लेखिका 

दाग़ अच्छे हैं !!

ज़िन्दगी में कई बार कुछ फैसले अपने बच्चों की भलाई के लिए लेने पड़ते हैं।लोगों का क्या है , वो तो कहेंगे ही कि "तुम्हें स्ट्रॉन्ग बनना चाहिए था।बच्चों के साथ जब तक सख्ती से पेश न आओ तो वो सही नहीं होंगे।न ही आगे बढ़ेंगे।"पर अगर आपको लगे कि इस पल मेरे बच्चों को मेरी आवश्यकता है तो दुनिया की सारी नसीहतें परे फैंक देनी चाहिए।मैं कई बार बच्चों के लिए फैसले ले पाई जो मेरी नज़र में सही थे।एक दो बार कशमकश के चलते पीछे भी हटी अपने नज़रिए से तो कुछ समय बाद एहसास हुआ कि नहीं ..दिल ने जो गवाही पहले दी थी न उस पर ही कायम रहना सही था।
 कई परिवारों में घर के मुखिया पिता हो या पति बच्चों के लिए जो फैसला ले लेते हैं उस पर सभी चलने लगते हैं।लेकिन जब बच्चों की तरफ़ से कोई कमी ,असफलता दिखने लगती है तो वही मुखिया अपने फैसलों को भूल कर बाकी परिवार पर उस नाकामयाबी का ठीकरा फोड़ना आरम्भ कर देते हैं कहते हुए कि "मै तो पहले ही कहता था कि ये ऐसा करेगा या करेगी " । यह बात मैंने कई घरों में देखी सुनी।ऐसे में कलह की शुरुआत हो जाती है।
जब मेरी बेटी आठवीं कक्षा में थी तब उसे मैथ्स विषय मे बहुत डर लगने लगा था।टीचर जैसे ही कक्षा में आती उसे डर से पेट दर्द शुरू हो जाता ।वो मेरे पास रोती तो मैं उसे पहले ही अगले चैप्टर की तैयारी करवा देती ताकि उसे कोई परेशानी न हो।पर उसका पेट दर्द कम न हुआ।टीचर से मिली ,उसे बताया लेकिन उसने खास तवज़्ज़ो न दिया।दर्द बढ़ा तो डॉक्टर के पास ले गई यह सोचकर कि कुछ और प्रॉब्लम न हो।पर सभी टेस्ट नॉर्मल आये।अब तो पक्का हो गया कि दर्द डर से पैदा हो रहा है।तो एक दिन प्रिंसिपल सर के पास गई और कहा कि अगर टीचर ऐसे ही बर्ताव रखेगी तो मेरी बच्ची बीमार हो जाएगी।पर बड़े बड़े नामी स्कूलों में तो आपको मालूम ही है कि क्या एक्शंस लेते हैं। उन्होंने दिलासा दिया और साथ ही नसीहत भी कि "बच्चों को मेहनत तो करनी ही होगी। अब टीचर किसी एक बच्चे पर तो ध्यान नहीं दे सकती न।"
फाइनल एग्जाम में केवल 4 महीने बाकी तो बस बिटिया को प्यार से समझाया ,कन्विंस किया कि तुम बस इस बार पासिंग मार्क्स भी ले लोगी तो चलेगा।कोई कुछ नही कहेगा।बाकी सब सब्जेक्ट्स में तो तुम बढ़िया हो न तो बस वी विल मैनेज।बिटिया का थोड़ा डर हटा और इस प्यार से वो थोड़ा सम्भली।जब आठवीं का परिणाम आया तो उसने वाकई अच्छे पासिंग मार्क्स ले लिए ।100 में से 59 शायद।मुझे एतराज़ नहीं था पर  उस साल जिन बच्चों के भी 65 से कम नम्बर आये तो स्कूल वालों ने उन बच्चों के पेरेंट्स को बुला कर क्लास रिपीट करने के लिए कहा ताकि नौंवी और दसवीं के हिसाब से उनका बेस बने।
तब मैंने अपनी बिटिया के हक में एक फैसला लिया।मैंने स्कूल बदलने का निर्णय लिया क्योंकि अगर क्लास रिपीट करवाती तो बच्चे में हीनभावना का पनपना लाज़मी था।वह भी पूरे दो साल !पूरे दो साल वह उसी दर्द से फिर गुज़रती।जबकि इस वक़्त अच्छे नम्बरों में पास होकर उसके अंदर एक आत्मविश्वास आ चुका था ।पतिदेव ने मना किया कि अब दो सालों के लिए स्कूल बदलने का कोई औचित्य नहीं।लेकिन मैंने जो फैसला लिया, उसके साथ और भी कुछ पैरेंट्स ने यही किया।हालांकि मुझे इसके लिए बोर्ड भी बदलना पड़ा।पर बात यहां एक साल बचाने की बजाए अपनी बेटी के डर और दर्द को खत्म करने की थी।बात यहाँ उसके अंदर हीन भावना और उससे उपजने वाले अवसाद से बचाने की थी।उसके आत्मविश्वास को कायम रखने की थी।जब दूसरे स्कूल में दो साल पढ़ी तो कभी पेट दर्द की शिकायत तो क्या होनी थी अलबत्ता मैथ्स में भी बढ़िया नम्बर आने लगे।
सार यही है कि अपने बच्चों को साकारत्मक माहौल देना बेहद आवश्यक है।अगर मेरे अनुरोध पर टीचर ज़रा सा भी प्यार से पेश आती तो शायद उसे वो डर दर्द बनकर न सताता।मुझे उस वक़्त जो सही लगा मैंने किया ।मुझे उस पर प्रैशर डालकर अस्सी या नब्बे प्रतिशत नम्बरों की दरकार नहीं थी ।बस मुझे उसे अवसाद से बचाना था।मैं आज भी कई बार कुछ ऐसी बातों के लिए बच्चो के हक में खड़ी होती हूँ बेशक कई बार मुझे लगे कि प्रेक्टिकली बात ज़ायज़ नहीं पर प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में कई बार बच्चों की ढाल बनकर खड़ा रहना पड़ता है।
जब लोगों की नकारात्मक बातें सुनो न तब वो सर्फ़ एक्सेल वाली एड याद आती है क्रिकेट ग्राउंड वाली .."हार को हराने में अगर दाग़ लग जाएं तो दाग़ अच्छे हैं"। 
आपका क्या ख़्याल है ?


रश्मि तारिका, सूरत, गुजरात

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परिचय 

रश्मि तारिका मूलतः पंजाब का प्रतिनिधित्व करती हैं। आजकल गुजरात के सूरत शहर में रहकर साहित्य से जुड़ी रहती हैं। कहानी संग्रह कॉफी कैफे प्रकाशित हो चुका हैं आजकल एक बायोग्राफी पर  काम कर रही हैं। समाज के सम सामयिक मुद्दों पर आपकी लेखनी बेहतर चलती रहती है। उन्होंने एमपी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी कहानी "वो दूसरा पत्र" प्रेषित की है। 
आपका स्वागत और आभार... 
संपादक
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