लेखिका
“ हाँ..हाँ...सब ठीक है |” चेहरे पर फीकी हँसी ओढते हुए मैं पति से बोली |
किसे बताऊँ मन की बात ! आज मेरी पहली वटसावित्री है...मायके से एक कौआ भी नहीं पूछने आया !
बार-बार बाथरूम जाकर आँसुओं से भींगी आँखों पर छींटा देती और सामने लगे शीशे को अपने दिल की बात बताती , “ बचपन सौतेली माँ के साये में बीता, असली माँ का स्वाद भी नहीं जाना | घर में आई नई माँ के मोहपाश में पिता का पलड़ा हमेशा उधर ही भारी दिखा | ”
खैर! आनन-फानन में मेरी शादी करके पिता का बोझ हल्का हो गया ! भगवान का लाख-लाख शुक्र , मेरे पति भले पोलियो से ग्रसित हैं, पर मन से अपाहिज नहीं !
“ लक्ष्मी......|”
“ अपना नाम सुनते ही मेरी तन्द्रा टूटी, घबराकर मैं बाथरूम से चिल्लाई, “जी.....अभी आई |”
“ ये लो, पहनो । आज तुम्हारा पहला वटसावित्री है |” व्हील चेयर पर बैठे पति, चुनरी प्रींट की साड़ी के साथ सिंदूरी लाल लाख की चूड़ी मेरे हाथ में पकड़ाते हुए आगे बढ़ गये |
झट से तैयार होकर मैंने फूल की साजी (डलिया) लेते हुए पूजा करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, पति व्हील चेयर के सहारे मेरे करीब आ पहुँचे | चेयर को एक हाथ से थामे.....वह किसी तरह उठकर मेरे माथे को चूमते हुए बोले, “ सच, तू लक्ष्मी-सी लगती है |”
पहली बार उनको आज इस तरह डगमगाकर खड़ा होते देख, मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था | हड़बड़ाहट में मेरे साजी के सारे फूल उनके चरणों पर बिखर गये |
मैं झुकते हुए आहिस्ता से बोली, “आप नारायण हो गये |”
संपादक
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यह लघु कथा भी है तो उसी अवसर की... लेकिन आधुनिक जीवन शैली.... में रची बसी परंपराओं की खुशबू से महकती....। साथ ही उन रिश्तों को नये अर्थों में परिभाषित करती..... जो भारतीय संस्कृति का आधार है.... जो कहलाता है दाम्पत्य....। जिसमें पति पत्नी का रिश्ता विश्वास और प्रेम पर टिका होता है....। उसी रिश्ते की नव व्याख्या है.. इस कहानी में.....। साथ ही साथ ये कथानक समाज की मानसिक विकलांगता को भी उजागर करता है.....। जब पोलियो ग्रस्त पति.... व्हील चेयर पर आकर... अपनी पत्नी को चुनरी प्रिंट की साडी... देता है.... और कोशिश के बाद उठ कर अपनी पत्नी का माथा चूम लेता है.... यह कहते हुए कि... तुम साक्षात लक्ष्मी लगती हो.....। यह वाक्य उन मानसिक विकलांगो पर प्रहार है.... जो पत्नी को लेकर तरह तरह के जोक्स बनाते हैं....। जैसे पत्नी न होकर वह कोई ज़ुल्मी हो.....। और अंत में..... पत्नी के हाथ की साजी से फूलो का पति के चरणों में समर्पित.... हो जाना उसको नारायण बना देता है.....। उन्हीं पुष्पों की तरह दाम्पत्य जीवन एक दूसरे के प्रति समर्पण पर आधारित है.....। कहानी का यही संदेश आज के दरकते दाम्पत्य जीवन की प्राथमिकता भी है और आवश्यकता भी...। सहज, सरल, सरस, भाषा में भी संदेश पूर्ण कथानक का ताना बाना बुना जा सकता है... यह लेखिका मिन्नी मिश्रा जी की कलम ने साबित कर दिया.....। बहुत बहुत बधाई....।
शैलेश तिवारी, संपादक
लक्ष्मी- नारायण
‘क्या हुआ ? तबियत तो ठीक है ?आज सबेरे से तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों दिख रहा है !?”“ हाँ..हाँ...सब ठीक है |” चेहरे पर फीकी हँसी ओढते हुए मैं पति से बोली |
किसे बताऊँ मन की बात ! आज मेरी पहली वटसावित्री है...मायके से एक कौआ भी नहीं पूछने आया !
