बेबस मजदूर.... जश्न में सरकार
चिलचिलाती धूप.... सूटकेस घसीटती माँ.... उस पर सोता बच्चा.... पपड़ाये होंठ... पानी की आस में.... पैरों में छाले..... पेट की और सूरज की आग से तपते.... ये मजदूर घर पहुंचने की चाह में.... निकल पड़े पैदल सड़क की लंबाई छोटी करने.....। हुक्मरानों को याद आई तो ट्रेन चला दी... एक मई से......। उनमें भी गज़ब संचालन ने अजब कारनामा कर दिया.... चालीस ट्रेन रास्ता भटक गई..... उस रेलवे की जो संसार की श्रेष्ठ व्यवस्थाओं मे शुमार है..... रेल मंत्री जी मानने को तैयार नहीं....। गंतव्य तक देर से पहुंची ट्रेनों में.... लदे मजदूरों के लियें तो पर्याप्त भोजन.... न प्यास भर पानी..... नतीजा अस्सी मजदूरों ने जा गँवा दी.....। इनकी भी नियति विचित्र है.... सड़क पर चले तो भारी वाहन रौंद जाता है.... रेल मार्ग पर चले तो ट्रेन कुचल जाती है.... ट्रेन में सवार हों तो अव्यवस्था जान ले लेती है.....। जहाँ रहे वहाँ भूख मार डाले.... या कोरोना प्राण हर ले......। जाये तो जाये कहाँ..... बता ए दिल.... सरकार बड़ी संग दिल.....।
रेल मंत्री ट्रेन में सवार मजदूरों की मौत को भी स्वीकार करने को तैयार नही...... भला हो आर पी एफ का जिसने नौ मई से 27 मई के बीच ट्रेन में सवार मजदूरों की मौत की आंकड़े सार्वजनिक कर दिए.....। यह मजदूर आर्थिक बदहाली की वजह से उस देश में.... दम तोड़ते हैं... जिस देश के प्रधान सेवक की विदेश यात्राओं पर करोड़ों का खर्च जनता ने वहन किया है.....। रेल मंत्री दावा करते रहे ट्रेन तैयार हैं... प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए.... राज्य सरकारें मांग करती रही... जरूरत के मुताबिक ट्रेन उपलब्ध कराने के लिए.....। पीयूष गोयल जी गैर भाजपाई राज्य सरकारों के नुक्स निकालने में व्यस्त रहे... बजाए अपनी जिम्मेदारी निभाने के....। ये उस मंत्री मंडल के सदस्य हैं जिसे देश को आत्म निर्भरता के रास्ते ले जाना है....। शरीर में आत्मा तो रहने दो मंत्री जी.... तभी आत्म निर्भर बना पाओगे...?
जिस देश के करोडो मजदूर बेबसी की जिंदगी जी रहे हों... देश कोरोना के संकट से दो चार हाथ कर रहा हो.... और सत्ता पर आसीन पार्टी जश्न में डूब रही है..... मोदी सरकार 2.0 के एक साल पूरे होने की खुशी में.... छः साल की उपलब्धियां गिना रही है.....। दस करोड़ परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित किया जा रहा है.....। करोडो मजदूर की बेबसी में फंसी जिंदगी.... बचाने की तुलना में जश्न मनाना..... सरकार की प्राथमिकता बन जाता है......। रसातल का रास्ता पकड़ी हुई अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाना सरकार की प्राथमिकता से दूर है क्या..? पीएम एक पत्र में तीस बिंदुओं का उल्लेख करते हैं.... लेकिन बेबस और बदहाल मजदूर उसमे उचित जगह नहीं प्राप्त करता....। देश का नागरिक देश में ही दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है.... और सरकार जश्न मनाने में मशगूल है....। जब विपक्ष में थे तो कहते थे देश को सोने की चिड़िया बनाएंगे...... सत्ता में आये तो भारत को विश्व गुरु बनाने की ठानी.... अब देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए.... बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लुभाने के लिए.... आपकी सरकारें श्रमिक कानूनों को शिथिल कर रही हैं.....। उनके शोषण करने का खुला आमंत्रण दे रही हैं.....। और आप उपलब्धियां गिना रहे हैं......। हुजूर कुछ तो संवेदनशील बन जाइये.... मजदूरों पर रहम खाईये.....। आप उपलब्धियां न भी गिनाएं..... देश की जनता के ह्रदय में सब कुछ अंकित है....। या यह जश्न उनका भ्रम बनाये रखने की कोई चाल है.... जो आप की सरकार पर आँख बंद कर के यकीन करते हैं....।.... और आपको डर सताने लगा हो कि हकीकत जानकर... ये आपसे दूरी न बना ले.....। लेकिन साहेब... अभी समय नागरिकों के आँसू पोंछने का है.... जश्न मनाने का तो कतई नहीं......। समय से देर में ही सही.... जागिये तो सरकार...?


Post A Comment: