आलेख ...मनीला फिलिपींस से... 



ओ महाकाल.... बचा ले प्रलय से इस धरा को


जब से होश संभाली स्त्री होने की वजह से घर  में ही हमारी पूरी दुनिया है , ऐसा वह अक्सर महसूस करती थी । आज कल तो स्त्री-पुरुष बूढ़े एवं बच्चे सभी की स्थिति एक सी हो गई है । 

लॉक डाउन हाँ यह शब्द जीवन में पहली बार सुनने को मिला  । एक साथ ढ़ेरों आश्चर्य भय आवेश एवं आवेग सब दिलोदिमाग में हलचल मचाने लगा ।

 क्या होगा कैसा होगा लॉक डाउन ! 

खास कर हम घरेलू महिलाओं के लिये । सोचने लगी , मन में विचार आया कि एक अकेली मेरी सोच और मेरे अनुभव से भला कितनी महिलायें इत्तेफाक रखेंगी ।

यह ख्याल आते ही अपने मुहल्ले एवं आसपास परिचित स्त्रियों से घरेलू कार्य निपटाने के बाद औरों से उनका अनुभव पूछने का मन बनाया ।

सबसे पहले अपनी कामवाली को पुरे महीने का पगार देकर घर पर ही रहने की नशीहत दे डाली ।

लॉक डाउन का पहला दिन -

दिनभर सबकी जरूरतों का लिस्ट बना कर  शॉपिंग मॉल वालों को फोन पर घरेलू सामानों की सूची भेज दी ।

फिर जरूरी दवाएं रोजमर्रा काम आनेवाले फल एवं सब्जियों की ओर ध्यान गया ।

हे प्रभू कोई बीमार नहीं पड़े इन दिनों । सोच कर ही पसीना आ गया । जैसे तैसे आसपड़ोस एवं जानपहचान वालों से नम्बर जूटा कर , फिर उन्हें काल कर इत्मीनान होना जरूरी लगा ।

इस उधेड़बुन में पहले दिन ही रसोई एवं दोपहर का भोजन बनाने में बिलंब हुआ ।

बच्चे भी भूख से परेशान माँ खाना जल्दी लगावें कह कर हल्ला मचाने लगे । 

घरेलू कार्य निपटाने के बाद थक कर  चूर हो गई । तभी पतिदेव बड़े प्यार से ताश की बाजी लगा कर खेलने को आमंत्रित किये ।

अरे ! यह कोई सपना है या सच ? 

जिंदगी में जबसे होश संभाला है ,इतने प्यार से कभी भी किसी ने हमारे दिल बहलाव के लिए सोचा ही नहीं ।

 लॉक डाउन एक नया अनुभव !  अगली सुबह समाचार देख कर दंग रह गई । ओह हमें तो सिर्फ अपने पति और बच्चों  का ख्याल रखना है । दिहाड़ी मजदूर की ओर हमारा ध्यान ही नहीं गया ।

सामान्य दिनों की अपेक्षा काम बहुत बढ़ गये थे ।  पतिदेव अब ऑफिस का काम घर से ही करने लगे थे । बच्चों की  कक्षा भी ज़ूम क्लासेज के द्वारा घर बैठे ही शुरू हो चुकी थी । 

एक ओर घर के काम बढ़ गये  सुरक्षा एवं स्वच्छता का ख्याल कर काम वाली को छुट्टी , लगभग सभी महिलाएं कर दी थी । 

दिन भर थक कर चूर होने के बाद एक उत्सुकता दिल ही  दिल में पाँव पसारती थी । 

जरा सी फुर्सत होने पर मित्रों को फोन कर उनके हालचाल पूछ कर पड़ोसी धर्म निभाने के बहाने एक दूसरे का सुख दुख एवं अनुभव साझा होने लगा ।

महानगरों की जिंदगी बहुत व्यस्त होती है यह अक्सर हम महिलायें स्त्री विमर्श के बहाने अनुभव साझा करते  थे ।

अज़ीब तनाव का माहौल घरेलू कार्य कभी खत्म नहीं होते थे वहीं दूसरी ओर प्रदूषण का घटता स्तर हमारे अंदर रोज नई उर्जा का संचार कर रहा है ।

यह बात जब हमने अपनी महिला मित्रों को बताई तो उन्होंने हामी भरी ।

 घरेलू कार्यों को निपटाने के बाद फोन पर हमारी चर्चाएं देश-विदेश सभी के हालात पर होने लगी  ।

अचानक आई विपदा  से गृहणियां खुद को संभाल नहीं पा रहीं थी वहीं दूसरी ओर कोरोना जाँच के सीमित संसाधन एवं  डॉक्टर नर्स एवं पुलिस कर्मियों के लिए भी चिंता बनी रहती है।