बार-बार बाथरूम जाकर आँसुओं से भींगी आँखों पर छींटा देती और सामने लगे शीशे को अपने दिल की बात बताती , “ बचपन सौतेली माँ के साये में बीता, असली माँ का स्वाद भी नहीं जाना | घर में आई नई माँ के मोहपाश में पिता का पलड़ा हमेशा उधर ही भारी दिखा | ”
खैर! आनन-फानन में मेरी शादी करके पिता का बोझ हल्का हो गया ! भगवान का लाख-लाख शुक्र , मेरे पति भले पोलियो से ग्रसित हैं, पर मन से अपाहिज नहीं !
“ लक्ष्मी......|”
“ अपना नाम सुनते ही मेरी तन्द्रा टूटी, घबराकर मैं बाथरूम से चिल्लाई, “जी.....अभी आई |”
“ ये लो, पहनो । आज तुम्हारा पहला वटसावित्री है |” व्हील चेयर पर बैठे पति, चुनरी प्रींट की साड़ी के साथ सिंदूरी लाल लाख की चूड़ी मेरे हाथ में पकड़ाते हुए आगे बढ़ गये |
झट से तैयार होकर मैंने फूल की साजी (डलिया) लेते हुए पूजा करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, पति व्हील चेयर के सहारे मेरे करीब आ पहुँचे | चेयर को एक हाथ से थामे.....वह किसी तरह उठकर मेरे माथे को चूमते हुए बोले, “ सच, तू लक्ष्मी-सी लगती है |”
पहली बार उनको आज इस तरह डगमगाकर खड़ा होते देख, मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था | हड़बड़ाहट में मेरे साजी के सारे फूल उनके चरणों पर बिखर गये |
मैं झुकते हुए आहिस्ता से बोली, “आप नारायण हो गये |”
मिन्नी मिश्रा, पटना (बिहार)
-------------------------परिचय
श्रीमति मिन्नी मिश्रा , गृहणी हैं। पटना बिहार में निवास करती हैं। साहित्य प्रेम आपसे स्वतंत्र लेखन कराता रहता है। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहतीहैं। साहित्य के क्षेत्र में आपको लघुकथा श्री सम्मान, कलमकार मंच से ,शीर्षक साहित्य से , भाषा सहोदरी से , नये पल्लव से और प्रजातंत्र का स्तम्भ, स्टोरी मिरर, साहित्य विचार प्रतियोगिता आदि से सम्मानित किया जा चुका है | इसके अतिरिक्त अनेक विशेष सम्मान आपको प्राप्त हुए हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।संपादक
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समीक्षा
लक्ष्मी नारायण.... शीर्षक वाली लघु कथा एक दम से पौराणिक काल की याद दिलाती है। है भी पौराणिक संदर्भ वाली..... जो सत्यवान और सावित्री से जुड़ी कथा के व्रत के अवसर की है.....। वट सावित्री व्रत... जिसमें अपने पति के प्राण यमराज के पाश से छुड़ा लाने की कथा है.....।यह लघु कथा भी है तो उसी अवसर की... लेकिन आधुनिक जीवन शैली.... में रची बसी परंपराओं की खुशबू से महकती....। साथ ही उन रिश्तों को नये अर्थों में परिभाषित करती..... जो भारतीय संस्कृति का आधार है.... जो कहलाता है दाम्पत्य....। जिसमें पति पत्नी का रिश्ता विश्वास और प्रेम पर टिका होता है....। उसी रिश्ते की नव व्याख्या है.. इस कहानी में.....। साथ ही साथ ये कथानक समाज की मानसिक विकलांगता को भी उजागर करता है.....। जब पोलियो ग्रस्त पति.... व्हील चेयर पर आकर... अपनी पत्नी को चुनरी प्रिंट की साडी... देता है.... और कोशिश के बाद उठ कर अपनी पत्नी का माथा चूम लेता है.... यह कहते हुए कि... तुम साक्षात लक्ष्मी लगती हो.....। यह वाक्य उन मानसिक विकलांगो पर प्रहार है.... जो पत्नी को लेकर तरह तरह के जोक्स बनाते हैं....। जैसे पत्नी न होकर वह कोई ज़ुल्मी हो.....। और अंत में..... पत्नी के हाथ की साजी से फूलो का पति के चरणों में समर्पित.... हो जाना उसको नारायण बना देता है.....। उन्हीं पुष्पों की तरह दाम्पत्य जीवन एक दूसरे के प्रति समर्पण पर आधारित है.....। कहानी का यही संदेश आज के दरकते दाम्पत्य जीवन की प्राथमिकता भी है और आवश्यकता भी...। सहज, सरल, सरस, भाषा में भी संदेश पूर्ण कथानक का ताना बाना बुना जा सकता है... यह लेखिका मिन्नी मिश्रा जी की कलम ने साबित कर दिया.....। बहुत बहुत बधाई....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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