आपको कोई अनुमान है कि यह विपदा कब समाप्त होगी? नहीं न ?
तो अनिश्चित काल और अापातकाल की मर्यादा, प्रोटोकॉल या समझ क्या कहती है, आपको पता है? नहीं ?
तो ध्यान दीजिए...
लेखक दिनेश नागर
•जीवन रक्षक मूल भूत उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अभी इसी क्षण से न्यूनतम कर दीजिए भले ही आपके घर में भंडार भरे हों।
यदि आप बाजार पर निर्भर हैं और सोचते हैं कि आवश्यक अनाज, दालें आदि सब जब चाहें तब खरीद लेंगे तो समझ लीजिए कि आपका धन दो कौड़ी का होने वाला है। इसलिए जो अभी खाद्य सामग्री है उसको संचित करके समझदारी के साथ उपयोग करें।
•यदि आपके पास खूब राशन सामग्री है, सब कुछ भरपूर है जिसके कारण आप रोज विविध व्यंजन बनाकर उसका प्रदर्शन करते हैं तो आपके जैसा पकवानों का प्रदर्शन करने के लिए आप अप्रत्यक्ष रूप से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं जिससे ऐसा प्रदर्शन करने वालों और अन्न की आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती है। जिस अन्न से लोग कई महीनों जी सकते थे वह पहले ही समाप्त होने लगेगा, लोग भुखमरी मरेंगे क्योंकि जिस अन्न से उनके प्राण बचते उसे तो आपने वाहवाही लूटने और अहम प्रदर्शन में लगा दिए। ऐसा करते हुए आप बहुत असंवेदशील दिखने लगते हैं।
आप बहुत नासमझ भी लगते हैं क्योंकि आपको नहीं पता कि आप चार दिन का भोजन एक दिन में समाप्त कर देंगे , चालीस दिन का भोजन दस दिन में समाप्त कर देंगे तो बाकी का समय कैसे कटेगा।
यदि आपको भ्रम है कि आपके पास बहुत पैसा है, जुगाड है तो आप बाजार से के आयेंगे तो अभी आपको चिंतन करने की आवश्यकता है।
बस याद रखिए कि ""यदि आप आवश्यकता से अधिक थोड़ा भी खा रहे हैं तो समझिए कि आप किसी दूसरे के हिस्से का अन्न खा रहे हैं।""
इस सबका अर्थ ऐसा नहीं कह रहे हैं कि आप अपनी पसंद का भोजन न करें, बस संयम के साथ अपातकाल को ध्यान में रखें।
• शरीर को स्वस्थ रखना बहुत आवश्यक है क्योंकि अभी आपके
गलत खानपान और खाकर पड़े रहने से यदि कोई रोग बन गया तो इन सामान्य रोगों का भी उपचार कराने जाने कि सुविधा नहीं है। आवश्यकता से अधिक खाने वाले को विविध रोग से ग्रस्त हो मरते देखा होगा लेकिन आवश्यकता से कम या दिन केवल एक बार भोजन करने वाले स्वस्थ रहते हैं।
इसलिए दिन में 25 मिनट पसीना बहाकर रोज का रोज शरीर को डिटॉक्स करिए।
• अनिश्चित कालीन विपत्ति काल में मानसिक असंतुलन सबसे बड़ी चुनौती होती है। स्वयं को संयमित रखना, बच्चों को समझाना और संभालना। बाह्य परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाले भय और क्रोध पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है।
भविष्य को लेकर अनेकानेक चिंताओं से घिर जाना यह उससे भी खतरनाक है जिस परिस्थिति के बारे में सोचकर आप चिंतित हैं जो कि अभी आई भी नहीं और वैसा कुछ होगा यह भी नहीं पता।
इसलिए यदि थोड़ा भी तनाव हो, अनिद्रा हो तो उसे ठीक करिए। इसके उपाय के लिए दो सूत्र याद रखें - " पहला शरीर से इतना श्रम की पसीना आ जाए चाहे आसन से या किसी और कसरत से और दूसरा शरीर को समेट कर बिठा देना 1 घंटा ध्यान करना। ध्यान न लगे तो भी होश पूर्वक एक घंटे बैठना।
• यदि आप सक्षम है तो अपने आसपास लोगों कि सहायता करना।
...
आपकी सोच से यह परिस्थितियां कहीं अधिक कठिन होने वाली हैं, लेकिन आप निश्चित ही निकल जायेंगे बस एक काम करना होगा " ऋषि - मुनि जीवन शैली" का अनुपालन करना।
कम भोजन लेकिन उच्च स्तरीय मानसिक आनंद।
कम सुविधाएं लेकिन भीतर अद्भुत क्षमता की उपस्थिति।
तो अनिश्चित काल और अापातकाल की मर्यादा, प्रोटोकॉल या समझ क्या कहती है, आपको पता है? नहीं ?
