लेखक 

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 


जिंदगी जब बेइंतहा दर्द बख्श रही हो और पीड़ित कुदरत के नजारों एवं भौतिक जीवन के दृश्यों में खो कर अपने दर्द को भूल जाए..। ऐसे जीवट इंसान का नाम इरफ़ान खान है। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जीवन के आखिरी पढ़ाव पर उन्होंने जो कुछ महसूस किया उसको एक पत्र के माध्यम से का दिया जो उन्होंने अपने एक मित्र को लिखा। मृत्यु शैया पर जीवन का संदेश आप भी पढ़ें। 
मशहूर फिल्म डाइरेक्टर 'गुरु दत' की मौत पर रचित कैफ़ी आज़मी की पंक्तियां मानो दिवंगत अभिनेता इरफान के लिए ही लिखी गई हों।

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई 
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर 
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई 

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी 
यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई 

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे 
बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई 

साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा 
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई 

हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना 
क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई 

अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के 
नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

लंदन में इलाज़ के दौरान फ़िल्म कलाकार इरफान खान का लिखा कैन्सर पर विजय के लिये लिखित जीवंत पत्र भी उनके जीवंत जीवन के लिए सदैव स्मरण किया जावेगा।
इरफान खान के जीवन का अंतिम रेकॉर्डेड ज़रूर सुनियेगा ।

जीवन्त पत्र लंदन में इलाज के दौरान, जब इरफ़ान जिनके सिरहाने की एक तरफ़ ज़िंदगी है और दूसरी तरफ़ अंधेरा, ने आत्मा की स्याही से यह ख़त लिखा है। उम्मीद की ओस। एक काव्यमय दर्शन। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है! यह ख़त इरफ़ान भाई ने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को भेजा गया था।]

कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं। क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है। अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था ... मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं। मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ’आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया... न न, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है...’ जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया...’ अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं। लहरों को क़ाबू करने की ग़लतफ़हमी लिये।

इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, ’आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं... मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता। मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं। मैं खड़ा होना चाहता हूं।’

ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था...

कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया। बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द? अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है। कुछ भी काम नहीं कर रहा है। न कोई सांत्वना और न कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आयी थी। दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।

मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है। बाहर का नज़ारा दिखता है। कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है। सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है। वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है, मेरे बचपन के ख़्वाबों का मक्का। उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ। मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं।

मैं दर्द की गिरफ्त में हूं।

और फिर एक दिन यह एहसास हुआ... जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे। न अस्पताल और न स्टेडियम। मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था। मेरे अस्पताल का वहां होना था। मन ने कहा, केवल अनिश्चितता ही निश्चित है।

इस एहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया। अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाए, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद, या फिर दो साल... चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया!

पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी ‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास।

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया। उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया। वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं।

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग... सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं... एक बड़ी शक्ति... तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।

अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है... मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है।

एहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो... जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

डॉ तेज प्रकाश व्यास, इंदौर, मप्र

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डॉ तेजप्रकाश पूर्णानन्द व्यास
बी 12 विस्तारा टाउनशिप
शेरेटन ग्रैंड पेलेस के सामने
एबी बाईपास ,इंदौर
(अमेरिकन हार्ट असोसिएशन प्लेनो टेक्सास अमेरिका में मॉनव हृदय सुरक्षा अध्ययन)
(दवाइयों रहित निःशुल्क चिकित्सा सलाहकार)
(से नि प्राचार्य , शासकीय राजा भोज स्नातकोत्तर महाविद्यालय धार)
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