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सर्दी पूरे जोर-शोर से पहाड़ों पर उतर आई थी। इन दिनों लम्बी पूँछ वाले
नीलकण्ठ पक्षी न जाने कहाँ से आ जाते और सेब की नंगी टहनियों पर बैठकर
इधर से उधर फुदकते रहते। बाग में जहाँ कहीं कीड़े दिखाई देते उनको चट्ट कर
जाना ही इनका काम होता है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदते-उड़ते इनकी
लहराती लम्बी नीली पूँछ बड़ी भली लग रही थी। इस समय यह महानुभाव
कीड़े-मकोड़े खाकर पेड़ों की टहनियों पर बैठकर आराम फरमा रहे थे।
सेब के बागीचे में सर्दियों के काम पूरे जोर-शोर से हो रहे थे। खेतों की
घास काट कर सुखाई जा चुकी थी। मल्होत्रा जी सोच रहे थे कि सेब के वृक्षों
पर से फसल टूटने के साथ ही पत्ते गिरने शुरू हो जाते हैं और नवम्बर तक एक
भी पत्ता कहीं दिखाई नहीं देता, इसीलिए सारे फलदार पेड़ सूखी लकड़ियों-से
खड़े हैं।
दो माली पेड़ों पर चढ़े हुए सूखी-टूटी टहनियों की छंटाई कर रहे थे। सेब
तोड़ने के कारण टूटी और सूखी टहनियाँ काटकर निकाली जा रही थीं ताकि आने
वाले मौसम में अच्छी फसल ली जा सके। बहुत बड़ा था बाग़ मल्होत्रा जी का। हर
साल, कई दिन तक चलने वाली इस छंटाई में मल्होत्रा जी खुद भी पेड़ों पर
चढ़कर उनकी आकृति को सुन्दर बनाने के लिए कई तरह से छंटाई किया करते थे,
परन्तु इस बार उनका काम में मन ही नहीं लग रहा था। थोड़ी देर छंटाई करने
के बाद वह पेड़ पर से नीचे उतर आए और सोमा से चाय बनाने के लिए कहा।
सोमा ने चाय बनाकर मालियों को दे दी थी और फिर बरामदे में पड़ी तिपाई
खींचकर चाय मल्होत्रा जी के सामने रख दी। बिना कुछ बोले मल्होत्रा जी ने
चाय उठाकर पी ली। पति की मनोदशा को समझते हुए सोमा ने भी इस समय कुछ कहना
ठीक नहीं समझा और चाय के खाली बर्तन लेकर अन्दर चली गई।
सोमा के भीतर चले जाने के बाद मल्होत्रा जी फिर से सोचने के लिए
स्वतंत्र थे। वह चुपचाप गुमसुम से बरामदे में रखी लकड़ी की बेंच पर बैठे
सोच रहे थे कि आखिर चूक कहाँ हुई। सब कुछ तो सोच-समझकर और नाप-तोलकर किया
गया था। लोगों के दिलों का कोई थोह-ठिकाना नहीं लगता। लोग कहते कुछ और
हैं और करते कुछ और हैं।
.........................
लगभग तीस साल पहले स्वर्णलाल मल्होत्रा चाँदनी चौक दिल्ली के यूको बैंक
से, पदोन्नति पा कर सीधे इस छोटे से गाँव गौरा में आ गए थे। उनकी प्रमोशन
के साथ पिछड़े क्षेत्र की शर्त पहले ही जुड़ गई थी। बैंक की शाख़ा नई खुली
थी और कोई इस दूर दराज के गाँव में जाने को तैयार ही नहीं था, पर
मल्होत्रा जी की नई-नई नौकरी और नई-नई शादी, उत्साह ही उत्साह था। सोमा
तो उनकी हर हाँ में हाँ मिलाने वाली थी सो कारवाँ इस गाँव में आ उतरा।
अपने मिलनसार स्वभाव के कारण दोनों पति-पत्नी बहुत जल्द गाँव का अंग बन
गए, रही सोमा? तो, उसे तो वैसे भी प्रकृति से बहुत लगाव था, उसे इस गाँव
में आकर मुँह माँगी मुराद मिल गई थी। शहर से, क्योंकि और कोई अधिकारी
इतनी दूर के गाँव में आना नहीं चाहता था और स्वर्णलाल ने स्वयं अपने
स्थानांतरण की कोई पहल नहीं की इसलिए वह गाँव के वातवावरण में ही रच-बस
गए। गाँव के कुछ अच्छे परिवारों से मैनेजर साहब के परिवार की मित्रता भी
हो गई और वे थोड़ी-सी ज़मीन खरीद कर वहीं के स्थाई निवासी भी बन गए।
दोनों प्रसन्न थे। कई बरस बीत जाने के बाद भी सोमा किसी संतान का मुँह
नहीं देख पाई, इसका खेद तो उसे था परन्तु वह पति और प्रकृति दोनों में
मगन रहती और खुश रहती। घर के चारों ओर फूलों की क्यारियाँ महकतीं। शेष
खाली ज़मीन पर उन्होंने सेब का बाग़ लगा लिया था और नए-नए प्रयोग करते
रहते। धीरे-धीरे ज़मीन बढ़ने लगी और फिर मल्होत्रा जी ने स्वैच्छिक सेवा
निवृत्ति ले ली। जरूरतमंदों की मदद करना उनका शग़ल, बैंक की नौकरी के समय
भी था और अब भी था। सोमा भी गाँव की औरतों-लड़कियों को अच्छे रहन-सहन और
अचार-चटनी बनाने आदि की शिक्षा देती और गाँव की हर रस्म में बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेती। इस तरह से गाँव के हर कार्य में उनकी उपस्थिति आवश्यक होती।
सच पूछा जाए तो स्वर्ण लाल मल्होत्रा जी तो चुनाव में खड़े होने को तैयार
ही नहीं थे, न ही तो उन्हें सरपंची के प्रपंच का कोई चाव था, परन्तु
आस-पास के दस गाँवों के लोग ही जब आकर उनके पीछे पड़ गए तो उन्हें आखिर
‘हाँ’ करनी पड़ ही गई, फिर उसके बाद भी यह परिणाम? आखिर किस पर लगा था यह
सवालिया निशान? क्या मल्होत्रा जी की लोकप्रियता पर? या फिर
क्षेत्रवासियों की विश्वसनीयता पर? या.....??? मल्होत्रा जी का सिर
भन्नाने लगा तो उन्होंने सिर को जोर से झटक दिया और भीतर की ओर देखकर जोर
से आवाज़ लगाई,
‘‘सोमा.......! सोमा पानी.....।’’ सोमा हाथ में पानी का लोटा और गिलास
लिए भागती हुई आई और लोटे से पानी गिलास में उण्डेलने लगी, परन्तु
मल्होत्रा जी ने उसके हाथ से लोटा झपटकर एक ही साँस में खाली कर दिया।
झटके से पानी पी जाने के कारण उनके गले में फांस पड़ गई और खांसते-खांसते
मल्होत्रा जी की आँखों से आँसू भी निकल आए। सोमा ने उनकी पीठ पर
हल्के-हल्के हाथ मारे और देर तक पीठ मलती रही। तब कहीं जाकर उनकी साँस
सामान्य हो पाई।
‘‘आखिर कब तक सोचते रहेंगे आप इस चुनाव के बारे में? अब बस भी करिए।’’
सोमा रुआँसी हो रही थी। ‘‘क्या और लोग नहीं हारते? अरे जाने दीजिए न!
इसमें ऐसी दिल को लगाने वाली कौन-सी बात हो गई कि आप का खाना-सोना सब ही
छूट गया।’’
‘‘तुम नहीं समझोगी सोमा, मैंने इस इलाके के लिए क्या नहीं किया? और क्या
अकेले मैंने ही? तुमने भी तो इन लोगों को अपने बच्चों की तरह ही समझा था
न? क्या बदला दिया इन्होंने हमें उस अपनेपन और प्यार का? कितने साल हो गए
हैं हमें यहाँ रहते हुए, आज भी हम परदेसी और बाहर के ही लोग हैं। जानती
हो, मैंने कल एक आदमी को कहते सुना है कि इन्हें वोट देने से क्या होता,
वह ‘दीनबंधु’ जैसा भी है, है तो हमारा अपना ही आदमी। यह तो बाहर के ही
हैं।’’ मल्होत्रा जी ने ठण्डी साँस ली।
‘‘बात तो उसकी ठीक ही है। हम चाहे कितना भी क्यों न करें पर सच में हम
बाहर के ही हैं, फिर भी आप इस बात को दिल से न लगाएँ। यह लोग सोच ही नहीं
सकते कि इनके पुरखे भी कभी न कभी, कहीं न कहीं से तो आए ही होंगे।’’
सोमा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कह तो दिया, परन्तु वह जानती थी कि
क्षेत्रवासियों ने उन्हें गहरी चोट पहुँचाई है। पहले उन्हें चुनाव लड़ने
के लिए उकसाया और फिर थोड़े से लालच और बहकावे में आकर दीनबंधु जैसे
भ्रष्ट आदमी को ग्रामप्रधान चुन लिया, पर अब यह लोग कर भी क्या सकते हैं?
इस चुनाव के कारण इस परिवार को आर्थिक हानि भी झेलनी पड़ी थी और उनके बाग़
का काम भी पिछड़ गया था। वरना अब तक तो कभी की उनके बाग़ की कटाई-छंटाई और
दवाइयों का छिड़काव भी हो चुका होता।
‘‘मैं थोड़ी-सी अदरक वाली चाय बना लाऊँ आप के लिए?’’ सोमा ने बड़े ही
आग्रह से पूछा तो उन्होंने हाँ में सिर हिला दिया। सोमा उठकर अन्दर चली
गई और थोड़ी ही देर में दो कप चाय के साथ फिर प्रकट हो गई।
मल्होत्रा जी के पास चाय के कप रख कर उसी बेंच पर दूसरी ओर वह बैठ गई और
दोनों चाय सुड़कने लगे। अन्दर से बड़ी लुभावनी महक नथुनों को महसूस हो रही
थी, ‘‘खाने में आज क्या बनाया है सोमा?’’ मल्होत्रा जी ने बड़े प्यार से
पत्नी से पूछा,
‘‘आप की पसन्द बनाई है, बताइए तो क्या बना है?’’
‘‘हूँ, लगता है मटर-पुलाव बना है। हरे धनिए की महक तो मुझे मीलों दूर से
महसूस हो जाती है।’’ वह मुस्कराने लगे तो सोमा का मन भी हल्का हो गया।
चाय समाप्त कर उसने खाली कप पास रखे स्टूल पर रख दिए और पति के निकट सरक
आई, ‘‘एक बात कहूँ?’’
‘‘कहो न! तुम्हें यह आजकल हर बात में पूछने की आदत क्यों हो गई है सोमा
मल्होत्रा?’’
‘‘इसलिए, कि आजकल आपके मूड का पता ही नहीं चलता। बस, सोचना पड़ जाता है
जनाब, कि मूड अच्छा हो तो बात की जाए, और मूड ठीक न हो तो अपना रास्ता
नापो।’’ सोमा भी मुस्कराने लगी।
‘‘अच्छा जी! बहुत चतुराई दिखाने लगी हो? हाँ, तो तुम क्या कहने वाली थीं, कहो।’’
‘‘मिस्टर मलहोत्रा...’’ सोमा ने शरारत से पति की नाक पकड़ते हुए कहा,
‘‘मैं यह कह रही थी कि इस बार बग़ीचे का काम खतम करके कहीं घूमने चलते
हैं। बहुत सर्दी पड़ने लगी है। वैसे भी अभी तो नवम्बर ही है,
दिसम्बर-जनवरी तो और भी ठंडे होते हैं। कहीं नीचे मैदानी इलाके में चलते
हैं न। किसी रिश्तेदार के घर।’’
‘‘दो महीने, रिश्तेदारों के घर? न भई ना। बेचारे रिश्तेदारों ने क्या
हमारा ठेका ले रखा है, जो दो महीने हम उनका खर्च बढ़ा दें। यह प्रस्ताव
नामंजूर। अब आगे बढ़ो।’’
‘‘तो, फिर मिस्टर मल्होत्रा, हम तीर्थ यात्रा पैकेज वालों से बात कर लेते
हैं। आराम से चारधाम यात्रा में दो महीने गुज़र जाएँगे और हमारी सर्दी
भी।’’ सोमा शरारत से हँसने लगी क्योंकि उसे पता था कि स्वर्णलाल
मल्होत्रा इन बातों में विश्वास नहीं रखते थे और न उनकी रुचि तीर्थ
यात्रा में थी। बल्कि कभी-कभी तो वे चिढ़ भी जाते थे, लेकिन न जाने क्या
हुआ कि आज वे मुस्कराते रहे।
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ सोमा ने फिर पूछा।
‘‘सोमा जी! तीर्थ पर तो वे लोग जाते हैं, जिन्होंने पाप किए हों। हमने
कोई पाप किया है कि हम तीर्थ करने जाएँ?’’ मल्होत्रा जी फिर हँसते हुए
कहने लगे, ‘‘सोमा जी, भूख लग रही है। अभी तो आप हमें वह मटर-पुलाव
खिलाइए। वह भी दही के साथ। मैं तो कहता हूँ, बाहर ही ले आइए। धूप में
बैठकर खाते हैं।’’
‘‘ठीक है.....’’ कह कर सोमा उठकर अन्दर चली गई।
थोड़ी ही देर बाद वे दोनों धूप में बैठे भोजन का आनन्द ले रहे थे। बीच-बीच
में वे दोनों बाग़ की ओर भी नज़र डाल रहे थे। माली अब तक बाग़ के दूसरे छोर
पर पहुँच गए थे। दो मज़दूर कटकर नीचे गिरी टहनियों को उठाकर बाग़ की सफाई
भी साथ ही साथ करते जा रहे थे। बाग़ की बाहरी सीमा पर कटी हुई टहनियों की
दीवार बढ़ती जा रही थी।
सर्दी का मौसम और वह भी ऊँचे पहाड़ों की! माली लोग हर एक डेढ़ घण्टे के बाद
चाय मांगते। सोमा को बहुत काम था, उसके पास सोचने के लिए फुर्सत बिल्कुल
भी नहीं थी। परन्तु मल्होत्रा जी तो आज़ाद थे, वे सोच सकते थे और आजकल
अधिकतर सोचते ही तो थे।
‘‘मैं सोच रही थी कि आप खाना खाकर थोड़ी देर आराम कर लेते तो ठीक रहता।’’
‘‘नहीं सोमा, मालियों को इतना पैसा दिया जाता है, अगर ज़रा-सा भी उनकी तरफ
लापरवाही कर दी तो वे पेड़ों की शक्ल ही बिगाड़ देंगे। खाना खाकर तुम उनके
लिए चाय बना देना मैं जाकर उन्हें देखता हूँ। पहले ही चुनाव में बहुत
पैसा बरबाद कर दिया है हमने, अब तो सँभाल लें।’’
‘‘सच कहा आपने। मैं चाय बनाकर लाती हूँ।’’ सोमा ने जूठे बरतन उठाते हुए कहा।
.........