तो ध्यान दीजिए...
लेखक दिनेश नागर
•जीवन रक्षक मूल भूत उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अभी इसी क्षण से न्यूनतम कर दीजिए भले ही आपके घर में भंडार भरे हों।
यदि आप बाजार पर निर्भर हैं और सोचते हैं कि आवश्यक अनाज, दालें आदि सब जब चाहें तब खरीद लेंगे तो समझ लीजिए कि आपका धन दो कौड़ी का होने वाला है। इसलिए जो अभी खाद्य सामग्री है उसको संचित करके समझदारी के साथ उपयोग करें।
•यदि आपके पास खूब राशन सामग्री है, सब कुछ भरपूर है जिसके कारण आप रोज विविध व्यंजन बनाकर उसका प्रदर्शन करते हैं तो आपके जैसा पकवानों का प्रदर्शन करने के लिए आप अप्रत्यक्ष रूप से दूसरों को भी प्रेरित करते हैं जिससे ऐसा प्रदर्शन करने वालों और अन्न की आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती है। जिस अन्न से लोग कई महीनों जी सकते थे वह पहले ही समाप्त होने लगेगा, लोग भुखमरी मरेंगे क्योंकि जिस अन्न से उनके प्राण बचते उसे तो आपने वाहवाही लूटने और अहम प्रदर्शन में लगा दिए। ऐसा करते हुए आप बहुत असंवेदशील दिखने लगते हैं।
आप बहुत नासमझ भी लगते हैं क्योंकि आपको नहीं पता कि आप चार दिन का भोजन एक दिन में समाप्त कर देंगे , चालीस दिन का भोजन दस दिन में समाप्त कर देंगे तो बाकी का समय कैसे कटेगा।
यदि आपको भ्रम है कि आपके पास बहुत पैसा है, जुगाड है तो आप बाजार से के आयेंगे तो अभी आपको चिंतन करने की आवश्यकता है।
बस याद रखिए कि ""यदि आप आवश्यकता से अधिक थोड़ा भी खा रहे हैं तो समझिए कि आप किसी दूसरे के हिस्से का अन्न खा रहे हैं।""
इस सबका अर्थ ऐसा नहीं कह रहे हैं कि आप अपनी पसंद का भोजन न करें, बस संयम के साथ अपातकाल को ध्यान में रखें।
• शरीर को स्वस्थ रखना बहुत आवश्यक है क्योंकि अभी आपके
गलत खानपान और खाकर पड़े रहने से यदि कोई रोग बन गया तो इन सामान्य रोगों का भी उपचार कराने जाने कि सुविधा नहीं है। आवश्यकता से अधिक खाने वाले को विविध रोग से ग्रस्त हो मरते देखा होगा लेकिन आवश्यकता से कम या दिन केवल एक बार भोजन करने वाले स्वस्थ रहते हैं।
इसलिए दिन में 25 मिनट पसीना बहाकर रोज का रोज शरीर को डिटॉक्स करिए।
• अनिश्चित कालीन विपत्ति काल में मानसिक असंतुलन सबसे बड़ी चुनौती होती है। स्वयं को संयमित रखना, बच्चों को समझाना और संभालना। बाह्य परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाले भय और क्रोध पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है।
भविष्य को लेकर अनेकानेक चिंताओं से घिर जाना यह उससे भी खतरनाक है जिस परिस्थिति के बारे में सोचकर आप चिंतित हैं जो कि अभी आई भी नहीं और वैसा कुछ होगा यह भी नहीं पता।
इसलिए यदि थोड़ा भी तनाव हो, अनिद्रा हो तो उसे ठीक करिए। इसके उपाय के लिए दो सूत्र याद रखें - " पहला शरीर से इतना श्रम की पसीना आ जाए चाहे आसन से या किसी और कसरत से और दूसरा शरीर को समेट कर बिठा देना 1 घंटा ध्यान करना। ध्यान न लगे तो भी होश पूर्वक एक घंटे बैठना।
• यदि आप सक्षम है तो अपने आसपास लोगों कि सहायता करना।
...
आपकी सोच से यह परिस्थितियां कहीं अधिक कठिन होने वाली हैं, लेकिन आप निश्चित ही निकल जायेंगे बस एक काम करना होगा " ऋषि - मुनि जीवन शैली" का अनुपालन करना।
कम भोजन लेकिन उच्च स्तरीय मानसिक आनंद।
कम सुविधाएं लेकिन भीतर अद्भुत क्षमता की उपस्थिति।


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