लेखिका


दर दर भटकते हैं तब नहीं नजर आते... 

सच्चे इंसानों को वो 
अक्सर चप्पल घिसवाते हैं
जुर्म करने वाले फोटो में 
साथ खड़े दिख जाते हैं
कुछ घंटों के कामों को 
सालों साल लटकाते हैं
फिर कहते हैं मैडम 
हम पर केस बहुत आते हैं
भई न्याय व्यवस्था 
टाइट ना होगी 
फिर  ग्राफ तो बढ़ेगा
काहे चाय के नाम पर साथ 
बैठे नज़र आते हैं
अपने ओहदे की धज्जियां 
जाने क्यों खुद ये उड़वाते हैं
हरियाली के इतने मोहताज
नज़र क्यों आते हैं

काम है इनका रब वर्गा (जैसा) 
बस शर्मिंदा यह करवाते हैं

दर्ज नहीं होते केस लोगों के 
तहरीर लिए  नज़र आते हैं

कहते हैं घर में निपटा लो 
यह तो घर के मैटर हैं
घर के मैटर घर में सुलझे
यही तो बैटर है

घर के मैटर सुलझ ही जाते 
तुम्हारे पास क्यों आना था
दूध का दूध पानी का पानी 
तुमसे यही तो करवाना था

हालातों से जो उलझ ना सके
फिर केस ऐसा बनता हैं
तब दौड़ कर आता है प्रशासन
लटक गई तंग आकर बेचारी
फिर पोस्टमार्टम बनता है
ना समाज ना प्रशासन 
सब तमाशा देखते हैं
एक अनहोनी के इंतजार 
में सब बैठा करते हैं

टूट जाती है सांसे जब      हाय 
अच्छी थी तब सब कहते हैं
संघर्ष कर रही थी वो
फिर बेचारी  टाइटल देते हैं

दर-दर जब भटक रही थी 
तब कोई ना सुनता था

प्रश्न मेरा है ऐ दुनिया वालों

तब क्यों ????ना बोले जब सब 
कुछ आस पास दिख रहा था

तब क्यों???? ना बोले जब सब 
कुछ आसपास दिख रहा है


सौम्या दुआ, हलद्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड

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परिचय 

सौम्या दुआ(सीमा चांदना) हल्द्वानी नैनीताल(उत्तराखण्ड) की निवासी हैं। साहित्य सेवा के पथ पर निरंतर अग्रसर हैं। आपका 
एक उपन्यास 2019" सोचा तो नहीं था"
एक काव्य संग्रह 11 जनवरी 2020 ""दस्तक लफ्जों की"" एक सांझा व्यंग्य संग्रह चाटुकारिता" कई सांझा काव्य संग्रह पराणी इत्यादि प्रकाशित हो चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आप काव्य मंचों सहित रेडियो के कई कार्यक्रमों में भाग लेती आई हैं। आप अच्छी लेखिका के साथ अच्छी गायिका भी हैं। आपको विभिन्न मंचों से सम्मान प्राप्त हुआ है। इसके अलावा आप एक संस्था - मेरा हक मुझे दो  , का संचालन भी करती हैं जो महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करती है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है। 
संपादक
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