लेखिका
अधूरी न रहे ख्वाहिश...
बेतुकी सी मेरी ख्वाइशें
अक्सर मचलने लगी हैं बावरी सी..
तुम्हे लिखूं एक खत.. बहुत लंबा खत
खत के जवाब का करूँ बेसब्र सा इंतज़ार..
और जवाबी खत आंखों में लिए तुम आ जाओ...
तुम्हारे लिए चाय बनाऊं
चाय उफन के दो कप की एक कप रह जाए
उस एक को तुम्हारे संग एक नीले कप में जी लूँ...
खाने में नमक ज्यादा कर दूँ ..
ताकि तुम कहो..तुम्हे मेरे ब्लड प्रेशर की चिंता नहीं क्या?
तुमसे शिकायत सुनना अधिकार लगता है ..
तुम्हारे संग सैर पे जाऊँ ब्राउन ड्रेस में
और तुम कहो..white या black नहीं पहन सकती थी?
तुम अपनी पसंद बताते हुए अच्छे लगते हो...
तुम्हारे सजदे में झुका मेरा सर हो
तुम झिलमिलाते सितारे मेरी मांग में भर दो
तुम्हारी कहलाना अच्छा लगता है...
सत्यनारायण की कथा हो
तुम्हारे बाएं अंग विराजूँ मैं..
फिर कोई कभी न पूछे तुम मेरे हो कौन...
जब कायनात में हिसाब चल रहा हो मेरे कर्मों का
मेरा गुनाह और सबाब दोनों में एक तेरा ही नाम हो..
ताकि फिर कोई ख्वाइश अधूरी ही न बचे..
....रूपल जौहरी, दिल्ली
-----------------------परिचय
रूपल जोहरी, नई दिल्ली निवासी हैं।
bioresurge आयुर्वेद कंपनी में कार्यरत हैं।
लेखन में रुचि है और साहित्य सेवा करती हैं। आप के जी साहित्य की पूर्व संपादक रही हैं।
तुमने कहा था...नामक काव्य संग्रह प्रकाशित होने के साथ साथ अहसास की दहलीज पर, कश्ती में चांद, एक लम्हा ज़िंदगी, रूह की आवाज़, खनक आखर की ..महकते लफ्ज़ आदि साझा संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।
आपको अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। एम पी मीडिया पॉइंट के "साहित्य का सोपान" में आपका स्वागत है।


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