लेखिका
नमस्कार,
लेकिन क्या इस अभिवादन के योग्य हैं आप ? पर फिर भी नमस्कार कर रही हूं क्योंकि मैं तो अपनी सभ्यता नहीं भूल सकती। मगर क्या सम्बोधन दूँ आपको ? समझ ही नही पा रही! उम्र के हिसाब से और रिश्ते के अनुसार आपको आदरणीय लिखना चाहिए मगर आपका व्यवहार मुझे आपको आदरणीय लिखने से रोक रहा है।
आपको पत्र लिखूंगी ऐसा कभी नही सोचा था लेकिन कल जब आपकी पोती के बारे में पता लगा तो रहा नहीं गया। भगवान का शुक्र है कि कोई अनहोनी नहीं हुई।
लेकिन इस घटना के बाद आपको कुछ याद आया?माना, आपकी बढ़ती उम्र है मगर अभी इतने भी बुजुर्ग नहीं हुए आप कि स्मरण क्षमता कमजोर हो गई हो।
याद है , उस शाम एक छह साल की बच्ची को दुलारते हुए आपने अपनी गोद मे बैठा लिया था। पितृतुल्य स्नेह समझ इसमें किसी को भी आपत्तिजनक नही लगा था लेकिन कुछ ही देर में छह साल की बच्ची नासमझी की उम्र से थोड़ी समझदार बनकर बहाने से गोदी से उतर कर दूसरे कमरे में चली गई थी। आप पीछे से बुलाते रह गए थे।
उस दिन के बाद से आपके आने और अपने पास बुलाकर बैठाने से ही वह सहमने लगी थी । एकांत का लाभ उठाते आपके हाथ उसे जुगुप्सा से भर देते थे।
कितनी ही बार चाह कर भी किसी को कुछ नही कह सकी क्योकि उसे उस उम्र में पता ही नही था कि उसे गलत क्या लगता है ! बस , लगता है इतना पता था।
एक दिन मम्मी ने किसी से काम से उसे आपके घर भेजा। वह नहीं जाना चाहती थी लेकिन जाना पड़ा। दुर्भाग्य से उस दिन आपके घर में कोई नहीं था। उसने वापिस जाने के लिए पैर उठाये जिन्हें रोक लिया गया। और फिर.... फिर न जाने कैसे हिम्मत जुटा कर ,आंखों से बहते आँसुओं के साथ उसने एक थप्पड़ मारते हुए सवाल किया था आपसे, " आपकी बेटी के साथ भी आप ऐसे ही करते हैं" ?
जबाब की प्रतीक्षा किये बिना ही भाग गई थी वह। दहशत से भरी उखड़ती साँसों को आज तक संभालती वह सालों तक उस सवाल का जबाब हर उस इंसान से पूछती रही जिसमें भी आपकी परछाई दिखी।
कल की घटना के बाद आपकी पोती को दिलासा देते, समझाते हुए , उस अपराधी को कोसते हुए कभी आईने पर नजर जाती होगी आपकी ! तब ...?"
शुभकामनाओ के साथ-
नाम जानकर क्या कीजियेगा
विगत तीन वर्षों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। लेखिका और कवियत्री के रूप में आप एक ख्यातनाम हस्ताक्षर हैं। विभिन्न साहित्यिक सम्मानों से आप सम्मानित हैं। शीर्षक साहित्य परिषद की उपसचिव हैं और परिषद की गतिविधियों को नियमित संचालित करते हुए युवा प्रतिभाओं को आगे लाने में आप महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह सफलतापूर्वक कर रही हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
---------------
..... पत्र लेखन शैली में लिखे गए कथानक... थप्पड़ की यह गूँज... आईने से सुनाई देती रही... उस वयोवृद्ध पशुता के भाव से भरे आदमी को... जो समाज में आज भी समुचित आदर का ही पात्र है... कई लोगों के आई कॉन है.....लेकिन ऐसे वृद्ध . .. वृद्धता की श्वेत धवल व्यक्तित्व की कालिख है.. घोर अंधेरी रात की कालिमा की तरह....। लेखिका ने समाज में व्याप्त.... काम वासना के बढ़ते प्रभाव से दूर आयु वय... को कथानक का केंद्र बनाया है... जो चिंतनीय है कि.. जिन के साये में नवांकुर अंगड़ाई लेते हैं... पल्लवित, पुष्पित और फलित होते हैं...। जिनका होना घर में देवताओं का वास हमारी संस्कृति में माना जाता है....। कुछ दिग्भ्रमित वृद्ध की वजह से.... पूरा आयु समूह संदेह की नजरों में आ जाए... यह सामाजिक अभिशाप होगा...। कथानक का ताना बाना... विलुप्ती की कगार पर खड़ी पत्र लेखन शैली में... बातचीत की तरह है...। इस वजह से विषयांतर कहीं भी नहीं होता....। गतिमान रहते हुए... अपनी बात कहता जाता है....। अंत में जो बोओगे.. सो कटोगे.... के भाव के साथ समाप्त होता है...। वैसे लेखिका की कल्पनाशीलता इसमें पूरी की पूरी... अपनी बात आसानी से कह जाती है....।
उद्देश्यपूर्ण, संदेश पूर्ण और आगाह करते कथानक की बहुत बहुत बधाई... मेघा राठी जी.....।
शैलेश तिवारी, संपादक
थप्पड़
नमस्कार,
लेकिन क्या इस अभिवादन के योग्य हैं आप ? पर फिर भी नमस्कार कर रही हूं क्योंकि मैं तो अपनी सभ्यता नहीं भूल सकती। मगर क्या सम्बोधन दूँ आपको ? समझ ही नही पा रही! उम्र के हिसाब से और रिश्ते के अनुसार आपको आदरणीय लिखना चाहिए मगर आपका व्यवहार मुझे आपको आदरणीय लिखने से रोक रहा है।