कभी कभी सरकार एवं सरकारी तंत्र के कार्यकलापों पर क्रोधित भी हो उठते थे। 

कोरोना से मरने वालों को बचाने के उपाय पर कम और व्यर्थ की चर्चाएं अधिक होती है समाचारों में लेकिन मरनेवालों को बतौर मुआवजा मोटी राशि दी जायेगी ।

ऐसे अल्फाज सुनकर एक चिंगारी सी सुलग उठती है। 

हम महिलायें वक्त के साथ अधिक संवेदनशील होने लगी । सबसे बड़ी समस्या घरों में कैद होने वाले बुजुर्गों एवं बच्चों की थी । 

हर दस मिनट में माँ हम बोर हो रहे हैं , बहु हमारे घुटनों का दर्द बढ़ रहा है । दिन भर बिस्तर पर या सोफे पर बैठे बैठे । 

कोरोना से बचाव के लिये सामाजिक दूरी सबसे जरूरी था । 

लॉक डाउन का आठवां दिन :--

सबसे पहली किल्लत पैसे होने के बावजूद बच्चों को भी दूध मुहैया कराना मुश्किल होने लगा 

बच्चे बिना दूध के कैसे रहेंगे । कभी सोचा ही नहीं था । क्या दें बच्चों को यह एक दूसरे से महिलाओं पूछने लगी । 

हार कर खिचड़ी, गीले मीठे चावल  बच्चों को देना जरूरी लगा ।

नज़र बंद होना एवं आभाव में जीना किसे कहते हैं पहली बार जाना ।

धीरे धीरे   पूरा परिवार बदले हालात को समझने लगे थे । बच्चे छोटे छोटे बर्तन साफ करने लगे । पुरूषों ने भी घर के साफ सफाई में हाथ बंटाने लगे।

एक सुखद परिवर्तन ! एक दूसरे के स्वास्थ्य एवं श्रम का मोल पूरा परिवार अब समझने लगा था ।

अखबार आने बंद हो गये इसके बावजूद मोबाइल पर एवं टेलीविजन पल देश और दुनिया की खबरें लगातार मिल रही थीं । 

कहीं से सड़कों पर शाँति पाकर मयूर का नृत्य देखने को मिला । कहीं सुदूर इलाके में पर्यावरण स्वच्छ होने से अब चाँदनी की छटा निराली लगती थी ।तारों भरे आकाश में पहली बार इतने सघन तारे नज़र आ रहे थे। 

पक्षियों का कलरव एक ओर जहाँ अधिक बढ़ने लगा वहीं दुसरी ओर कामवालियों का जीवन में कितना महत्व है यह पूरी तरह महसूस होने लगा ।

बीच बीच में कामवालियों के खाते में आर्थिक सहयोग राशि भेज कर अज़ीब सुकून मिलता था ।

वहीं अन्य राष्ट्रीय सेवाकर्मियों जैसे  डॉक्टर नर्स पुलिसकर्मियों एवं दैनिक सेवा देख कर ऐसा लगता है मानों कोरोना रूपी राक्षस से लड़ने के लिये एवं हमें सुरक्षित रखने के लिये देवदूत बन कर स्वयं ईश्वर धरती पर आ गए हैं ।

बार बार सरकारी हिदायतें आती रही हम सभी महिलाएं पूर्ण मुस्तैदी से कोरोना को अपने घर से समाज से एवं समूचे विश्व से भगाने के लिये एक सीमा प्रहरी की भाँति सफाई एवं स्वच्छता ख्याल रखना अपनी दैनिक दिनचर्या में शामिल कर अपनी भूमिका निभाने को कृतसंकल्पित होने लगे। 

बस ईश्वर से इतनी ही प्रार्थना है कि "हे ईश्वर विपदा आपने दी है या मानवीय भूल है ,हमें नहीं पता बस योद्धा बन कर इस छुआछूत रुपी कोरोना महामारी से लड़ने की शक्ति दो ।

हमें पता है जब जब धरती पर बाधाएं आई हैं स्त्रियों की भुमिका सदैव सबल बनी हैं । 

नारी तू नारायणी 

देख धरा पर हाहाकार

धीरज धर धरा संभाल

बचा ले प्रलय से धरा को

ओ महाकाल ।

आरती रॉय . मनीला .फिलीपींस.

--------------

परिचय


आरती राय  कृष्णा पूरी बरहेता रोड ,लहेरियासराय जेल के पास दरभंगा बिहार की निवासी है। वर्तमान में अप्रवासी भारतीय के रूप में मनीला, फिलिपींस में हैं। गृहणी होने के साथ साहित्य सृजन का समय निकाल लेती हैं। लघुकथा, कहानियाँ ,कवितायें आदि विधा में लेखन करती हैं।  
 लघुत्तम महत्तम...लघुकथा संकलन .नयी सदी की लघुकथाएं..एवं कारवां संकलन आदि प्रकाशित हो चुके हैं एवं  इन्नर नामक पुस्तक प्रकाशाधीन है। अनेक साहित्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
Share To:

Post A Comment: