लेखक 

मैं लाशें फूंकता हूँ 

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मेरे दुःख में विसर्ग नहीं है,  
मेरे घर की औरतें बिना 
पछाड़ खाये गिरा करती हैं 

मैं लाशें फूंकता हूँ 
जैसे 
जलती लाश की ऊष्मा 
से जीवन तपता है, 
अधजली लाशों का 
वसा फटता है 
जैसे वेदना से 
ह्रदय गर्हित है 

विरह में आँखें रोती हैं 
सुहागन के शव के गहने जलते हैं 

मैं लाशें फूंकता हूँ 
लेकिन उस तरह नहीं 
जैसे फूंकीं है 
तुमने 
दंगों में बस्तियां 
झोंकी हैं 
तुमने ईंट के भट्ठों 
में फुलिया और गोधन 
की ज़िन्दगियाँ 

मैं लाशें फूंकता हूँ 
किन्तु मेरी एक जाति है 
जैसे 
ऊना में चमड़ा खींचने वालों की 
और इस देश में 
नाली, गटर में उतरने वालों की 

समय के घूमते चक्र में 
क्या कुछ नहीं बदला 
राजशाही से लोकशाही 
बर्बरता से सभ्यता 
मगर लाशों को फूंकते 
ये हाँथ नहीं बदले 
ना इनकी जाति 
ना मुस्तकबिल 

मात्र घाट के जलते शव 
हैं, 
पार्श्व में सन्नाटा 
और जीवन मृग तृष्णा 

मैं लाशें फूंकता हूँ 
मेरे दुःख में विसर्ग नहीं है |


----- मनीष कुमार यादव

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परिचय 

मनीष कुमार यादव इलाहबाद (प्रयागराज)उत्तर प्रदेश के निवासी हैं।  कक्षा 12वीं के विद्यार्थी हैं और मेडिकल परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। छोटी उम्र में साहित्य की बड़ी सेवा कर रहे हैं। 
इन्होंने एक किताब भी लिखी है   
 "The True Story Of India" जो प्रकाशनार्थ है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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