🔸बड़े घर का बेटा🔸~°~°~°~°~°~°~°~


'आपका वीकली आफ है न आज... वैसे भी पूरे सप्ताह से कभी लाँग ड्यूटी कभी कॉल ड्यूटी... आज कहाँ जाना है सुबह-सुबह इतनी जल्दी। हालत देखी है अपनी, शेव तक नहीं बनाई है कई दिनों से। ' 
अणिमा ने शलभ को एप्रन व स्टेथो उठाते देखकर पूछा। 
"वीकली आफ.... वो तो मैंने आफ करवा दिया है अणिमा। स्टॉफ पहले ही कम है अस्पताल में। जब से कोरोना का कंट्रोल रूम बना है, हम लोगों के साथ पेरामेडीकल स्टॉफ ने भी छुट्टी के लिए मना कर दिया है।" 
'क्यों... बाकी सभी जगह छुट्टी और दुनिया भर की हिदायत दी गई है। डॉक्टर क्या इंसान नहीं है ?' 
"अणिमा, तुम्हारी सोच गलत नहीं है। लेकिन हर इंसान की किसी खास समय पर जिम्मेदारी भी खास हो जाती हैं। डॉक्टर जिसे कभी धरती पर भगवान का दर्जा मिला था, अपने स्वार्थ व सोच से उसे खोने लगा। ईश्वर ने यह मौका दिया है इस विपत्ति के समय, अपनी सेवा से उस कलंक को धोने के साथ उस कसम की लाज बचाने का जो खाई थी इस उत्कृष्ट पेशे में आने से पहले।"
'लेकिन और भी डॉक्टर हैं। मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल के नाम पर दुकान खोलकर बैठने वालों की कोई जिम्मेदारी नहीं है। वो कसम उनने नहीं खाई थी क्या ? या तुम ही इकलौते बचे हो उसे याद रखने वाले।' 
" अगर यही बात दुनिया की दूसरी माँ और पत्नियाँ सोच लें तो सबसे पहले हमारी सीमाएं खाली होंगी। कोई सैनिक अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी रक्षा के लिये नहीं जायेगा। और भी न जाने कितनी ऐसी जगह हैं जहाँ जान जोखिम में डाल कर कितने लोग देश की सेवा कर रहे हैं।' 
" लेकिन शलभ! छोटी सी बच्ची है हमारी। आप वहाँ संक्रमित लोगों के बीच रहते हैं। अगर इसे कुछ हो गया तो। कभी सोचा है क्या होगा हमारा....' ।
" कुछ नहीं हो सकता है हमारी बेटी या तुम्हें। मैं हर उस बात का ध्यान रखता हूँ जिससे संक्रमण हो सकता है दूसरों को। अपना व घर का सेनिटाइजेशन कैसे करना है मुझे पता है। देखा नहीं तुमने, शू रैक बाहर बरामदे के नीचे रखवा दिया है मैंने। उसके साथ ही हाथ धोने व पैरों को कीटाणु रहित करने के लिए फुट बाथ है। एप्रन तक मैं वहीं छोड़ देता हूँ। और फिर तुम्हारी वो दुर्गा माँ... बैठी हैं न वो तुम्हारी रक्षा के लिए। "
'तो वो क्या तुम्हारे मरीजों की रक्षा नहीं करेंगी।' 
" क्यों नहीं करेंगी। जरूर करेंगी। लेकिन वो हर काम को करने के लिए खुद नहीं आ सकतीं इस लिए कोई जरिया बनाती हैं। इसबार हम डॉक्टरों को चुना है उन्होंने इस आपदा से निपटने के लिए।"
'तुमसे बहस में तो मैं जीत नहीं सकती। जाओ अपने दूसरे घर.... '।
"घर तो एक ही है मेरा, लेकिन हाँ नसीब वाला हूँ। बहुत बड़े घर का बेटा हूँ।असीमित है मेरा परिवार।"
'टेक केयर बड़े घर के बेटे.... अपना ध्यान रखना। मैं आपके उस घर के हर सदस्य के लिए दुर्गा माँ से प्रार्थना करूँगी। बाई..... '।
यह हुई न बात। दवा और दुआ मिल जायें तो संजीवनी बन जाती है। शलभ मुस्कुराते हुए निकला घर से। 
अणिमा देख रही थी अपने सैनिक को मोर्चे पर जाते हुए। अभिमान व गर्व की लालिमा से दमक रहा था उसका चेहरा। 

