लेखक
एक उदास हँसी किसी गरीब की जेब के चंद सिक्कों सी खनकी और सरवन ने कहा 'हओ न। तर माल धर दिया है... तुम न चट कर जइयो...'
वो गोदाम से सीमेंट की बोरियां उठाकर रखने लगा बाहर।
हरमेस कमीज़ उतार कर बनियान और घुटन्ना पहने सिर पर गमछा बाँधते हुए याद कर रहा था उस दिन का मजाक जब सरवन के मना करने पर भी उसने पोटली खोल कर देख ली थी...
सोचा था सच में कुछ अच्छा होगा। चार रोटी, प्याज़ और हरी मिर्च के साथ एक पन्नी में काग़ज़ सा था।
पढ़ने लगा था वो... किसी रधिया की चिट्ठी थी गाँव से। लिखा था, वो उचक्का दरयाव बापू को दो हजार देने और लगन की बात करता है रोज। तुम जल्दी आ जाओ वादे के पैसे लेकर।
चुनाई का गारा बनाते सरवन ने देख लिया था हरमेस को चिट्ठी पढ़ते.... कुछ नहीं कहा था। चुपचाप काम कर रहा था बस फावड़ा पूरी ताकत से प्रहार कर रहा था गिट्टी और रेत-सीमेंट पर।
हरमेस समझ गया था। नीचे गारा नहीं है। वही उचक्के दरयाव का सिर है.... वादे की रकम इकट्ठा नहीं कर सकने का गुस्सा, सरवन निकाल रहा है उसपर वार करके।
गारा तैयार हो गया था। हरमेस ने दो बीड़ी चेताईं और एक सरवन को देकर खुद ने भी गहरा कश लिया।
सरवन.... मेरे भाई! मैं जानू सब। हम दूर देस से आये लेकिन हैं तो एक जात के। हर मजदूर की एक रधिया भी रहे है। कोई थक गई रस्ता देख के और चुना गई कोई दीवार में ईंट बनके... कोई अभी बैठी है इस उम्मीद में के उसका मजदूर आयेगा और वो दोनों मिलकर बनायेंगे ताजमहल मोहब्बत का।
सरवन ने देखा हरमेस को और बोला, ये चिट्ठी उसी नींव का पत्थर है जिसे रखने के लिए मुझे दो हजार रुपये जमा करने थे मगर... देर हो गई थी। अब ये बस पत्थर है। मेरी रधिया दरयाव के ताजमहल की कब्र में सो गई है.... कित्ता रास्ता देखा होगा उसने मेरा.....
दोनों के मुँह से निकला धुआँ गड्ड-मड्ड होता ऊपर उठ रहा था। छूना चाह रहा था शिखर उस ऊँची इमारत का जिसकी नींव में न जाने कितने मजदूरों के सपने दफ्न हैं नींव का पत्थर बनकर।
शैलेश तिवारी
नींव का पत्थर
सरवन ने उस पोटली को दीवार से निकले सरिये पर टाँगा तो हरमेस ने टोका... "बड़े जतन से धर रये। भाभी ने कोऊ पकवान धर दिया है का...."एक उदास हँसी किसी गरीब की जेब के चंद सिक्कों सी खनकी और सरवन ने कहा 'हओ न। तर माल धर दिया है... तुम न चट कर जइयो...'
वो गोदाम से सीमेंट की बोरियां उठाकर रखने लगा बाहर।
हरमेस कमीज़ उतार कर बनियान और घुटन्ना पहने सिर पर गमछा बाँधते हुए याद कर रहा था उस दिन का मजाक जब सरवन के मना करने पर भी उसने पोटली खोल कर देख ली थी...
