लेखिका

अंकुश

शाम का तांबई रंग, सुरमई होने से पहले ही नदी के किनारे बैठकर... पक्षियों के कलरव में प्रकृति का संगीत सुनाई देता। सं
गीत की इस लय पर मंद मंद चलती पवन मद्धिम स्वर में अपना गीत गाती। किसी कोने से मोर की आवाज डॉन फिल्म के गाने की याद ताजा कर देती  " अरे दीवानों..मुझे पहचानों." । श्रोता बनकर खड़े पेड़ों की कतार से इतर, किनारे पर बैठ कर सिया को नदी की चंचल धारा का बहते देखना, मन को आजाद पंछी की तरह अपनी मस्ती से जीना सिखाता लगता। सूरज का सोने जैसा प्रकाश जब नदी के पानी की धारा से अठखेलियाँ करता.. तब प्रकृति के मिलन की यह अनूठी घटना से नजरे हटाने को जी नहीं चाहता..। जब कभी शाम के समय सिया को फुर्सत होती वह नदी के किनारे आ जाती। प्रकृति की उन्मुक्तता उसे खूब भाती।लेकिन आज की शाम कुछ जुदा है। आज पंछियों का कलरव, हवा का गीत कुछ भी सुनाई नही दे रहे। शाम ढले, आज दीप नही जले। मन में उदासी का पतझड़ है, ख्यालों में चिंताओं का डेरा...। ये आलम बयान करने में भी नहीं आते कि किसी से कहकर कर उदासी मिटा लो। खुद की लड़ाई जब खुद से हो तो हार और जीत दोनो अपनी होती हैं। 
   वही उदास सिया बनास नदी के किनारे बैठी नदी के किनारे के ठहरे पानी में कंकर फेंक कर अपने अंदर के गुबार को हलका करने की कोशिश में जुटी है। हर कंकर के पानी के सतह से टकराते ही लहरों का गोल घेरा फैलने लगता। लहरों की गिनती करने की कवायद में कुछ भूलती...तो लहरों के एक दूसरे पर चढ़ने उतरने का नजारा फिर उसके नजरिये को बदल देता। गडमड होने लगते विचार...एक दूसरे को ओवर टेक करते से..। वह जिन कामों को दिल से करना चाहती उसके माता पिता  टोकाटाकी  कर देते। पंछी को पिंजरे में कैद किए जाने जैसी आदत थी उनकी। हमेशा एक न एक नई समझाइश...अब परेशानी पैदा करने लगी।  सिया पंछी की तरह आसमान के विस्तार को नापने के सपने देखती थी। .. माता पिता के संस्कारों  के उपदेश के चलते कहाँ रहा पाते थे सपने अपने....। जिन संस्कार की वकालत माँ बाप करते वह सिया को गुजरे जमाने की बेड़ियाँ लगती। वह बनास के पानी में मछलियों की आपस में की जाती होड़ा होडी को गौर से देखती। वह भी तो अपनी सहेलियों के साथ ऐसा ही करना चाहती। उन्हीं मछलियों की तरह किसी भी दिशा में तैरने की आज़ादी पाना चाहती थी। नदी के पानी के बहाव के साथ दूर तक बहना उसकी ख्वाहिश में शामिल है। लेकिन जो सोचा जाए वह हो कहाँ पाता है? ये ख्याल ज्यादा हावी हो जाता उस पर। वह भी तो इसी प्रकृति का निर्माण है। फिर उस पर इतनी बंदिशे क्यों..? खुद ही खुद को समझाती भी..प्रकृति ने समय के उस लम्हे को पाबंद कर रख होगा जो उसके सवाल का जवाब जरूर देगा। कुछ तसल्ली मिल जाती। मन फिर से सुरमई होती शाम के नजारे में बहलने लगता। नदी के बीच बहती धार को गौर से देखती।  यह भी तो अपने किनारों के बीच ही बहती है..। ज्यादा बारिश आने पर जब किनारे से बाहर होती है तो मानव के लिए बर्बादी की वजह बन जाती है। विचारों के प्रवाह को बिल्कुल सामने से आ रही नाव ने अपने में समेट लिया। लहरों की हलचल को बढ़ाती नाव किनारे की तरफ आ गई। नाव खे रहे मांझी  ने उस जरूरी सामान को बटोरा और  उतर कर नाव को बांधने लगा । 
    "बाबा! आप इस नाव को बांध क्यों रहे हैं?" सिया के मन से वही सवाल निकल पडा जो उसके अंदर चल भी रहा था। 
    "बिटिया! बांधूंगा नहीं तो नाव नदी के बहाव में बह कर दूर चली जाएगी और किसी चट्टान से टकरा कर टूट जाएगी। बिटिया! ज़िंदगी को सरल बनाने के लिए थोड़ा अंकुश भी जरूरी है।" मांझी ने मुस्कुरा कर कहा। मांझी की बातों ने सिया की उदासी के सवालो का जवाब भी दे दिया। मुस्कुराते हुए सिया ने प्रकृति को धन्यवाद दिया अपने सवाल का जवाब जल्दी दे देने के लिए..। प्रसन्न मन से कदम उठे घर की तरफ.. सोचते हुए संस्कार अच्छे हैं। 

अंकिता भार्गव

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परिचय 


 अंकिता भार्गव उच्च शिक्षित हैं और गज़ब की बात यह है कि लेखन को ही अपना कैरियर बनाने का सपना पूरा करने की ठान चुकी हैं। राजस्थान के कस्बे सगरिया जिला हनुमान गढ़ में रहने वाली अंकिता जी लघु कथा के साथ साथ कहानी, कविता और उपन्यास लिख चुकी हैं। शायरी की बारीकियों ने अभी आपको आकर्षित कर रखा है। एक उपन्यास "अनुगूँज" धारावाहिक के रूप में मेरठ के एक अखबार में प्रकाशित हो रहा है। 
एमपी मीडिया पॉइंट परिवार में आपका स्वागत है। 
संपादक
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समीक्षा


अंकिता भार्गव की कहानी.... अंकुश... वास्तव में दो पीढीयों के बीच की सोच का अंतर है...। जो हमेशा विद्यमान रहा भी है...। इस कथानक को पिरोने में लेखिका ने प्रकृति के उपमान बनाकर नायिका सिया के मनोभावों को सुंदर तरीके से चित्रित किया है..। मानव और प्रकृति के गुरु शिष्य जैसे रिश्ते को भी परिभाषित किया है कि प्रकृति से मानव लगातार सीखता रहता है। विचारो के उतार चढ़ाव में सही का फैसला करना हमेशा कठिन रहा है। वक्त आने पर ही रास्ता मिलता है.. विचारों की भँवर से बाहर निकलने का..। नायिका सिया भाग्यशाली रहती है कि नदी के किनारे को छोड़ने से पहले उसके सवाल का जवाब मांझी से मिल जाता है। यह कथानक का आखिरी दृश्य यह भी बताता है कि सीख या समाधान किसी के माध्यम से भी प्रकृति दिला देती है। जरूरत अपने को प्रकृति से सामंजस्य बनाए रखने की है। कथानक संस्कार के अंकुश से जीवन को सही मार्ग पर ले जाने की बात भी कहता है। साथ ही यह भी सिखाता है कि माँ बाप की बंदिशे चाहे हमें ठीक न लगे लेकिन होती हमारे हित की हैं। उनके निर्णय गलत हो सकते हैं लेकिन उनकी नियत अपनी संतान के लिए बहुत साफ होती है। 
शानदार कथानक... बधाई.. अंकिता भार्गव जी...।
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