लेखिका
घुट घुट कर जीती औरत...
हम औरतें कितनी स्वार्थी होती है न । सुनने में बड़ा अजीब लगेगा क्योंकि औरतें तो त्याग की मूरत होती है जो अपने आप को भुलाकर, ज्अपना सर्वस्व लुटा देती है पर कभी-कभी मुझे लगता है हम बहुत स्वार्थी होते है क्योंकि हम जब किसी से प्यार करते है तो उन्हें एहसास भी नहीं होने देते और उन्हें दुआओं में शामिल कर लेते है मगर हम किसी को ये हक नहीं देते कि कोई हमसे प्यार करें । यहां तक कि हम जिनसे प्यार करते है उन्हें हमेशा अपने आस पास देखना चाहते है हम चाहते है भले वो हमसे बात न करें , हमें नजरअंदाज करें , हमें चालाक कहें या फिर हमसे नफरत करें पर वो हमारे सामने रहे हमेशा हमेशा पर अपने स्वार्थ में हम ये भूल जाते है कि हम जाने अंजाने में उन्हें तकलीफ दे रहे है उनकी राह के पत्थर बन रहे है । हमें ऐसा नहीं करना चाहिए "है न" ! कोई हमसे जबरदस्ती जुड़ा रहे कितना गलत है न । उन्हें आजाद कर देना चाहिए ताकि वो अपने जीवन को जी सके अपने हिस्से का आसमान नाप सके या फिर अपनी जड़े कही और फैला सके किसी और के साथ अपने जीवन की प्रेम की शुरुआत कर सके । जब हम छोटे होते है तो पापा से कहते है " पापा मैं शादी ही नहीं करूंगी , आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगी " मगर जो समाज के बनाये नियम है उनके आगे हमें झुकना पड़ता है पर हम आजाद कहा हो पाते है मायके की सुनहरी यादों से जहाँ हम तितली की तरह उड़ा करते थे । शादी के पहले जब किसी के लिए दिल पहली बार धड़कता है तब भी हम खुलकर कहाँ कह पाते है कि "चलो सब छोड़ मैं तुम्हारी हो जाऊंगी" पिता के मान , सम्मान के लिए प्रेमी को ठुकरा देने में हमें क्षण भर नहीं लगता है । ये भी तो स्वार्थ ही है इससे अच्छा है प्रेम ही न करो किसी का दिल दुखाने का हक ईश्वर ने नहीं दिया है आपको पर बोलना कितना आसान है न प्रेम न करो पर प्रेम तो हो जाता है ये कोई शादी थोड़ी है जो जबरदस्ती समाज और पगड़ी का हवाला देकर करवा दी जाये पर हम प्रेम को त्याग देते है बिना ये सोचे वो शख्स जिसने हमसे प्यार किया है उसे कितनी तकलीफ होगी हमसे बिछड़ कर । हर दर्द सह हम किसी और के हो जाते है और हर फर्ज निभाते है क्योंकि हम बचपन से यही तो देखते आये है कि शादी ही हर स्त्री का जीवन है इसके बिना वो अधुरी है । कुछ दिन पहले किसी ने मुझसे पुछा " मैं किसी से प्यार करती हूँ पर अलग जाति के कारण हमारी शादी नहीं हो सकती क्या मैं अपना सब कुछ उसे सौंप सकती हूँ ताकि उसके साथ बिताये वो लम्हें पुरे जीवन तक सहेज कर रख सकूँ । क्या ये गलत तो नहीं " । मैंने कहा " हाँ गलत है बहुत गलत है पति के अलावा किसी के भी साथ शारीरिक संबंध बनाना गलत है और जहां तक रही शादी के पहले सेक्स की तो ये तो बहुत ज्यादा ही गलत है क्योंकि समाज हमें इसकी इजाजत नहीं देता । अरे समाज तो हम औरतों को अपना जीवन ही जीने की इजाजत नहीं देता तो फिर सेक्स तो बहुत दूर की बात है । किसी से प्यार भर कर लेने से स्त्री की परवरिश खराब हो जाती है उसका चरित्र मैला हो जाता है क्ई सवाल खड़े हो जाते है तुमने तो सेक्स के लिए सोच लिया । दुसरी तरफ अगर हम इन सब बातों को एक तरफ रख दे तो क्या प्रेम गलत होता है ? क्या कभी भी प्रेम गलत हो सकता है ? नहीं प्रेम कभी गलत हो ही नहीं सकता न ही प्रेम में किया गया स्पर्श गलत हो सकता है । प्रेम तो वो पवित्र एहसास है जो हमें हमारे होने का एहसास दिलाता है जीवन में जो हमारे खालीपन है उसको भर देता है जिससे जो सांसे हम घुट घुट कर ले रहे थे वो खुलकर लेने लगते है । हर जगह प्रेमी को नहीं प्रेम को महसूस करने लगते है तो भला प्रेम कैसे गलत हुआ ? प्रेम तो हममें एक नयी उर्जा को भर देता है प्रेम तो पुजा है । पर एक औरत के लिए ये गलत नहीं पाप है सबसे बड़ा पाप क्योंकि प्रेम को पूजना हमारा धर्म है प्रेम करना पाप क्योंकि समाज हम औरतों को पति के अलावा किसी के भी बारें में सोचने की इजाजत नहीं देता । वहीं दुसरी तरफ पुरूष चाहे कितनी ही जगह मुंह मारे , कोठों पर जाये, पत्नी के रहते दुसरी स्त्री से संबंध बनाये पर वो चरित्र वान ही रहता है क्योंकि वो पुरूष है । एक sorry सब ठीक हो जाता है क्योंकि औरतों