आपको पत्र लिखूंगी ऐसा कभी नही सोचा था लेकिन कल जब आपकी पोती के बारे में पता लगा तो रहा नहीं गया। भगवान का शुक्र है कि कोई अनहोनी नहीं हुई।
लेकिन इस घटना के बाद आपको कुछ याद आया?माना, आपकी बढ़ती उम्र है मगर अभी इतने भी बुजुर्ग नहीं हुए आप कि स्मरण क्षमता कमजोर हो गई हो।
याद है , उस शाम एक छह साल की बच्ची को दुलारते हुए आपने अपनी गोद मे बैठा लिया था। पितृतुल्य स्नेह समझ इसमें किसी को भी आपत्तिजनक नही लगा था लेकिन कुछ ही देर में छह साल की बच्ची नासमझी की उम्र से थोड़ी समझदार बनकर बहाने से गोदी से उतर कर दूसरे कमरे में चली गई थी। आप पीछे से बुलाते रह गए थे।
उस दिन के बाद से आपके आने और अपने पास बुलाकर बैठाने से ही वह सहमने लगी थी । एकांत का लाभ उठाते आपके हाथ उसे जुगुप्सा से भर देते थे।
कितनी ही बार चाह कर भी किसी को कुछ नही कह सकी क्योकि उसे उस उम्र में पता ही नही था कि उसे गलत क्या लगता है ! बस , लगता है इतना पता था।
एक दिन मम्मी ने किसी से काम से उसे आपके घर भेजा। वह नहीं जाना चाहती थी लेकिन जाना पड़ा। दुर्भाग्य से उस दिन आपके घर में कोई नहीं था। उसने वापिस जाने के लिए पैर उठाये जिन्हें रोक लिया गया। और फिर.... फिर न जाने कैसे हिम्मत जुटा कर ,आंखों से बहते आँसुओं के साथ उसने एक थप्पड़ मारते हुए सवाल किया था आपसे, " आपकी बेटी के साथ भी आप ऐसे ही करते हैं" ?
जबाब की प्रतीक्षा किये बिना ही भाग गई थी वह। दहशत से भरी उखड़ती साँसों को आज तक संभालती वह सालों तक उस सवाल का जबाब हर उस इंसान से पूछती रही जिसमें भी आपकी परछाई दिखी।
कल की घटना के बाद आपकी पोती को दिलासा देते, समझाते हुए , उस अपराधी को कोसते हुए कभी आईने पर नजर जाती होगी आपकी ! तब ...?"
शुभकामनाओ के साथ-
नाम जानकर क्या कीजियेगा
मेघा राठी, भोपाल
-----------------------परिचय
मेघा राठी देश के दिल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली हैं।विगत तीन वर्षों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। लेखिका और कवियत्री के रूप में आप एक ख्यातनाम हस्ताक्षर हैं। विभिन्न साहित्यिक सम्मानों से आप सम्मानित हैं। शीर्षक साहित्य परिषद की उपसचिव हैं और परिषद की गतिविधियों को नियमित संचालित करते हुए युवा प्रतिभाओं को आगे लाने में आप महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह सफलतापूर्वक कर रही हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
---------------
समीक्षा
चटा....क.......!!!!! ये उस थप्पड़ की गूँज है... जो पड़ा तो एक बार है.... लेकिन गूँज खत्म हो ही नहीं रही..... गूंजती ही जा रही है.... प्रतिध्वनियाँ लौट लौट कर आ रही हैं....।..... पत्र लेखन शैली में लिखे गए कथानक... थप्पड़ की यह गूँज... आईने से सुनाई देती रही... उस वयोवृद्ध पशुता के भाव से भरे आदमी को... जो समाज में आज भी समुचित आदर का ही पात्र है... कई लोगों के आई कॉन है.....लेकिन ऐसे वृद्ध . .. वृद्धता की श्वेत धवल व्यक्तित्व की कालिख है.. घोर अंधेरी रात की कालिमा की तरह....। लेखिका ने समाज में व्याप्त.... काम वासना के बढ़ते प्रभाव से दूर आयु वय... को कथानक का केंद्र बनाया है... जो चिंतनीय है कि.. जिन के साये में नवांकुर अंगड़ाई लेते हैं... पल्लवित, पुष्पित और फलित होते हैं...। जिनका होना घर में देवताओं का वास हमारी संस्कृति में माना जाता है....। कुछ दिग्भ्रमित वृद्ध की वजह से.... पूरा आयु समूह संदेह की नजरों में आ जाए... यह सामाजिक अभिशाप होगा...। कथानक का ताना बाना... विलुप्ती की कगार पर खड़ी पत्र लेखन शैली में... बातचीत की तरह है...। इस वजह से विषयांतर कहीं भी नहीं होता....। गतिमान रहते हुए... अपनी बात कहता जाता है....। अंत में जो बोओगे.. सो कटोगे.... के भाव के साथ समाप्त होता है...। वैसे लेखिका की कल्पनाशीलता इसमें पूरी की पूरी... अपनी बात आसानी से कह जाती है....।
उद्देश्यपूर्ण, संदेश पूर्ण और आगाह करते कथानक की बहुत बहुत बधाई... मेघा राठी जी.....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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