शाम को ही मल्होत्रा जी ने एक ट्रैवल एजेंसी को फोन करके दो सीटों की
बुकिंग करवा दी और तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम पक्का हो गया तो सोमा ने
फिर चुटकी ली, ‘‘क्या बात है, इस बार आप इतनी जल्दी मान कैसे गए? मैंने
तो हँसी-हँसी में एक बात कह दी और आप ऐसे पत्नी भक्त बन गए कि एकदम
हाँ?’’
‘‘और क्या, क्या हम पत्नी भक्त नहीं है?’’ मल्होत्रा जी ने शरारत से सोमा
की आँखों में देखते हुए कहा, ‘‘आप को हमारी पत्नी भक्ति में शक है कुछ?’’
‘‘नहीं जी, भला हमें शक क्यों होने लगा, लेकिन बात कुछ गले नहीं उतरी।
आखिर तीर्थ यात्रा और आप?’’
‘‘मैडम सोमा मल्होत्रा! बात तो दुनिया देखने की है। अब उसे तीर्थ की नज़र
से देखो या घुमक्कड़ी की नज़र से, क्या फर्क पड़ता है? आपके तीर्थ और हमारा
पर्यटन, ठीक है न? बस इस उमर में कुछ दिन ऐश करने को जी चाहा और आप का
साथ हो तो फिर क्या कहना?’’
‘‘क्यों, मैं तो हर समय आपके साथ ही रहती हूँ, फिर यह.....’’ सोमा ने बात
अधूरी छोड़ दी।
‘‘हाँ!....’’ मल्होत्रा जी ने एक ठंडी साँस ली और खिचड़ी मूँछों के बीच
मुस्कुरा दिए, ‘‘साथ रहती ज़रूर हैं, पर साथ होती नहीं। गाँव के, समाज के
न जाने कितने काम आपको हमसे दूर रखते हैं। घर-गाँव से बाहर तो आपको कोई
काम नहीं रहेगा। यहाँ तक कि खाना बनाना भी नहीं पड़ेगा। तब आप को मजबूरी
में हमारे साथ रहना पड़ेगा। है न?’’
...........
तीन-चार दिन में बाग़ का सारा आवश्यक काम समाप्त कर लिया गया और
निर्धारित समय पर पति-पत्नी नौकरों को उचित निर्देश देकर यात्रा के लिए
निकल पड़े।
.........
आज यात्रा का उनका दसवां दिन था, वे कन्या कुमारी पहुँच चुके थे। अब
मल्होत्रा दम्पति यात्रा की थकान भी महसूस करने लगे थे सो उन्होंने अपने
ट्रैवल एजेंट से बात की और चार दिन कन्या कुमारी रुकने की इच्छा प्रकट
की। एजेंट ने दिल्ली बात करके उनको पीछे आने वाली दूसरी गाड़ी से आने की
सुविधा करा दी परन्तु चार नहीं तीन दिन बाद, क्योंकि उस दिन आने वाली
गाड़ी के तीन यात्री किसी कारण से लखनऊ चले गए और उस गाड़ी में तीन सीटें
खाली होने के कारण उनको सीट मिल सकती थी। अन्यथा उनका चुकाया हुआ किराया
बेकार हो जाता और आगे की व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी पड़ती, फिर किसी गाड़ी
में सीट मिले या न मिले। सो पति-पत्नी ने तीन दिन का सुझाव मान लिया और
कन्याकुमारी में रुक गए।
शाम को होटल के कमरे में आकर मल्होत्रा जी बोले, ‘‘सोमा मैडम, आपका
प्रस्ताव बहुत अच्छा रहा। मैं बहुत ताज़ादम महसूस कर रहा हूँ।’’
‘‘चलिए आपको हमारी कोई बात तो अच्छी लगी।’’
‘‘सोमा, सुबह तीन बजे ही उठा देना। नहा-धोकर सूर्योदय देखने चलेंगे। यहाँ
का सूर्योदय देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। वहाँ पर स्थान लेने के लिए
जल्दी ही जाना पड़ेगा, बड़ी भीड़ रहती है। आज तो हमारे सारे साथी यहीं पर
हैं। फिर कभी पता नहीं हम लोग आपस में मिल भी पाएंगे कि नहीं, सभी से
मिलना हो जाएगा।’’ मल्होत्रा जी कुछ उदास हो गए, ‘‘कितने अच्छे लोग मिले
हैं न?’’
सोमा भी बहुत सारी स्त्रियों से घुलमिल गई थी। यह पूरा एक सौ तीस लोगों
का दल था। इस दल में लगभग सभी अधेड़ और कुछ वृद्ध भी थे। सभी अपने घरों की
समस्याओं को भूलकर आनन्दमग्न थे।
........
दरवाजे के सामने टैक्सी रुकी तो नौकर दौड़ कर बाहर निकल आया। गाड़ी से
मालिक और मालकिन को उतरता देखकर उसने चैन की साँस ली।
‘‘कैसे हो जग्गू?’’ सोमा ने उसे हाथ में पकड़ी अटैची पकड़ाते हुए पूछा।
‘‘अच्छा हूँ। बीबी जी। आप की यात्रा कैसी रही?’’
‘‘बहुत अच्छी। मेरी गोरी कैसी है? उसकी बछिया कैसी है? ठीक से घास-पानी
दिया ही होगा तुमने तो।’’
‘‘जी बीबी जी! लाली भी ब्याने वाली है।’’
‘‘जग्गू.......।’’ वह कुछ और कहता कि मालिक ने उसे मुस्कुराते हुए घूरा,
‘‘अरे तू बीबीजी से ही गपियाता रहेगा और बाकी सामान क्या बाबूजी
उठाएंगे?’’
‘‘नहीं बाबूजी, मैं उठा रहा हूँ न। वह आप लोग बहुत दिनों बाद आए हैं तो...’’
‘‘चल-चल उठा सामान। अब हम कहीं नहीं जाने वाले हैं। करते रहना बातें।’’
रात को सोते समय नित्य नियम के अनुसार सोमा दो गिलासों में दूध ले आई।
बहुत दिनों बाद घर की गाय का दूध पीकर दोनों ने परम संतोष की साँस ली,
‘‘जो सुख छज्जू के चौबारे, न बलख़ न बुख़ारे।’’ मल्होत्रा जी ने दूध का
खाली गिलास पलंग के साथ लगी स्टूल पर रखते हुए लम्बा डकार लिया।
‘‘क्या...क्या...क्या?’’ सोमा दरवाजे से बाहर निकलते-निलते रुक गई,
‘‘क्या कहा आपने?’’
‘‘सच सोमा! अपने घर जैसा आराम कहीं नहीं मिलता।’’
‘‘हाँ! बस आज की रात भर, कल से फिर आप वही गाँव के किस्से-कहानियाँ शुरू
कर देंगे। पर मैं साफ कहे देती हूँ कि अब अगर आपने बात की न इस फालतू के
प्रकरण की तो मैं आपको छोड़ूँगी नहीं।’’
‘‘अरे, सोमा जी, रात तो बीतने दीजिए। तीर्थ यात्रा का मज़ा किरकिरा करना
है क्या हमें? और आप हमें याद क्यों दिला रही हैं आइए खिड़की के पास
आइए?’’
बाहर आसमान पर पूर्णमासी का पूरा चाँद अपनी चाँदनी की छटा बिखरा रहा था।
सोमा ने खिड़की खोल दी। चाँदनी कमरे में फैल गई। सोमा चुपके से वापस आकर
चाँदनी जैसी बिस्तर की सफेद चादर पर पसर गई।
............
डेढ़ महीने की यात्रा की थकान और घर के अन्दर निश्चिंत नींद के कारण सुबह
जब सोमा की आँख खुली तो पति को खिड़की के पास खड़ा देखकर बोली,
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘देखो सोमा, वह शेरू गेट के पास खड़ा है, शायद कुछ काम होगा पर अन्दर
आने से झिझक रहा है।’’
‘‘रहने दो न? हम परदेसियों से उसे क्या काम होता?’’
‘‘जाने दो सोमा, गरीब आदमी है, कहाँ जाएगा?’’
‘‘क्यों? जाए न अपने प्रधान के पास, यहाँ क्या लेने आया है?’’ पर
मल्होत्रा जी ने सुनी अनसुनी करके जग्गू को आवाज़ दी और उसे शेरू को बुला
लाने को कहा।
‘‘बाबू जी, तीन दिन हुए उसकी घर वाली मर गई थी। किसी ने उसे चार पैसे
उसके क्रिया-करम के लिए भी नहीं दिए। आप को आया देखकर वह रात गए से यहाँ
खड़ा है, पर अन्दर आने से डर रहा है।’’ जग्गू ने आँखें झुकाते हुए कहा
मल्होत्रा जी ने बिना कुछ कहे अल्मारी खोली और पाँच सौ रुपए निकाल कर
जग्गू के हाथ में पकड़ा दिए, ‘‘जा दे आ।’’ मल्होत्रा जी की आवाज़ नम थी।
सोमा और जग्गू आँखें फाड़-फाड़कर उन्हें देख रहे थे, क्योंकि चुनाव में यही
शेरू बढ़-चढ़कर प्रधान के लिए प्रचार कर रहा था।
कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, उपन्यास, बाल साहित्य आदि प्रत्येक विधा में आपकी लेखनी समान अधिकार रखती है। आप मुख्य रूप से हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, पहाड़ी, (हिमाचली डोगरी-महासवी), उर्दू, ओड़िआ आदि भाषाओं में भी साहित्य सृजन करती हैं।
सभी विधाओं पर आपकी लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
देश की अधिकांश पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन से भी आपकी रचनाओं का लगातार प्रसारण होता रहता है।
कवि सम्मलेन और साहित्यिक मंचों में भी आप की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है।
आपको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
आप शैलसूत्र (त्रैमासिक) का प्रकाशन-सम्पादन भी करती हैं। आरती प्रकाशन की संस्थापक भी हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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शैलेश तिवारी, संपादक
पतझड़ के बाद
सर्दी पूरे जोर-शोर से पहाड़ों पर उतर आई थी। इन दिनों लम्बी पूँछ वाले
नीलकण्ठ पक्षी न जाने कहाँ से आ जाते और सेब की नंगी टहनियों पर बैठकर
इधर से उधर फुदकते रहते। बाग में जहाँ कहीं कीड़े दिखाई देते उनको चट्ट कर
जाना ही इनका काम होता है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदते-उड़ते इनकी
लहराती लम्बी नीली पूँछ बड़ी भली लग रही थी। इस समय यह महानुभाव
कीड़े-मकोड़े खाकर पेड़ों की टहनियों पर बैठकर आराम फरमा रहे थे।
सेब के बागीचे में सर्दियों के काम पूरे जोर-शोर से हो रहे थे। खेतों की
घास काट कर सुखाई जा चुकी थी। मल्होत्रा जी सोच रहे थे कि सेब के वृक्षों
पर से फसल टूटने के साथ ही पत्ते गिरने शुरू हो जाते हैं और नवम्बर तक एक
भी पत्ता कहीं दिखाई नहीं देता, इसीलिए सारे फलदार पेड़ सूखी लकड़ियों-से
खड़े हैं।
दो माली पेड़ों पर चढ़े हुए सूखी-टूटी टहनियों की छंटाई कर रहे थे। सेब
तोड़ने के कारण टूटी और सूखी टहनियाँ काटकर निकाली जा रही थीं ताकि आने
वाले मौसम में अच्छी फसल ली जा सके। बहुत बड़ा था बाग़ मल्होत्रा जी का। हर
साल, कई दिन तक चलने वाली इस छंटाई में मल्होत्रा जी खुद भी पेड़ों पर
चढ़कर उनकी आकृति को सुन्दर बनाने के लिए कई तरह से छंटाई किया करते थे,
परन्तु इस बार उनका काम में मन ही नहीं लग रहा था। थोड़ी देर छंटाई करने
के बाद वह पेड़ पर से नीचे उतर आए और सोमा से चाय बनाने के लिए कहा।
सोमा ने चाय बनाकर मालियों को दे दी थी और फिर बरामदे में पड़ी तिपाई
खींचकर चाय मल्होत्रा जी के सामने रख दी। बिना कुछ बोले मल्होत्रा जी ने
चाय उठाकर पी ली। पति की मनोदशा को समझते हुए सोमा ने भी इस समय कुछ कहना
ठीक नहीं समझा और चाय के खाली बर्तन लेकर अन्दर चली गई।
सोमा के भीतर चले जाने के बाद मल्होत्रा जी फिर से सोचने के लिए
स्वतंत्र थे। वह चुपचाप गुमसुम से बरामदे में रखी लकड़ी की बेंच पर बैठे
सोच रहे थे कि आखिर चूक कहाँ हुई। सब कुछ तो सोच-समझकर और नाप-तोलकर किया
गया था। लोगों के दिलों का कोई थोह-ठिकाना नहीं लगता। लोग कहते कुछ और
हैं और करते कुछ और हैं।
.........................
