राजेश शर्मा 


राजधानी भोपाल के राजनितिक गलियारों से छन कर निकल रही रिपोर्टें के मुताबिक ग्वालियर-चंबल संभाग के उपचुनावों को कांग्रेस ने गंभीरता से लेना शुरु कर दिया है क्योंकि 24-25 सीटों पर होने वाले यह उपचुनाव  उसके लिए दूसरी बार सत्ता का मार्ग खोलने वाले साबित हो सकते हैं।
पिछले चुनाव जब हुए थे तबतक ज्योतिरादित्य सिंधिया की छवि अपराजय नेता के रुप मे थी लेकिन अब वह उन्हीं के गढ़ मे अपने ही शिष्य से चुनाव हारने का पहला स्वाद चख चुके है। सेनापति खुद हारकर बैठा हो तो सेना के मनोबल को समझा जा सकता है।
जहां तक मोदी फेक्टर का सवाल है तो पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों मे स्पष्ट कर दिया कि मोदी का खूबसूरत चेहरा लोकसभा के चुनाव का बाजार लूट सकता है लेकिन विधान सभा का नहीं।
 इधर मध्यप्रदेश में इस वक्त कोरोना संकट के साथ यहां के दोनों प्रमुख दलों के सिर पर मंडराते राजनीति संकट को भी अच्छी तरह से महसूस किया जा सकता है। इस बात से हर कोई वाकिफ है, कि आने वाले पांच महीनों में प्रदेश की 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, जिसे लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी दल कांग्रेस के पास अपनी अपनी चुनौती है, इसमें अगर कांग्रेस की चुनौती के बारे में बात करें, तो वह एक ऐसे चेहरे की तलाश के तौर पर सामने आती है, जिसे आगे रखकर वह जनता के बीच जा सके, और जनता उस पर भरोसा करे। ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा भाजपा का दामन थामने के बाद अब कांग्रेस को मालवा के साथ ग्वालियर और चंबल अंचल में एक मजबूत चेहरे की दरकार है, जो वोटरों के आकर्षण के साथ कांग्रेस को एकसूत्र में बांधने वाला हो।

 2018 में सिंधिया ने किया था करिश्मा 
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता, कि 2018 में प्रदेश की सत्ता में वापसी का अहम रोल ग्वालियर चंबल क्षेत्र का था। राजनीतिक जानकारों का मानना है, कि यहां की जनता ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को देखकर अपना वोट दिया था। अब जबकि इस क्षेत्र में एक बार फिर से कई सीटों पर उपचुनाव होने हैं, ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे चेहरे को सामने लाना है, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया की कमी को पूरा कर सके। हालांकि ग्वालियर चंबल में फिलहाल ऐसा कोई भी चेहरा नजर नहीं आ रहा, जो सिंधिया की जगह को भर सके, लेकिन चूंकी इस वक्त कांग्रेस के साथ कथित तौर पर सहानुभूति की लहर भी है, ऐसे में माना जा रहा है, कि सिंधिया की कमी को पूरा करने के लिए उसे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
दिग्विजय लेंगे जिम्मेदारी या गोविंद सिंह पर भरोसा ? 
इस वक्त अगर ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेस के किसी बड़े नेता के बारे में जिक्र करें, तो सिर्फ दिग्विजय सिंह ही एकमात्र चेहरे के तौर पर उभरकर सामने आते हैं। लेकिन शायद ही वह इस क्षेत्र की जिम्मेदारी लेकर अपनी राष्ट्रीय छवि को प्रभावित करने का जोखिम लें, उधर जनाधार के मामले में भी शायद ही वो सिंधिया जैसा कमाल कर सकें। इसके बाद दूसरे विकल्प के तौर पर लहार विधायक और खाटी कांग्रेसी डॉ. गोविंद का नाम सामने आता है। लेकिन गोविंद सिंह के सामने पूरे अंचल में जनाधार हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। चूंकी गोविंद सिंह को दिग्विजय सिंह के काफी नजदीक माना जाता है, ऐसे में उनके सामने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को साधकर रखना कोई चुनौती नहीं होगी। ऐसे में अब देखना यह होगा, कि क्या गोविंद सिंह ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेस का चेहरा बनकर सामने आएंगे ?
हालांकि आजादी के बाद से ही मध्यप्रदेश मे उपचुनाव होते रहे हैं। लेकिन वर्ष 2020 मे होने वाले उपचुनावों तासीर और तस्वीर ही अलग दिखाई देती है। कांग्रेस बगैर हौ हल्ला किए चुनाव जंग मे उतरती है तो उसे नुकसान की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। राजनितिज्ञ बताते हैं कि वोटर समझदार हो चुका है। उसे सब राजनीतिक हथकंडों की खबर घर बैठे ही मिलती रहती है। प्रत्याशियों के नाम सामने आते ही दूसरे दिन वह मन बना चुका होता कि मुझे वोट किसे देना है। दारु,सिक्के,वायदे सहित अन्य प्रलोभन का अब कोई असर देखने को नहीं मिलता। विकास की राह तो वह खुद अपनी गीली आंखों से रोज ही निहारता रहता है।

प्रजातांत्रिक परिवर्तन के इस दौर मे कोई क्षेत्र किसी का अब कोई गढ़ नहीं रहा। सिंधिया ,राहुल गांधी की पराजय इसबात का सबूत है। कांग्रेस का निर्विवाद व्यक्तित्व सुरेश पचौरी हमेशा चुनावों मे मूंह की खाता रहे और उनकी अनुशंसा पर जो चुनाव लड़े वह जीत का वरण कर भोपाल पहुंचते रहे यह भी एक उदाहरण है।
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फेक्ट फाइल
मध्य प्रदेश में सरकार को लेकर लगातार घमासन जारी है. प्रदेश में इस साल होने वाले 24 उप चुनाव में ग्वालियर-चंबल अंचल में दो तिहाई सीटें हैं. यहां भाजपा और कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की रणनीति पर काम कर रही हैं. इस क्षेत्र में अब तक कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया का वर्चस्व था लेकिन आज वे भाजपा में शामिल हो गए हैं तो उन्हें टक्कर देने के लिए कांग्रेस अब वहां जल्द से जल्द किसी क्षेत्रीय नेता को स्थापित करने की रणनीति बना रही है. कांग्रेस के पास अभी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का एक पद है, जिसे ग्वालियर-चंबल संभाग के नेता को सौंपकर उपचुनाव में उतर सकती है.

आपको बता दें की मध्य प्रदेश विधानसभा के 24 उप चुनाव में विधायकी से त्यागपत्र देकर कांग्रेस छोड़ने वाले 15 पूर्व विधायकों के क्षेत्र ग्वालियर चंबल संभाग के हैं।

वहीं, जौरा के विधायक बनवारीलाल शर्मा तथा आगर मालवा के मनोहर ऊंटवाल के निधन से रिक्त हुई दो सीटों में जौरा सीट भी ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की है. इस तरह ग्वालियर-चंबल संभाग में 16 सीटों पर उप चुनाव होना है जो कोरोना संकट के बाद इस साल के अंत तक होने की संभावना है.

वहीं उपचुनावों में दो तिहाई ग्वालियर-चंबल की हैं जिन पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का ज्यादा ध्यान देना है. कांग्रेस का विशेष तौर पर वहां ध्यान है क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने से क्षेत्र में पार्टी के लिए चेहरे की समस्या खड़ी हो गई है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि ग्वालियर-चंबल संभाग में सिंधिया की टक्कर में नेता को खड़ा करने के लिए पार्टी के पास अभी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी है जिस पर किसी क्षेत्रीय नेता को बैठाकर स्थापित किया जा सकता है।
कांग्रेस जानती है कि जिस शैली को अपनाकर भाजपा ने उसे सत्तामुक्त किया। अब उसी की वही शैली, उसपर इस उपचुनावों मे आजमाते हुए फिर एकबार कांग्रेस सत्तायुक्त होना चाहती है।
लेकिन लाकडाउन,कोरोना से निपटने के बाद यह जरुर है कि तमाम सियासती को सिर्फ़ आगामी विधानसभा के उपचुनाव ही दिखाई देने वाले हैं।इनके लबों की मुस्कान और टपकते आंसूओं का नजारा देखने के लिए लगभग पूरा सूबा भी अब तैयारी मे नजर आने लगा है।
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