सोचा था सच में कुछ अच्छा होगा। चार रोटी, प्याज़ और हरी मिर्च के साथ एक पन्नी में काग़ज़ सा था।
पढ़ने लगा था वो... किसी रधिया की चिट्ठी थी गाँव से। लिखा था, वो उचक्का दरयाव बापू को दो हजार देने और लगन की बात करता है रोज। तुम जल्दी आ जाओ वादे के पैसे लेकर।
चुनाई का गारा बनाते सरवन ने देख लिया था हरमेस को चिट्ठी पढ़ते.... कुछ नहीं कहा था। चुपचाप काम कर रहा था बस फावड़ा पूरी ताकत से प्रहार कर रहा था गिट्टी और रेत-सीमेंट पर।
हरमेस समझ गया था। नीचे गारा नहीं है। वही उचक्के दरयाव का सिर है.... वादे की रकम इकट्ठा नहीं कर सकने का गुस्सा, सरवन निकाल रहा है उसपर वार करके।
गारा तैयार हो गया था। हरमेस ने दो बीड़ी चेताईं और एक सरवन को देकर खुद ने भी गहरा कश लिया।
सरवन.... मेरे भाई! मैं जानू सब। हम दूर देस से आये लेकिन हैं तो एक जात के। हर मजदूर की एक रधिया भी रहे है। कोई थक गई रस्ता देख के और चुना गई कोई दीवार में ईंट बनके... कोई अभी बैठी है इस उम्मीद में के उसका मजदूर आयेगा और वो दोनों मिलकर बनायेंगे ताजमहल मोहब्बत का।
सरवन ने देखा हरमेस को और बोला, ये चिट्ठी उसी नींव का पत्थर है जिसे रखने के लिए मुझे दो हजार रुपये जमा करने थे मगर... देर हो गई थी। अब ये बस पत्थर है। मेरी रधिया दरयाव के ताजमहल की कब्र में सो गई है.... कित्ता रास्ता देखा होगा उसने मेरा.....
दोनों के मुँह से निकला धुआँ गड्ड-मड्ड होता ऊपर उठ रहा था। छूना चाह रहा था शिखर उस ऊँची इमारत का जिसकी नींव में न जाने कितने मजदूरों के सपने दफ्न हैं नींव का पत्थर बनकर।
©मुकेश दुबे
---------------समीक्षा
आ जा तुझको... पुकारे मेरा प्यार....। इस गाने की याद ताजा करती है कहानी नींव का पत्थर....। जब नीलकमल फिल्म में... चित्रसेन के प्यार को.... दीवार में चुनवाया जा रहा था....। कथानक का सीन थोड़ा अलग है.... यहाँ राधिया को इंतजार है अपने प्यार सरवन का.....। मगर प्यार पर इस बार पहरा लगा है.... दो हजार वादे की रकम चुकाने का..। उस पर दरयाब भी अपनी चालें चल रधिया को अपना बनाना चाहता है....। पर मोहब्बत का ताज महल भी कभी... कभी मिलन की मिसाल बना है....। वो तो है ही बिछोह की निशानी...। श्रम मे पसीना बहाते.. श्रमिक को वैसे भी.. प्यार का सपना देखने का अधिकार क्या है...। असफल प्रेम में.. दरिया में डूब जाने का हक भी नहीं..। बस बीढ़ी के धूंये में हर फ़िक्र को... उड़ाने का हुनर होता है हर सरवन के पास... जो हरमेस के साथ... रोटी, प्याज और हरी मिर्च की तरह.. बाँट लेता है.. अपना दिल का दर्द....। उस प्यार का... जो दफन हो गया... वादे के रकम के मकबरे में....। कथानक की कहन.... हमेशा की तरह अनूठी... अद्भुत है...। इमारत भले ही ताजमहल की हो या कोई और.. नींव का पत्थर ही बुनियाद है उसकी...। श्रमिक दिवस पर याद दिलाती... श्रम बिन्दूओं को.. जो आधार हैं... विकास का... समृद्धि का.. ऊँची ऊँची अट्टालिकाओ के गगन छूने की कामयाबी भी... मेहनती की मेहनत की कहानी है...। बहुत सुंदर तरीके से... सब कुछ बयाँ कर दिया... कहानी में...। बधाई... मुकेश भाई....।शैलेश तिवारी


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