मुकेश दुबे

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 परिचय

मुकेश दुबे.. सीहोर निवासी हैं और शासकीय सेवा के साथ साहित्य की सेवा दिन प्रतिदिन करते हैं। आपके कथा संग्रह, उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और नियमित तथा सम सामयिक विषय पर कहानी लेखन में आपकी कलम निरंतर गतिमान रहती है। विपरीत स्वास्थ्य के बावजूद आपकी साहित्य के प्रति जीवट सक्रियता प्रणम्य है। आपने चित्रों और गीतों को भी कहानी की शक्ल में गढ़कर एक नई विधा का श्री गणेश भी किया है। एम पी मीडिया पॉइंट के परिवार के वरिष्ठ सदस्य हैं और साहित्य सोपान के आप नियमित लेखक हैं। आपके नियमित सहयोग केलिए आभार....।
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 समीक्षा 

बड़े घर का बेटा...... वास्तव में उस बड़े परिवार का सदस्य है.. जिस परिवार में हरेक का अपना अपना काम निर्धारित है। वह सदस्य सैनिक के रूप में चौकस है... तो किसान बनकर अन्नदाता की भूमिका भी निभाता है..। शासन का मुखिया होकर नियम बनाता है... तो प्रशासन के रूप में उन नियमों का पालन भी कराता है...। कभी व्यापारी है... तो कभी हम्माल...। ऐसे ही न जाने कितने सदस्य अपने अपने रोल को निभा रहे हैं...। ऐसा ही एक सदस्य है डाक्टर....। जो कोरोना वायरस के खिलाफ अपने पैरा मेडिकल स्टाफ के साथ एक जंग लड़ रहा है...। जंग उसको ही कहते हैं न... जहाँ प्राण दांव पर लगे हो...। शलभ की पत्नी अणिमा की यही चिंता है... अगर तुम्हें कुछ हो गया तो.... हमारा क्या होगा...। दवाओं से मरीजों को ठीक करने वाला डाक्टर शलभ.... दुआओं का यकीन दिलाता है... अपनी पत्नी अणिमा को...। दवा और दुआ के संतुलन को पत्नी मान भी लेती है...। यही इस कथानक का छोटा सा सार... समुद्र सी गहराई वाले संदेश को कितनी आसानी से कह जाता है कि... इस बार माँ दुर्गा ने अपनों की रक्षा करने के लिए... हम डाक्टर को चुना है....। अध्यात्म के नजरिये से देखा जाए... तो भी आपके - हमारे जिम्मे आने वाला हर काम..... वास्तव में ईश्वर द्वारा हमारा चयन किया जाना ही है....। जिसे अधिकांश स्थिति में शिकायत भरे अंदाज में ही हम करते हैं....। डॉ शलभ की तरह... खुद के ईश्वर द्वारा चयनित होने पर प्रसन्न नही हो पाते...। यह महत्वपूर्ण संदेश कथाकार ने... इस कथानक में.... सहजता और सरलता के साथ.... अपने पाठकों को सौंप दिया है...। कहानीकार की लेखनी को साधुवाद....। साथ ही सम सामयिक विषय से भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए भी उन तमाम चिकित्सा सेवा में लग कर.... कोरोना से जंग लड़ रहे... सेवाधारियों की तरफ से भी लेखक का आभार बनता है....। जो सरकारी अस्पतालों में आम दिनों में लोगों के अपमान किये जाने के बाद भी... अपनी ड्यूटी को ईमानदारी से अंजाम देते हैं..। लेकिन वही लोग निजी क्षेत्र के अस्पतालों में शालीन व्यवहार करते देखे जा सकते हैं...। यह बिंदु इस कहानी का अंतर्निहित भाव है...। सामयिक कहानी लेखन में मुकेश दुबे... नाम के कहानीकार... की कलम त्वरित गति से गतिमान रहती है...। यह हमारे दौर की खुशनसीबी है.... कि हम मुकेश दुबे के काल खंड को जीवंत रूप से जी रहे हैं। कोरोना के खिलाफ लडी जा रही जंग में... आपकी लेखनी का योगदान.... चिकित्सा सेवा के लिए स्वर्णिम है....। बधाई.... मुकेश दुबे जी....। 
शैलेश तिवारी
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