर लिया। जापान ने इस भयानक त्रासदी में भी विश्व के अन्य देशों से सहायता की गुहार नहीं लगाई। बड़े धैर्य के साथ इतनी बड़ी त्रासदी का मुकाबला किया।
कोरोनावायरस को लेकर जब सारी दुनिया के 170 से ज्यादा देशों में भय व्याप्त है। वहीं जापान ने इस कोरोनावायरस का मुकाबला बड़े धैर्य के साथ किया है। नमस्ते करना जापानियों में पूर्व से ही प्रचलित था। कोरोनावायरस के संक्रमण को देखते हुए, उन्होंने हाथ मिलाना बंद कर दिया। बाहर निकलते थे, तो मास्क पहनकर निकलने की उन्हें आदत पहिले से ही थी। साफ-सफाई का ध्यान उन्होंने रखा। कोरोनावायरस की इस महामारी में जापान ने कोई लॉक डाउन लागू नहीं किया। कम से कम मरीजों की उन्होंने जांच की। कोरोनावायरस जब अपने अंतिम तीसरे चरण में पहुंच रहा है। तब जापान में कोरोनावायरस के कारण 44 मौत हुई है। वहीं संक्रमित लोगों की संख्या भी मात्र 1400 है। उल्लेखनीय है, जापान की आबादी में वृद्धों की संख्या सबसे ज्यादा है। उसके बाद भी कोरोनावायरस के संक्रमण का मुकाबला, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से किया है।
जापान में रेलें और बसें नियमित रूप से चल रही। हैं सड़कों पर आम दिनों की तरह चहल पहल है। सारे उद्योग धंधे पूर्व की तरह संचालित हैं। सारी दुनिया के देशों में जापान ही एकमात्र ऐसा देश है, जो कोरोनावायरस की महामारी के सामने सीना तान कर खड़ा है। जो जापानियों के आत्मविश्वास और जेनेटिक गुणों को दर्शाता है। जापानी हर मुसीबत में बिना धैर्य खोए, एकजुट रहकर, बड़ी से बड़ी मुसीबत का मुकाबला कर लेते हैं। जो सारी दुनिया के लिए एक सबक भी है। जापानी अपनी राष्ट्रीयता, संस्कृति और संवेदनशीलता के कारण सारी दुनिया में श्रेष्ठता का एहसास करा कर रहे हैं। भारत जैसे देश के नेतृत्व ने कोरोनावायरस के मुकाबला करने के स्थान पर इसे भय का राजनैतिक एवं व्यापारिक स्टंट बनाकर अपने हितों के लिए एक माध्यम बना लिया है। मीडिया भी इसमें भय का वातावरण बना रहा है। कोरोनावायरस से निपटने के इलाज भारतीय आयुर्वेदिक के पाठ्यक्रम में मौजूद हैं। भारत में कोरोनावायरस को लेकर जिस तरह से भय का वातावरण बनाया गया है। उससे गरीब जनता कोरोनावायरस के कारण शायद नहीं मरे। किंतु लॉकडाउन के शासकीय आदेशों और लालफीताशाही के चलते जरूर जीवन और मृत्यु के बीच में झूल रहे हैं। भारत सरकार ने कोरोनावायरस के डर से जिस तरह बिना सोचे समझे लॉकडाउन लागू किया। ट्रेनें और बसें बंद कर दी। सारे देश में जनता कर्फ्यू लगाकर लोगों को घरों में कैद कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप रोजी-रोटी के संकट से गुजरने वाले करोड़ों गरीब-मजदूर अब सड़कों पर उतर कर बगावत करने पर मजबूर हैं। भारत सरकार इस महामारी को भय के स्टंट और इवेंट के स्थान पर गंभीरता तथा धैर्य के साथ मुकाबला करे तो इस महामारी से आसानी से निपटा जा सकता है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए की भूख आदमी को बगावत की ओर ले जाती है। दुनिया में जो भी क्रांति हुई हैं। वह सब भूख के कारण ही हुई हैं। रोम जल रहा था। नीरो बंशी बजा रहा था।1917 में जार क्रांति भी भूख के कारण हुई थी। कुछ इसी तरह की स्थिति अब भारत में देखने को मिल रही हैं। जहां शासन, प्रशासन, न्यायपालिका तथा राजनेताओं में संवेदनशीलता पूरी तरह से गायब है।
