किसी राह पर, किसी मोड़ पर.... मुझे चल न देना छोड़ कर..... 


                            गायिका

दोस्तों.... आज हम आपको गीत संगीत के उस सफर पर लिए... चलते हैं... जो 1970 में आई फिल्म " मेरे हमसफर" का है..... फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो औसत दर्जे की रही.... लेकिन इसके एक गीत ने बहुत... कमाल किया.... वो भी ऐसा कि आज भी... उसकी स्टार्टिंग धुन कान में पड जाए... तो कसम से मिश्री की मीठी डली..... के मुँह में घुल जाने जैसा अहसास हो जाता है.....। अजी गीत क्या है..... बस यूँ समझ लो... एक ऐसा अनुरोध है कि.... जिसके अंदर एक अज्ञात भय सा छुपा है.... जो नियति की क्रूरता से डरा हुआ है....। और एक प्रकार का उलाहना जैसा भी है... 
" किसी राह में... किसी मोड़ पर... मुझे छोड़ कर.... चल न देना मेरे हमसफर.... "
अचानक मिले दो जवान दिल..... एक अनजाने सफर में... जब हमसफर बनते हैं... तो ठेठ पहाड़ी परिवेश के युवा.... बिन कुछ कहे.... बिना किसी प्रोपजल के... एक दूसरे के हो जाते हैं.....। 
इस सिचुएशन में गीतकार आनंद बख्शी की कलम से.... यह कालजयी गीत जन्म लेता है....जो किसी परिस्थिति विशेष के लिए....गीत रचने के मास्टर माने जाते थे...। एक दूसरे से कैसा आग्रह पूर्ण... अनुरोध है कि... दिल में गाना सुनते सुनते... गुदगुदी पैदा हो जाए...। गीत के बोल तो हैं ही कमाल के... लेकिन इसको संगीत में पिरोने वाले... गुजरात के कच्छ से मुंबई आकर बसे... दो भाईयों की जोड़ी ने.... कमाल से ऊपर वाला कमाल किया.... ऐसी कर्ण प्रिय धुन बनाई ... जो मर्म को भेदती है.... और ज़ुबाँ बरबस ही उस को.. गुनगुनाने पर मजबूर हो जाती है....। जी हाँ... साहिबान हम बात कर रहे है.... कल्याण जी वीर जी शाह... और आनंद जी वीर जी शाह... की उस जोड़ी की.. जो सत्तर के दशक की... सुपर हिट संगीतकार जोड़ी के रूप में जानी जाती है....।  यह जोड़ी....शास्त्रीय रागों के इस्तेमाल से मेलोडी में ......इज़ाफ़ा करने से  नहीं पीछे रही....। 
दोनों भाई अलग-अलग अपनी धुनें ....तैयार करके .....किसी फ़िल्म का संगीत रचते थे। 
इसमें जहाँ कल्याणजी, गम्भीर और अर्द्धशास्त्रीय गानों को रचने में तत्पर रहे..... वहीं आनंदजी के हिस्से में चुलबुले एवं हलके मूड के रूमानी गीतों को....... तर्ज़ पर बाँधने का काम आता रहा.....। दोनों मिलकर सुगम व शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा संतुलन बनाते थे...... जिनमें हर रंग और मनःस्थिति का गाना मौजूद मिलता है....। 
 दोस्तों, आज हम राग चारूकेशी पर आधारित गीत सुनने जा रहे हैं "किसी राह में किसी मोड़ पर, कहीं चल ना देना तू छोड़ कर, मेरे हमसफ़र मेरे हमसफ़र"। ज़रा याद कीजिये... गाने के आरम्भ वाले दृश्य को.... एक सर्पिली सड़क पर... ट्रक आता हुआ नजर आता है... और बाँसुरी की मीठी तान... पुकारने लगती है.... अपने हम राही को...। 
इसे लता मंगेशकर की सुरीली.... और मुकेश की दर्द भरी आवाज में रिकार्ड किया गया....। पर्दे पर यह गीत... सदाबहार अभिनेता जितेंद्र और डिंपल क्वीन... शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया है.....। राजू और ज्वाला... का यह सफर... ट्रक के बाद... रेल गाड़ी से होता हुआ.... अपने गंतव्य तक जाता है.... लेकिन यह आलोच्य गीत... हमारा सफर भी है... और मंजिल भी....। 
इस युगल गीत को.... अपनी मखमली अकेली आवाज में.... हमारे लिए लेकर आई हैं.... देवभूमि उत्तराखंड.... के हल्दवानी नैनीताल... की सुप्रसिद्ध साहित्यकार और... अब सुमधुर गीत गाने वाली गायिका भी.... सौम्या दुआ...। लता और मुकेश.... दोनो के अलग अलग अंदाज को.... अपने खास अंदाज में इन्होंने न केवल सफलता पूर्वक गाया है... बल्कि... गीत सुनकर एक.. ताज़गी का अहसास जगाने में भी सौम्या जी की आवाज... सक्षम साबित होती है.... कलाकार की कलाकारी होती भी यही है कि... एक ही कैनवास पर... मरुथल... और बर्फ़ीली वादियों... को चित्रित कर देता है... ठीक इसी तरह की कलाकारी.... सौम्या जी ने... दो आवाज वाले गीत को... एक ही आवाज में गाकर की है....। सुनेंगे तभी... मानेंगे न... और कहेंगे भी... वाह सौम्या जी.. वाह... क्या बात है....। 

शैलेश तिवारी, सम्पादक
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