लगभग तीस साल पहले स्वर्णलाल मल्होत्रा चाँदनी चौक दिल्ली के यूको बैंक
से, पदोन्नति पा कर सीधे इस छोटे से गाँव गौरा में आ गए थे। उनकी प्रमोशन
के साथ पिछड़े क्षेत्र की शर्त पहले ही जुड़ गई थी। बैंक की शाख़ा नई खुली
थी और कोई इस दूर दराज के गाँव में जाने को तैयार ही नहीं था, पर
मल्होत्रा जी की नई-नई नौकरी और नई-नई शादी, उत्साह ही उत्साह था। सोमा
तो उनकी हर हाँ में हाँ मिलाने वाली थी सो कारवाँ इस गाँव में आ उतरा।
अपने मिलनसार स्वभाव के कारण दोनों पति-पत्नी बहुत जल्द गाँव का अंग बन
गए, रही सोमा? तो, उसे तो वैसे भी प्रकृति से बहुत लगाव था, उसे इस गाँव
में आकर मुँह माँगी मुराद मिल गई थी। शहर से, क्योंकि और कोई अधिकारी
इतनी दूर के गाँव में आना नहीं चाहता था और स्वर्णलाल ने स्वयं अपने
स्थानांतरण की कोई पहल नहीं की इसलिए वह गाँव के वातवावरण में ही रच-बस
गए। गाँव के कुछ अच्छे परिवारों से मैनेजर साहब के परिवार की मित्रता भी
हो गई और वे थोड़ी-सी ज़मीन खरीद कर वहीं के स्थाई निवासी भी बन गए।
दोनों प्रसन्न थे। कई बरस बीत जाने के बाद भी सोमा किसी संतान का मुँह
नहीं देख पाई, इसका खेद तो उसे था परन्तु वह पति और प्रकृति दोनों में
मगन रहती और खुश रहती। घर के चारों ओर फूलों की क्यारियाँ महकतीं। शेष
खाली ज़मीन पर उन्होंने सेब का बाग़ लगा लिया था और नए-नए प्रयोग करते
रहते। धीरे-धीरे ज़मीन बढ़ने लगी और फिर मल्होत्रा जी ने स्वैच्छिक सेवा
निवृत्ति ले ली। जरूरतमंदों की मदद करना उनका शग़ल, बैंक की नौकरी के समय
भी था और अब भी था। सोमा भी गाँव की औरतों-लड़कियों को अच्छे रहन-सहन और
अचार-चटनी बनाने आदि की शिक्षा देती और गाँव की हर रस्म में बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेती। इस तरह से गाँव के हर कार्य में उनकी उपस्थिति आवश्यक होती।
सच पूछा जाए तो स्वर्ण लाल मल्होत्रा जी तो चुनाव में खड़े होने को तैयार
ही नहीं थे, न ही तो उन्हें सरपंची के प्रपंच का कोई चाव था, परन्तु
आस-पास के दस गाँवों के लोग ही जब आकर उनके पीछे पड़ गए तो उन्हें आखिर
‘हाँ’ करनी पड़ ही गई, फिर उसके बाद भी यह परिणाम? आखिर किस पर लगा था यह
सवालिया निशान? क्या मल्होत्रा जी की लोकप्रियता पर? या फिर
क्षेत्रवासियों की विश्वसनीयता पर? या.....??? मल्होत्रा जी का सिर
भन्नाने लगा तो उन्होंने सिर को जोर से झटक दिया और भीतर की ओर देखकर जोर
से आवाज़ लगाई,
‘‘सोमा.......! सोमा पानी.....।’’ सोमा हाथ में पानी का लोटा और गिलास
लिए भागती हुई आई और लोटे से पानी गिलास में उण्डेलने लगी, परन्तु
मल्होत्रा जी ने उसके हाथ से लोटा झपटकर एक ही साँस में खाली कर दिया।
झटके से पानी पी जाने के कारण उनके गले में फांस पड़ गई और खांसते-खांसते
मल्होत्रा जी की आँखों से आँसू भी निकल आए। सोमा ने उनकी पीठ पर
हल्के-हल्के हाथ मारे और देर तक पीठ मलती रही। तब कहीं जाकर उनकी साँस
सामान्य हो पाई।
‘‘आखिर कब तक सोचते रहेंगे आप इस चुनाव के बारे में? अब बस भी करिए।’’
सोमा रुआँसी हो रही थी। ‘‘क्या और लोग नहीं हारते? अरे जाने दीजिए न!
इसमें ऐसी दिल को लगाने वाली कौन-सी बात हो गई कि आप का खाना-सोना सब ही
छूट गया।’’
‘‘तुम नहीं समझोगी सोमा, मैंने इस इलाके के लिए क्या नहीं किया? और क्या
अकेले मैंने ही? तुमने भी तो इन लोगों को अपने बच्चों की तरह ही समझा था
न? क्या बदला दिया इन्होंने हमें उस अपनेपन और प्यार का? कितने साल हो गए
हैं हमें यहाँ रहते हुए, आज भी हम परदेसी और बाहर के ही लोग हैं। जानती
हो, मैंने कल एक आदमी को कहते सुना है कि इन्हें वोट देने से क्या होता,
वह ‘दीनबंधु’ जैसा भी है, है तो हमारा अपना ही आदमी। यह तो बाहर के ही
हैं।’’ मल्होत्रा जी ने ठण्डी साँस ली।
‘‘बात तो उसकी ठीक ही है। हम चाहे कितना भी क्यों न करें पर सच में हम
बाहर के ही हैं, फिर भी आप इस बात को दिल से न लगाएँ। यह लोग सोच ही नहीं
सकते कि इनके पुरखे भी कभी न कभी, कहीं न कहीं से तो आए ही होंगे।’’
सोमा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कह तो दिया, परन्तु वह जानती थी कि
क्षेत्रवासियों ने उन्हें गहरी चोट पहुँचाई है। पहले उन्हें चुनाव लड़ने
के लिए उकसाया और फिर थोड़े से लालच और बहकावे में आकर दीनबंधु जैसे
भ्रष्ट आदमी को ग्रामप्रधान चुन लिया, पर अब यह लोग कर भी क्या सकते हैं?
इस चुनाव के कारण इस परिवार को आर्थिक हानि भी झेलनी पड़ी थी और उनके बाग़
का काम भी पिछड़ गया था। वरना अब तक तो कभी की उनके बाग़ की कटाई-छंटाई और
दवाइयों का छिड़काव भी हो चुका होता।
‘‘मैं थोड़ी-सी अदरक वाली चाय बना लाऊँ आप के लिए?’’ सोमा ने बड़े ही
आग्रह से पूछा तो उन्होंने हाँ में सिर हिला दिया। सोमा उठकर अन्दर चली
गई और थोड़ी ही देर में दो कप चाय के साथ फिर प्रकट हो गई।
मल्होत्रा जी के पास चाय के कप रख कर उसी बेंच पर दूसरी ओर वह बैठ गई और
दोनों चाय सुड़कने लगे। अन्दर से बड़ी लुभावनी महक नथुनों को महसूस हो रही
थी, ‘‘खाने में आज क्या बनाया है सोमा?’’ मल्होत्रा जी ने बड़े प्यार से
पत्नी से पूछा,
‘‘आप की पसन्द बनाई है, बताइए तो क्या बना है?’’
‘‘हूँ, लगता है मटर-पुलाव बना है। हरे धनिए की महक तो मुझे मीलों दूर से
महसूस हो जाती है।’’ वह मुस्कराने लगे तो सोमा का मन भी हल्का हो गया।
चाय समाप्त कर उसने खाली कप पास रखे स्टूल पर रख दिए और पति के निकट सरक
आई, ‘‘एक बात कहूँ?’’
‘‘कहो न! तुम्हें यह आजकल हर बात में पूछने की आदत क्यों हो गई है सोमा
मल्होत्रा?’’
‘‘इसलिए, कि आजकल आपके मूड का पता ही नहीं चलता। बस, सोचना पड़ जाता है
जनाब, कि मूड अच्छा हो तो बात की जाए, और मूड ठीक न हो तो अपना रास्ता
नापो।’’ सोमा भी मुस्कराने लगी।
‘‘अच्छा जी! बहुत चतुराई दिखाने लगी हो? हाँ, तो तुम क्या कहने वाली थीं, कहो।’’
‘‘मिस्टर मलहोत्रा...’’ सोमा ने शरारत से पति की नाक पकड़ते हुए कहा,
‘‘मैं यह कह रही थी कि इस बार बग़ीचे का काम खतम करके कहीं घूमने चलते
हैं। बहुत सर्दी पड़ने लगी है। वैसे भी अभी तो नवम्बर ही है,
दिसम्बर-जनवरी तो और भी ठंडे होते हैं। कहीं नीचे मैदानी इलाके में चलते
हैं न। किसी रिश्तेदार के घर।’’
‘‘दो महीने, रिश्तेदारों के घर? न भई ना। बेचारे रिश्तेदारों ने क्या
हमारा ठेका ले रखा है, जो दो महीने हम उनका खर्च बढ़ा दें। यह प्रस्ताव
नामंजूर। अब आगे बढ़ो।’’
‘‘तो, फिर मिस्टर मल्होत्रा, हम तीर्थ यात्रा पैकेज वालों से बात कर लेते
हैं। आराम से चारधाम यात्रा में दो महीने गुज़र जाएँगे और हमारी सर्दी
भी।’’ सोमा शरारत से हँसने लगी क्योंकि उसे पता था कि स्वर्णलाल
मल्होत्रा इन बातों में विश्वास नहीं रखते थे और न उनकी रुचि तीर्थ
यात्रा में थी। बल्कि कभी-कभी तो वे चिढ़ भी जाते थे, लेकिन न जाने क्या
हुआ कि आज वे मुस्कराते रहे।
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ सोमा ने फिर पूछा।
‘‘सोमा जी! तीर्थ पर तो वे लोग जाते हैं, जिन्होंने पाप किए हों। हमने
कोई पाप किया है कि हम तीर्थ करने जाएँ?’’ मल्होत्रा जी फिर हँसते हुए
कहने लगे, ‘‘सोमा जी, भूख लग रही है। अभी तो आप हमें वह मटर-पुलाव
खिलाइए। वह भी दही के साथ। मैं तो कहता हूँ, बाहर ही ले आइए। धूप में
बैठकर खाते हैं।’’
‘‘ठीक है.....’’ कह कर सोमा उठकर अन्दर चली गई।
थोड़ी ही देर बाद वे दोनों धूप में बैठे भोजन का आनन्द ले रहे थे। बीच-बीच
में वे दोनों बाग़ की ओर भी नज़र डाल रहे थे। माली अब तक बाग़ के दूसरे छोर
पर पहुँच गए थे। दो मज़दूर कटकर नीचे गिरी टहनियों को उठाकर बाग़ की सफाई
भी साथ ही साथ करते जा रहे थे। बाग़ की बाहरी सीमा पर कटी हुई टहनियों की
दीवार बढ़ती जा रही थी।
सर्दी का मौसम और वह भी ऊँचे पहाड़ों की! माली लोग हर एक डेढ़ घण्टे के बाद
चाय मांगते। सोमा को बहुत काम था, उसके पास सोचने के लिए फुर्सत बिल्कुल
भी नहीं थी। परन्तु मल्होत्रा जी तो आज़ाद थे, वे सोच सकते थे और आजकल
अधिकतर सोचते ही तो थे।
‘‘मैं सोच रही थी कि आप खाना खाकर थोड़ी देर आराम कर लेते तो ठीक रहता।’’
‘‘नहीं सोमा, मालियों को इतना पैसा दिया जाता है, अगर ज़रा-सा भी उनकी तरफ
लापरवाही कर दी तो वे पेड़ों की शक्ल ही बिगाड़ देंगे। खाना खाकर तुम उनके
लिए चाय बना देना मैं जाकर उन्हें देखता हूँ। पहले ही चुनाव में बहुत
पैसा बरबाद कर दिया है हमने, अब तो सँभाल लें।’’
‘‘सच कहा आपने। मैं चाय बनाकर लाती हूँ।’’ सोमा ने जूठे बरतन उठाते हुए कहा।
.........