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लेखक सनत कुमार जैन देश के नामचीन पत्रकार है। आप एक्स्प्रेस मीडिया समूह के ग्रुप एडिटर हैं।
(लेखक- ईएमएस/सनत कुमार जैन)
जापान एक ऐसा देश है। जो बड़ी से बड़ी मुसीबतों में भी अपना धैर्य नहीं खोता है। कोरोनावायरस की महामारी में भी जापान ने प्रमाणित कर दिया है, कि वह हर मुसीबत से हंसते-हंसते निपटने में सक्षम हैं। मुसीबत से लड़ना और जीतना जापान के नागरिकों का जैसे जेनेटिक गुण है। 6 अगस्त 1945 को अमेरिका की वायुसेना ने जापान के हिरोशिमा में परमाणु बम गिराया था। जिसमें 1 लाख 40,000 जापानी नागरिक मारे गए थे। 3 दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी में दूसरा बम गिराया गया। जिससे 1 किलोमीटर दायरे की हर चीज नष्ट हो गई। इस बम विस्फोट में भी हजारों लोग मारे गए। इसके बाद भी जापानियों ने हार नहीं मानी और पुनर्निर्माण की दिशा में वह पूरे जोश के साथ जुट गए। दो दशक के अंदर ही उन्होंने सारी दुनिया में अपना प्रभुत्व और आर्थिक क्षमता दिखाना शुरू कर दी। बीती ताहि बिसार दे की तर्ज पर उसने अमेरिका जैसे देश से भी अपने बेहतर संबंध बनाएं। बड़ी तेजी के साथ आर्थिक उन्नति भी की।जापान में ही दूसरी घटना फुकुशिमा त्रासदी के नाम से 11 मार्च 2011 को आई। जापान के ओशिका में 9 तीव्रता वाला भूकंप आया। इस भूकंप की तीव्रता 24 किलोमीटर जमीन के अंदर तक थी। जिसके कारण जापान के समुद्र में सुनामी आ गई। समुद्र की लहरें ओकीनावा द्वीप से टकराई। जिसने भारी तबाही मचाई। इस त्रासदी में 15000 लोग मारे गए। 2,000 से ज्यादा लोगों के शव आज तक नहीं मिल पाए। इस त्रासदी से जापान के बहुत बड़े हिस्से की सड़कें बह गई। कई स्थानों पर जमीन दो भागों में बंट गई रेलवे को काफी नुकसान हुआ। कई दिनों तक 44 लाख घरों की बिजली आपूर्ति बंद हो गई। सुनामी के कारण 2 परमाणु संयंत्रों में रिसाव शुरू हो गया था। 14 लाख घरों की पेयजल आपूर्ति बंद हो गई थी। रेडियोधर्मी विकिरण को रोकने के लिए जापानियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर रिसाव को रोका। इस त्रासदी में हजारों बच्चों के माता-पिता मारे गए। वहीं किसी की पत्नी और किसी के पति की मृत्यु हो गई। लेकिन वाह रे जापानी, 1 सप्ताह के अंदर उन्होंने अपना नया परिवार बना लिया। जिन बच्चों के माता पिता खत्म हो गए थे। उन बच्चों को नए माता-पिता मिल गए। जिनकी पति या पत्नी त्रासदी में मारे गए, उन्होंने एक दूसरे को अपना लिया। 1 सप्ताह के अंदर ही उन्होंने अपना नया जीवन शुरू कर लिया। जापान ने इस भयानक त्रासदी में भी विश्व के अन्य देशों से सहायता की गुहार नहीं लगाई। बड़े धैर्य के साथ इतनी बड़ी त्रासदी का मुकाबला किया।
