लघुकथा
लेखिका
मन का दीपक
देश में लाकडाउन होने के बाद जैसे तैसे गुजारा हो रहा था दिन भर की मजदूरी करने वाले हरिया का । चार लोगों का परिवार था । पति-पत्नी और दो बच्चे । कभी कोई तो कभी कोई मदद कर जाता कुछ राशन मिल जाते या कोई कुछ खाने को दे देता जिससे दो तीन का मुश्किल से गुजारा हो जाता । काम बन्द होने के कारण जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी उसके ।दोपहर का वक्त था सात साल का बेटा जगन घर के अन्दर से चहकता हुआ आया और बोला "बाबा दस रूपये दो न मोमबत्ती खरीदनी है " । हरिया को भी याद थी प्रधानमन्त्री जी की बात कि रविवार को दीपक या मोमबत्ती जलानी है ताकि इस विकट समय में भारत में एकता की रौशनी से पुरा आसमान जगमगा उठे । बेटे की बात से उसकी आखों में आंसू आ गये क्योंकि दीपक जलाने के लिए न घर में तेल था न ही बाती और मोमबत्ती खरीदने के लिए जेब में फूटी कौड़ी । पिता की खामोशी और आखों में आंसू देख जगन बोला " क्या हुआ बाबा आप रोने क्यों लगे " । तब हरिया ने कंधे पर रखे गमछे से अपने आंसू पोंछकर बेटे को गोद में बैठाते हुए प्यार से कहा " बेटा मोमबत्ती खरीदने के लिए हमारे पास पैसे नहीं है " , " बाबा काम पर नहीं जाते न बेटा इसलिए " । पिता की बातों से मायूस होता जगन बोला " तो हम मोमबत्ती या दीपक नहीं जलाएंगे बाबा " । बेटे को रुआंसा होता देख फिर से उसे दुलारता हरिया बोला " ऐसा नहीं बेटा हम जलाएंगे दिया जरूर जलाएंगे " और जो दिया हम जलाएंगे न उसकी रौशनी सीधे ईश्वर तक पहुंचेगी । चूंकि गरीबी और अभावों में पलने की वजह छोटी सी उम्र में ही कुछ बच्चे बड़े हो जाते है जिद तो करते ही नहीं । जगन भी उन्हीं बच्चों में था । जिद नहीं की उसने पर पिता की बातों से प्रश्न जरूर घुमरने लगे मन में तो हरिया ने अपने बाहों में उसे कसते हुए कहा "बेटा मैं , तुम , माँ और तुम्हारी छोटी बहन हम सब दीपक जलाएंगे" मगर अपने_अपने मन में और ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि जो भी संकट हमारे देश पर आया है न वो जल्दी हट जाए जिससे हमारे साथ साथ सभी मजदूरी करने वालों के घर का चूल्हा जल्द से जल्द जल पाये । फिर देखना दीपावली में हम सब मिलकर दीपक भी जलाएंगे और पटाखे भी । हरिया की इतनी बड़ी बात जगन के समझ आयी या नहीं वो नहीं जानता था पर पिता की बातों से जगन जरूर खुश हो गया था क्योंकि सचमुच का दीपक जलता तो उसने देखा था पर मन का दीपक जलते आज वो पहली बार देखेगा । वो बहुत बेसब्र हो गया था रात के नौ बजने का ताकि दीपक जला कर ईश्वर से प्रार्थना कर सके कि सब ठीक हो जाए और वो बाहर खेलने जा सके और तीनों वक्त का खाना खा सके ।
रूबी प्रसाद सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
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रूबी प्रसाद सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) की रहने वाली हैं। बागवानी करना,किताबें पढ़ना इनको पसंद है और समय अनुसार लेखन कार्य से साहित्य सेवा भी करती हैं। शतरंज और बैडमिंटन में राष्ट्रीय स्तर की चैम्पियन शिप पाने की उपलब्धियां हासिल कर चुकी हैं।
विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन, मोहनलाल जैन सम्मान से सम्मानित, लाल बहादुर शास्त्री सम्मान से सम्मानित एवं लेखन के लिए क्ई सम्मानों से सम्मानित । बीस से अधिक साझा संकलन में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है।
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संपादक
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समीक्षा
लॉक डाउन के ताज़ा हालात पर.... जब बाहर कोरोना और घर में भूख हो... तब किसी मजदूर के दर्द को शब्दों में... कहानी बनाकर ताना बाना बुन लेना...। ... ये कथा शिल्पी के शिल्प का कमाल है....। कथा उस काल खंड को जीती है... जब देश लॉक डाउन... की स्थिति को कोरोना संकट... के चलते झेल रहा है....। दीप जलाने के आव्हान.... पर गरीब मजदूर हरिया का बेटा जगन भी... दिया जलाने की बात कहता है...। घर के बुझे चूल्हे का जो अदृश्य.... दृश्य लेखिका के शब्द... दिखाते हैं.... कई पाठकों की आँखों की कोर को नम कर देता है तो.... किसी के मन में सरकारी निकम्मेपन को लेकर आक्रोश जाग उठता है.... जो बड़े बड़े वादे और दावे कर रही है...। . ... पेट के दहकते अंगारों... से बेखबर शासन और प्रशासन... की लापरवाही का सुलगता सवाल.... भी कथानक अनकहे रूप में छोड़ जाता है....। हालांकि कहानी को... आशावादी तरीके से लिखा गया है.... बाबजूद इसके उसमें तमाम अभावों का जिक्र भी है... और मजदूर की बेबसी का भी....। बच्चों के घर से बाहर न जाने का भी..। पूरा भोजन नहीं मिल पाने का भी....। लघु कथा में मजदूर परिवार की मुसीबतों का हिमालय लेखिका ने रचा दिया है... और उस पर दर्द का एवरेस्ट..... एक आह... को जगाने के लिए काफी है...। लेकिन लघु कथा के लिए... वाह भी कहलवा लेता है...। सकारात्मक पक्ष है कि.... मन का दीपक जलाकर... ईश्वर से प्रार्थना कर... सब कुछ ठीक कर देने की दुआ... मांगने की बातें..... एक हल्का व्यंग्य भी कर जाती है.... राम का देश है.... राम भरोसे ही... चल रहा है....। बहुत से हरिया अपनी बेकामी का बोझ ढो रहे हैं.... कई जगन का बचपन.... फाकों और अभावों में... मन का दीप जलाने को मजबूर है....। बहुत बढ़िया लेखन के लिए... रूबी जी बधाई...।
शैलेश तिवारी, संपादक


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