शाम को ही मल्होत्रा जी ने एक ट्रैवल एजेंसी को फोन करके दो सीटों की
बुकिंग करवा दी और तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम पक्का हो गया तो सोमा ने
फिर चुटकी ली, ‘‘क्या बात है, इस बार आप इतनी जल्दी मान कैसे गए? मैंने
तो हँसी-हँसी में एक बात कह दी और आप ऐसे पत्नी भक्त बन गए कि एकदम
हाँ?’’
‘‘और क्या, क्या हम पत्नी भक्त नहीं है?’’ मल्होत्रा जी ने शरारत से सोमा
की आँखों में देखते हुए कहा, ‘‘आप को हमारी पत्नी भक्ति में शक है कुछ?’’
‘‘नहीं जी, भला हमें शक क्यों होने लगा, लेकिन बात कुछ गले नहीं उतरी।
आखिर तीर्थ यात्रा और आप?’’
‘‘मैडम सोमा मल्होत्रा! बात तो दुनिया देखने की है। अब उसे तीर्थ की नज़र
से देखो या घुमक्कड़ी की नज़र से, क्या फर्क पड़ता है? आपके तीर्थ और हमारा
पर्यटन, ठीक है न? बस इस उमर में कुछ दिन ऐश करने को जी चाहा और आप का
साथ हो तो फिर क्या कहना?’’
‘‘क्यों, मैं तो हर समय आपके साथ ही रहती हूँ, फिर यह.....’’ सोमा ने बात
अधूरी छोड़ दी।
‘‘हाँ!....’’ मल्होत्रा जी ने एक ठंडी साँस ली और खिचड़ी मूँछों के बीच
मुस्कुरा दिए, ‘‘साथ रहती ज़रूर हैं, पर साथ होती नहीं। गाँव के, समाज के
न जाने कितने काम आपको हमसे दूर रखते हैं। घर-गाँव से बाहर तो आपको कोई
काम नहीं रहेगा। यहाँ तक कि खाना बनाना भी नहीं पड़ेगा। तब आप को मजबूरी
में हमारे साथ रहना पड़ेगा। है न?’’
...........
तीन-चार दिन में बाग़ का सारा आवश्यक काम समाप्त कर लिया गया और
निर्धारित समय पर पति-पत्नी नौकरों को उचित निर्देश देकर यात्रा के लिए
निकल पड़े।
.........
आज यात्रा का उनका दसवां दिन था, वे कन्या कुमारी पहुँच चुके थे। अब
मल्होत्रा दम्पति यात्रा की थकान भी महसूस करने लगे थे सो उन्होंने अपने
ट्रैवल एजेंट से बात की और चार दिन कन्या कुमारी रुकने की इच्छा प्रकट
की। एजेंट ने दिल्ली बात करके उनको पीछे आने वाली दूसरी गाड़ी से आने की
सुविधा करा दी परन्तु चार नहीं तीन दिन बाद, क्योंकि उस दिन आने वाली
गाड़ी के तीन यात्री किसी कारण से लखनऊ चले गए और उस गाड़ी में तीन सीटें
खाली होने के कारण उनको सीट मिल सकती थी। अन्यथा उनका चुकाया हुआ किराया
बेकार हो जाता और आगे की व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी पड़ती, फिर किसी गाड़ी
में सीट मिले या न मिले। सो पति-पत्नी ने तीन दिन का सुझाव मान लिया और
कन्याकुमारी में रुक गए।
शाम को होटल के कमरे में आकर मल्होत्रा जी बोले, ‘‘सोमा मैडम, आपका
प्रस्ताव बहुत अच्छा रहा। मैं बहुत ताज़ादम महसूस कर रहा हूँ।’’
‘‘चलिए आपको हमारी कोई बात तो अच्छी लगी।’’
‘‘सोमा, सुबह तीन बजे ही उठा देना। नहा-धोकर सूर्योदय देखने चलेंगे। यहाँ
का सूर्योदय देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। वहाँ पर स्थान लेने के लिए
जल्दी ही जाना पड़ेगा, बड़ी भीड़ रहती है। आज तो हमारे सारे साथी यहीं पर
हैं। फिर कभी पता नहीं हम लोग आपस में मिल भी पाएंगे कि नहीं, सभी से
मिलना हो जाएगा।’’ मल्होत्रा जी कुछ उदास हो गए, ‘‘कितने अच्छे लोग मिले
हैं न?’’
सोमा भी बहुत सारी स्त्रियों से घुलमिल गई थी। यह पूरा एक सौ तीस लोगों
का दल था। इस दल में लगभग सभी अधेड़ और कुछ वृद्ध भी थे। सभी अपने घरों की
समस्याओं को भूलकर आनन्दमग्न थे।
........
दरवाजे के सामने टैक्सी रुकी तो नौकर दौड़ कर बाहर निकल आया। गाड़ी से
मालिक और मालकिन को उतरता देखकर उसने चैन की साँस ली।
‘‘कैसे हो जग्गू?’’ सोमा ने उसे हाथ में पकड़ी अटैची पकड़ाते हुए पूछा।
‘‘अच्छा हूँ। बीबी जी। आप की यात्रा कैसी रही?’’
‘‘बहुत अच्छी। मेरी गोरी कैसी है? उसकी बछिया कैसी है? ठीक से घास-पानी
दिया ही होगा तुमने तो।’’
‘‘जी बीबी जी! लाली भी ब्याने वाली है।’’
‘‘जग्गू.......।’’ वह कुछ और कहता कि मालिक ने उसे मुस्कुराते हुए घूरा,
‘‘अरे तू बीबीजी से ही गपियाता रहेगा और बाकी सामान क्या बाबूजी
उठाएंगे?’’
‘‘नहीं बाबूजी, मैं उठा रहा हूँ न। वह आप लोग बहुत दिनों बाद आए हैं तो...’’
‘‘चल-चल उठा सामान। अब हम कहीं नहीं जाने वाले हैं। करते रहना बातें।’’
रात को सोते समय नित्य नियम के अनुसार सोमा दो गिलासों में दूध ले आई।
बहुत दिनों बाद घर की गाय का दूध पीकर दोनों ने परम संतोष की साँस ली,
‘‘जो सुख छज्जू के चौबारे, न बलख़ न बुख़ारे।’’ मल्होत्रा जी ने दूध का
खाली गिलास पलंग के साथ लगी स्टूल पर रखते हुए लम्बा डकार लिया।
‘‘क्या...क्या...क्या?’’ सोमा दरवाजे से बाहर निकलते-निलते रुक गई,
‘‘क्या कहा आपने?’’