कोरोनावायरस को लेकर जब सारी दुनिया के 170 से ज्यादा देशों में भय व्याप्त है। वहीं जापान ने इस कोरोनावायरस का मुकाबला बड़े धैर्य के साथ किया है। नमस्ते करना जापानियों में पूर्व से ही प्रचलित था। कोरोनावायरस के संक्रमण को देखते हुए, उन्होंने हाथ मिलाना बंद कर दिया। बाहर निकलते थे, तो मास्क पहनकर निकलने की उन्हें आदत पहिले से ही थी। साफ-सफाई का ध्यान उन्होंने रखा। कोरोनावायरस की इस महामारी में जापान ने कोई लॉक डाउन लागू नहीं किया। कम से कम मरीजों की उन्होंने जांच की। कोरोनावायरस जब अपने अंतिम तीसरे चरण में पहुंच रहा है। तब जापान में कोरोनावायरस के कारण 44 मौत हुई है। वहीं संक्रमित लोगों की संख्या भी मात्र 1400 है। उल्लेखनीय है, जापान की आबादी में वृद्धों की संख्या सबसे ज्यादा है। उसके बाद भी कोरोनावायरस के संक्रमण का मुकाबला, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से किया है।
जापान में रेलें और बसें नियमित रूप से चल रही। हैं सड़कों पर आम दिनों की तरह चहल पहल है। सारे उद्योग धंधे पूर्व की तरह संचालित हैं। सारी दुनिया के देशों में जापान ही एकमात्र ऐसा देश है, जो कोरोनावायरस की महामारी के सामने सीना तान कर खड़ा है। जो जापानियों के आत्मविश्वास और जेनेटिक गुणों को दर्शाता है। जापानी हर मुसीबत में बिना धैर्य खोए, एकजुट रहकर, बड़ी से बड़ी मुसीबत का मुकाबला कर लेते हैं। जो सारी दुनिया के लिए एक सबक भी है। जापानी अपनी राष्ट्रीयता, संस्कृति और संवेदनशीलता के कारण सारी दुनिया में श्रेष्ठता का एहसास करा कर रहे हैं। भारत जैसे देश के नेतृत्व ने कोरोनावायरस के मुकाबला करने के स्थान पर इसे भय का राजनैतिक एवं व्यापारिक स्टंट बनाकर अपने हितों के लिए एक माध्यम बना लिया है। मीडिया भी इसमें भय का वातावरण बना रहा है। कोरोनावायरस से निपटने के इलाज भारतीय आयुर्वेदिक के पाठ्यक्रम में मौजूद हैं। भारत में कोरोनावायरस को लेकर जिस तरह से भय का वातावरण बनाया गया है। उससे गरीब जनता कोरोनावायरस के कारण शायद नहीं मरे। किंतु लॉकडाउन के शासकीय आदेशों और लालफीताशाही के चलते जरूर जीवन और मृत्यु के बीच में झूल रहे हैं। भारत सरकार ने कोरोनावायरस के डर से जिस तरह बिना सोचे समझे लॉकडाउन लागू किया। ट्रेनें और बसें बंद कर दी। सारे देश में जनता कर्फ्यू लगाकर लोगों को घरों में कैद कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप रोजी-रोटी के संकट से गुजरने वाले करोड़ों गरीब-मजदूर अब सड़कों पर उतर कर बगावत करने पर मजबूर हैं। भारत सरकार इस महामारी को भय के स्टंट और इवेंट के स्थान पर गंभीरता तथा धैर्य के साथ मुकाबला करे तो इस महामारी से आसानी से निपटा जा सकता है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए की भूख आदमी को बगावत की ओर ले जाती है। दुनिया में जो भी क्रांति हुई हैं। वह सब भूख के कारण ही हुई हैं। रोम जल रहा था। नीरो बंशी बजा रहा था।1917 में जार क्रांति भी भूख के कारण हुई थी। कुछ इसी तरह की स्थिति अब भारत में देखने को मिल रही हैं। जहां शासन, प्रशासन, न्यायपालिका तथा राजनेताओं में संवेदनशीलता पूरी तरह से गायब है।
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