को उनके पास माफ करने के अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं होता क्योंकि वो एक तो आर्थिक रूप से उनपर निर्भर रहती है दुसरा वो अपनी गृहस्थी खराब नहीं करना चाहती यहाँ पर भी हम औरतें स्वार्थी ही तो बन जाती है । अगर स्वार्थी न बने तो सब कुछ उजर जायेगा । पता नहीं क्यों चरित्र का प्रमाण पत्र औरतों से ही क्यों मांगा जाता है पुरूष कितनी भी औरतों से संबंध बना ले पर वो पवित्र ही कैसे रह लेता है वो कभी चरित्र हीन क्यों नहीं कहलाता । शादी के बाद क्या बिना मर्जी के सेक्स करना क्या गलत नहीं है । आंकड़ो को देखें तो शादी के बाद पति के द्वारा जबरदस्ती के कितने ही केसेज दर्ज है पर वो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आते है । शादी के बाद शारिरीक उत्पीड़न गलत नहीं होता क्योंकि ये समाज का दोगलापन है एक ऐसा दोगलापन जिसे लोग खुली आखों से देखकर भी नजरअंदाज कर देते है । अभी बहुतों के दिमाग में आयेगा नहीं ऐसा तो नहीं होता । निम्न स्तर की औरतें रोज ही पति से पिटती है जबरदस्ती भी होती है उनके साथ वो चीखती है विरोध करती है पर शादी को तोड़ नहीं पाती क्योंकि उनमें असुरक्षा की भावना होती है कि घर में गीदड़ है बाहर तो किड़े मकौड़े है जो उनके शरीर को नोंच कर खा जाएंगे इसलिए वो सब सहती लेती है । उच्च स्तर में औरतों की स्थिति तो और भी बदतर होती है वो चीख नहीं पाती है स्टेटस और संस्कार की बेड़ियो से जो जकड़ी होती है वो रोती नहीं पर छटपटाती बहुत है और अपनी इस छटपटाहट को मेकअप से उन सब घावों को जरूर छुपा लेती है । कहने का मतलब हम औरतें स्वार्थी यूं ही नहीं हो जाती हम प्रेम को छुपाने लगती है नफरत की दिवार प्रेमी के आगे खड़े कर देती है पर उस दिवार को कभी तोड़ नहीं पाती कभी बदनामी का डर कभी समाज का डर हमें संकुचित बना देता है और हम अपनी भावनाओं को छुपाना सीख लेते है । कोर्ट के आदेश के अनुसार स्त्री अपने पुर्व प्रेमी से मिल सकती है वो सब स्वतंत्रता उसे दी गयी है जो पुरुष को समाज ने दिये है पर सवाल यहाँ ये है कि क्या लोग स्त्री की इस स्वतंत्रता को पचा पाएंगे ? क्या वो देंगे इजाजत स्त्री को अपने मन के साथी के साथ शारीरिक संबंध बनाने की ? नहीं हमारा ये खोखला समाज कभी भी इस बात की इजाजत नहीं देगा स्त्री को इस बात की । हां अब स्त्रीयां खुलकर अपने मन की कर रही है पर ऐसी स्त्रीयां अब भी अपवाद ही है अपने मन का जीवन जीने के लिए अब भी उन्हें बहुत संघर्ष करने पर रहे है और आगे भी करने ही पड़ेगे । हम स्त्रियाँ सच में बहुत स्वार्थी होती है तभी तो हम अपने आप को तो इजाजत दे देती है कि हम बिना किसी को एहसास कराएं उनसे प्रेम करें , अंतिम सांस तक उन्हें पुजे पर हम कभी भी किसी को भी अपने आप को प्यार करने की इजाजत नहीं देते अपने आप को छुने नहीं देते क्योकिं हमने अपने आसपास एक बड़ी सी दिवार खींच रखी है जिसे पार करने की इजाजत हम खुद को कभी नहीं देते क्योकिं हम औरतें है मगर हमें ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि अगर हम किसी को खुद को प्यार करने का हक नहीं देते तो हमें भी कोई हक नहीं कि हम किसी को बांध कर रखें । बच्चे जब छोटे होते है तो हम सोचते है बड़े होकर वो हमसे दूर चले जाएंगे पर कितना भी वक्त को पकड़ने की कोशिश करो वो तो उड़ ही जाता है सबको अपने हिस्से के आसमान को छुने का हक है । यही स्वार्थ असुरक्षा की भी भावना को भर देता है जिससे हमें बहुत कुछ छूटता महसूस होता है हाँ बहुत तकलीफ होती है पर यकीन मानिये कुछ छूटता नहीं है जो आपका है वो तो आपका ही रहेगा न । फिर बांधने का या मोह में उलझे रहने का कोई औचित्य ही नहीं बनता है । सच है हम स्त्रियों का मन बहुत कोमल होता है और उस वक्त बहुत तकलीफ होती है जब हम उस शख्स को नहीं देख पाते , बात नहीं कर पाते जिससे हम प्रेम करते है पर ये तकलीफ और भी तकलीफदेह हो जाती है जब सामने वाला हमारी वजह से अपने पंख समेटने लगता है । अगर हम औरतें खुलकर जी नहीं कर सकती तो किसी को अपने साथ घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर करने का भी हक नहीं है ।


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