‘‘सच सोमा! अपने घर जैसा आराम कहीं नहीं मिलता।’’
‘‘हाँ! बस आज की रात भर, कल से फिर आप वही गाँव के किस्से-कहानियाँ शुरू
कर देंगे। पर मैं साफ कहे देती हूँ कि अब अगर आपने बात की न इस फालतू के
प्रकरण की तो मैं आपको छोड़ूँगी नहीं।’’
‘‘अरे, सोमा जी, रात तो बीतने दीजिए। तीर्थ यात्रा का मज़ा किरकिरा करना
है क्या हमें? और आप हमें याद क्यों दिला रही हैं आइए खिड़की के पास
आइए?’’
बाहर आसमान पर पूर्णमासी का पूरा चाँद अपनी चाँदनी की छटा बिखरा रहा था।
सोमा ने खिड़की खोल दी। चाँदनी कमरे में फैल गई। सोमा चुपके से वापस आकर
चाँदनी जैसी बिस्तर की सफेद चादर पर पसर गई।
............
डेढ़ महीने की यात्रा की थकान और घर के अन्दर निश्चिंत नींद के कारण सुबह
जब सोमा की आँख खुली तो पति को खिड़की के पास खड़ा देखकर बोली,
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘देखो सोमा, वह शेरू गेट के पास खड़ा है, शायद कुछ काम होगा पर अन्दर
आने से झिझक रहा है।’’
‘‘रहने दो न? हम परदेसियों से उसे क्या काम होता?’’
‘‘जाने दो सोमा, गरीब आदमी है, कहाँ जाएगा?’’
‘‘क्यों? जाए न अपने प्रधान के पास, यहाँ क्या लेने आया है?’’ पर
मल्होत्रा जी ने सुनी अनसुनी करके जग्गू को आवाज़ दी और उसे शेरू को बुला
लाने को कहा।
‘‘बाबू जी, तीन दिन हुए उसकी घर वाली मर गई थी। किसी ने उसे चार पैसे
उसके क्रिया-करम के लिए भी नहीं दिए। आप को आया देखकर वह रात गए से यहाँ
खड़ा है, पर अन्दर आने से डर रहा है।’’ जग्गू ने आँखें झुकाते हुए कहा
मल्होत्रा जी ने बिना कुछ कहे अल्मारी खोली और पाँच सौ रुपए निकाल कर
जग्गू के हाथ में पकड़ा दिए, ‘‘जा दे आ।’’ मल्होत्रा जी की आवाज़ नम थी।
सोमा और जग्गू आँखें फाड़-फाड़कर उन्हें देख रहे थे, क्योंकि चुनाव में यही
शेरू बढ़-चढ़कर प्रधान के लिए प्रचार कर रहा था।
आशा शैली
------------------परिचय
आशा शैली जी का जन्म अस्मान खट्टड़-रावलपिंडी (अविभाजित भारत) में हुआ लेकिन वह वर्तमान में इंद्रा नगर नैनीताल, उत्तराखण्ड में निवास करती हैं।कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, उपन्यास, बाल साहित्य आदि प्रत्येक विधा में आपकी लेखनी समान अधिकार रखती है। आप मुख्य रूप से हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, पहाड़ी, (हिमाचली डोगरी-महासवी), उर्दू, ओड़िआ आदि भाषाओं में भी साहित्य सृजन करती हैं।
सभी विधाओं पर आपकी लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
देश की अधिकांश पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन से भी आपकी रचनाओं का लगातार प्रसारण होता रहता है।
कवि सम्मलेन और साहित्यिक मंचों में भी आप की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है।
आपको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
आप शैलसूत्र (त्रैमासिक) का प्रकाशन-सम्पादन भी करती हैं। आरती प्रकाशन की संस्थापक भी हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
पतझड़ के बाद... एक ऐसी कहानी जिसको पढ़ना शुरू करो तो....दृश्य दर दृश्य एक फिल्म....आँखों के सामने चलती जाती है....। सांस के उतार चढ़ाव पर.... नियंत्रण करने की कोशिश करता पाठक.... आगे क्या होने वाला के भाव से पढ़ता जाता है....। कहानी एक प्रकार का लघु उपन्यास है.... जो दृश्य बदलते हुए.... कथानक को आगे बढ़ाता है....। सरस, सहज और सरल भाषा का प्रवाह.... गतिमान होने से.... कथानक की लंबाई ऊब पैदा नहीं करती है... वाक्य दर वाक्य रोचकता बढ़ती जाती है...। मल्होत्रा दंपत्ति की बातों में खोया पाठक... अंत में जाकर ही कहानी का मर्म जा पाता है...। इससे पहले तो लेखिका की कलम... दुनियादारी की चालाकियो.... और फितरतों को बखूबी बयाँ करती चलती है...। ग्राम प्रधान के चुनाव के बहाने.... लोकतंत्र के कुरूप होते चेहरे को उजागर करने की कोशिश भी है....। दीनबंधु का पैसे की दम पर.... और स्थानीय / बाहरी के भेद को गहरा कर.... अयोग्य होते हुए भी चुनाव जीत जाना... हम वोटर की उम्मीदवार की चयन की मानसिकता को भी दर्शा जाता है...। हमारे पास अपना प्रतिनिधि चुनने का... पैमाना उसकी योग्यता पर आधारित नही है...। इस पतझड़ से हमारे लोकतंत्र की बहार विस्थापित सी हो गई है.....। लेकिन तीर्थ यात्रा के उल्लास में .... चुनाव हार जाने का मलाल.... शेरू के आने पर मल्होत्रा जी की मानवीयता को जिंदा रखती है....। जो चुनाव में उनका घोर विरोधी था.....। यह आखिरी बात भी.... हमारे एकजुट रहने वाले, आपसी प्रेम, सद्भाव, विश्वास के सहारे जीवन जीने वाले ग्रामीणों में.... दो गुटों में बांटती लकीर की गहराई को भी दर्शाती है....। आज गाँव राजनैतिक निष्ठाओं के चलते... बंटे हुए नजर आते हैं....। इस आपसी राजनीति विरोध के चलते... एक शब्द अस्तित्व में आया.... चुनावी रंजिश... जो एक दूसरे की जान लेने से परहेज नहीं करती है....। इसका प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा ही है....। आपसी राजनैतिक मन मुटाव को दूर करने का संदेश भी कहानी दे रही है.....। मानव हो तो मानवीयता को जिंदा रखो.... मल्होत्रा जी के बहाने यह संदेश भी दे रही है....। आशा दीदी की कलम ने.... राजनीति जैसे विषय के कालेपन को भी.... बहुत ही सफाई के साथ उजागर किया है....। बहुत बहुत बधाई दी....।शैलेश तिवारी, संपादक


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