लेखिका
*माँ*
सारे दिन खटपट करतींलस्त- पस्त हो
जब झुँझला जातीं
तब...
तुम कहतीं-एक दिन
ऐसे ही मर जाउँगी
कभी कहतीं -
देखना मर कर भी
एक बार तो उठ जाउँगी
कि चलो-
समेटते चलें
हम इस कान सुनते
तुम्हारा झींकना
और उस कान निकाल देते
क्योंकि-
हम अच्छी तरह जानते थे
माँ भी कभी मरती हैं !
कितने सच थे हम
आज...
जब अपनी बेटी के पीछे
किटकिट करती
घर- गृहस्थी झींकती हूँ
तो कहीं-
मन के किसी कोने में छिपी
आँचल में मुँह दबा
तुम धीमे-धीमे
हंसती हो माँ...!!!
—उषा किरण
-----------------परिचय
डॉ० उषा किरण मेरठ उत्तर प्रदेश निवासी हैं।एसोसिएट प्रॉफेसर ,ललित कला विभाग, मेरठ कॉलेज ,मेरठ में कार्यरत हैं।।
-कविता- संग्रह "ताना- बाना” तथा साँझा- संग्रह के रुप में चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में कहानी,कविता, आलेख प्रकाशित होते रहे हैं।
आप साहित्य के साथ साथ चित्रकला में भी भी पारंगत हैं। अनेक शहरों में आयोजित चित्र प्रदर्शनियों में आपके चित्रों का सफलता पूर्वक प्रदर्शन हो चुका है। आपको साहित्य सहित अन्य क्षेत्रों में भी पुरस्कार और सम्मान प्राप्त होते रहे हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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